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डिस्यूरिया (DYSURIA) क्या होता हैं?

डिस्यूरिया - डिस्यूरिया जिसे हिंदी में मूत्र कृच्छता कहा जाता हैं डिस्यूरिया मूत्र त्याग करने में पीड़ा अथवा जलन का होना होता हैं. डिस्यूरिया  के चलते कठिन दर्द के साथ अथवा कठिनाई से मूत्र त्याग होना भी होता हैं. डिस्यूरिया किसी भी उम्र में व्यक्ति को प्रभावित कर सकता हैं, इसमें रोगी को मूत्र त्याग करने की इच्छा भी होती है। किंतु मूत्र मार्ग में अवरोध होने के कारण या अन्य इसी तरह की विकृति हो जाने से मूत्र त्याग कष्ट के साथ होने लगता है। आज के इस लेख में हम  डिस्यूरिया (Dysuria)से जुडी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों को जानेंगे।

Dysuria in hindi

डिस्यूरिया से जुडी निम्न जानकारियों को हम जानेंगे - 

  • डिस्यूरिया के प्रमुख कारण (Major causes of dysuria)
  • डिस्यूरिया के प्रमुख लक्षण (Major symptoms of dysuria)
  • डिस्यूरिया की चिकित्सा विधि (Treatment for dysuria)
  • डिस्यूरिया में खान-पान व परहेज (Diet and diet in dysuria)

डिस्यूरिया के प्रमुख कारण -

  1. अधिक व्यायाम (Exercise) तीक्ष्ण औषधि।
  2. रूक्ष (rough) पदार्थ।
  3. अति मद्यपान (ज्यादा शराब) पिने से। 
  4. तेज चलने वाले घोड़े आदि पर नित्य सवारी करने से।
  5. जन्तुओं के माँस सेवन करने से।
  6. मूत्राशय विकार (U.T.I.) मूत्रवह स्रोत के विकार। 
  7. मूत्र की प्रतिक्रिया अत्यधिक अम्लीय होने से।

डिस्यूरिया के प्रमुख लक्षण -

  1. मूत्र करते समय पीड़ा एवं जलन का अनुभव। 
  2. वंक्षण, वस्ति एवं मूत्रेन्द्रिय में भयंकर पीड़ा होती है और रोगी बार-बार थोड़ा-थोड़ा मूत्र करता है। 
  3. कभी-कभी मूत्र पीला एवं रक्तयुक्त आता हैं। 
  4. वस्ति एवं मूत्रन्द्रिय में भारीपन एवं शोथ। 
  5. अपने स्थान से हटा हुआ वीर्य जब दोषों के प्रकोप से अवरुद्ध होकर मूत्र मार्ग में रुक जाता है उस अवस्था में रोगी को शुक्र सहित मूत्र त्याग कष्ट के साथ होता है। 
  6. वस्ति एवं शिश्न (Penis) में पीड़ा होती है।

डिस्यूरिया की चिकित्सा विधि -

  1. रोग के कारण का परित्याग दृढ़तापूर्वक
  2. विकृति का सही निदान कर मूत्रावरोध को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये। (जाने - स्वास्थ्य जीवन के 05 मंत्र)

डिस्यूरिया में खान-पान व परहेज 

  • खाने के पदार्थों में पुराने लाल चावल. मूंग का पानी, दूध, छाछ, पानी मिला हुआ दही, पुराना पेठा, परवल, ककड़ी, आँवला, चौलाई और खजूर दें। 
  • कच्चा नारियल और नारियल का पानी बड़ा लाभप्रद होता है।
  • इसमें गरिष्ठ तथा नमकीन पदार्थ हानिकारक होता है। 
  • शराब, मेहनत, हाथी-घोड़े की सवारी, दही-बड़े, नमक, तीखे और विरुद्ध भोजनों से रोग बढ़ता है। 
  • पान खाने वालों को पान की मात्रा एकदम कम नहीं के बराबर कर देनी चाहिए।

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