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रहस्यमई बीमारियाँ (Mysterious Diseases)

दोस्तों आज के समय में बिमारी के बारे में कौन नहीं जानता. आज-कल हम सब कई तरह के बीमारियों को तो अपने आस-पास के माहोल में ही देख लेते हैं. लेकिन यह तो हो गयी आम बीमारियाँ इसके अलावा और भी कई ऐसी बीमारियाँ होती हैं जो आम बीमारी नहीं होती हैं, और यह बीमारियाँ  थोड़ी रहस्यमई बिमारी होती हैं. 

Mysterious Diseases

TABLE OF CONTENT-

  • मोर्गेलन्स (Morgellons)
  • प्रोजेरिया (progeria)
  • एक्वाजेनिक पित्ती (aquagenic hives)
  • विदेशी एक्सेंट सिंड्रोम(foreign accent syndrome)
  • लाफिंग डेथ (laughing death)
  • एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम (Alice in Wonderland Syndrome)
  • पिका (pica)

मोर्गेलन्स(Morgellons)

Mysterious Diseases में सबसे पहले नंबर में हैं मोर्गेलंस. रोग (एमडी) एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें धीमी गति से ठीक स्किन के अंदर से फाइबर निकलते हैं। एमडी वाले लोग अक्सर अपनी त्वचा पर चुभने, रेंगने या जलन महसूस करने की रिपोर्ट करते हैं। ये लक्षण दर्दनाक और लंबे समय तक चलने वाले हो सकते हैं, जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। हर साल इसके 19,000 मामले सामने आते हैं।

प्रोजेरिया(progeria)

प्रोजेरिया जन्मजात है, जिसका अर्थ है भ्रूण को दोष या क्षति। इस घातक बीमारी से पीड़ित लोगों की उपस्थिति समय से पहले बुढ़ापा जैसी दिखती है, लेकिन औसतन 13 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो जाती है। 9 से 24 महीनों के बीच गहरी वृद्धि में देरी शुरू हो जाती है, जिससे चेहरे का असामान्य विकास होता है। 90% मरीजों की मौत हार्ट अटैक या स्ट्रोक से होती है।

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एक्वाजेनिक पित्ती(aquagenic hives)

इस बीमारी ने केवल 30 लोगों को ही प्रभावित किया है। पानी से एलर्जी या "एक्वाजेनिक पित्ती" अत्यंत दुर्लभ है, लेकिन इसके अस्तित्व की पुष्टि मेडिकल रिव्यू बोर्ड द्वारा की गई है। पीड़ितों को पानी से एलर्जी होने लगती है। यह आमतौर पर जीवन में देर से होता है और अक्सर हार्मोनल असंतुलन के परिणामस्वरूप होता है। एक्वाजेनिक पित्ती का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, लक्षणों को कम करने के लिए उपचार के विकल्प उपलब्ध हैं।

विदेशी एक्सेंट सिंड्रोम(foreign accent syndrome)

विदेशी उच्चारण सिंड्रोम के पीड़ित बेवजह खुद को एक अपरिचित बोली में बात करते हुए पाते हैं। केवल 60 मामले अब तक दर्ज किए गए हैं। डॉक्टरों ने शुरू में इसे एक मानसिक समस्या के रूप में खारिज कर दिया, लेकिन 2002 में, इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने देखा कि पीड़ितों में मस्तिष्क की असामान्यताएं समान थीं, जिसके कारण भाषण पिच में बदलाव, स्वर ध्वनियों का लंबा होना और अन्य अनियमितताएं हुईं।

लाफिंग डेथ(laughing death)

लाफिंग डेथ Laughing Death, जिसे आमतौर पर कुरु के नाम से जाना जाता है, न्यू गिनी के आदिवासी लोगों में यह पाया गया था। लोग शुरू में अंगों के कांपने का अनुभव करते हैं और तीन महीनों में, खड़े होने की क्षमता खो देते हैं, अंत में मरने से पहले क्रॉस-आइड हो जाते हैं। गांव में मौत के बाद परिवार के सदस्यों को रवाने की प्रथा के जरिए संक्रमण फैला था। जब इसे बंद कर दिया गया, तो महामारी समाप्त हो गई।

एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम(Alice in Wonderland Syndrome)

ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ क्लिनिकल मेडिसिन के अनुसार, एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम के पीडित वस्तुओं को उनकी तुलना में बहुत छोटा समझते हैं। स्थिति, जिसे माइक्रोप्सिया या लिलिपुट दृष्टि के रूप में भी जाना जाता है। ये बीमारी सुनने, स्पर्श करने और स्वयं के शरीर की छवि की धारणाओं को प्रभावित करती है।

पिका(pica)

पिका एक खाने का विकार है, जिसमें लोग एक या एक से अधिक गै-रखाद्य पदार्थ, जैसे बर्फ, मिट्टी, कागज, राख या गंदगी रवाने के लिए मजबूर होते हैं। पैगोफैगिया पिका का एक उपप्रकार है। इसमें बर्फ या बर्फ का पानी खाना शामिल है। इसे केवल तभी पिका माना जा सकता है जब भूरव एक महीने से अधिक समय तक बनी रहे और पीड़ित ऐसी उम्र का हो जहां इन वस्तुओं को खाना विकास की दृष्टि से अनुचित माना जाता है। 

तो दोस्तों मै उम्मीद करता हु की आज के इस लेख में बताई गयी जानकारी आपको अच्छी लगी होगी. आज आपने जीतने भी रहस्यमई बीमारियों  (Mysterious Diseases) के बारें में जाना वह आपके ज्ञान को बढ़ाएंगे और यह जानकारी आपको कभी न कभी कम जरूर आएँगी. 

उम्र के हिसाब से कराएँ शारीरिक जाँच 

दोस्तों जाँच किसी भी चीज को परखने का सबसे अच्छा माध्यम जाँच को माना जाता हैं. क्योंकि एक यही चीज होती हैं जिसके जरिये हमारे शरीर में आ रही समस्याओं को जाँच के माध्यम से ही पता लगाया जाता हैं. लक्षण उभरने पर रोग का इलाज कराने से बेहतर है कि उसे पहले ही पहचान लिया जाए। इसलिए चिकित्सक उम्र के अनुसार कुछ जांचें नियमित अंतराल पर कराने की सलाह देते हैं।

अलग-अलग उम्र में शारीरिक जाँच की जरूरत | Physical Examination in Hindi

30 की उम्र से पहले कराए जाने वाले जाँच-

  • हीमोग्लोबिन टेस्ट कराएं, ताकि रक्त की कमी को लेकर समय रहते निदान किया जा सके। 
  • विटामिन-डी की जांच कराएं। इसकी कमी आजकल अमूमन महिलाओं में देखी जाती है। 
  • बीएमआई टेस्ट भी कराना चाहिए।

30 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

खून व विटामिन की जांच - इसमें हीमोग्लोबिन का स्तर, पॉलिमोपस, लिंफोसाइट, मोनोसाइट, प्लेटलेट्स आदि के स्तर को मापा जाता है। विटामिन डी और बी12 की कमी का भी पता लगाया जाता है। इनकी कमी से महिलाओं में थकान और कमजोरी हो जाती है।

पैपस्मिअर के साथ (पेल्विक)परीक्षण - पेल्विक परीक्षण में महिला के जननांगों, गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा, फेलोपियन ट्यूब्स, मलाशय और ब्लैडर की जांच की जाती है। ये दोनों ही परीक्षण महिलाओं में कैंसर को रोकने और शुरुआती उपचार में मददगार होते हैं। 

मधुमेह जांच - गर्भावस्था में होने वाला मधुमेह स्वस्थ महिला को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए ब्लड शुगर की जांच कराएं। यदि मधुमेह आनुवंशिक है तो कुछ समय के अंतराल में इसकी जांच कराती रहें।

मैमोग्राम और स्तन परीक्षण - आमतौर पर 40 की उम्र के बाद स्क्रीनिंग टेस्ट की सलाह दी जाती है, लेकिन अगर ब्रेस्ट कैंसर की आनुवंशिकता हो तो बेहतर है कि पहले ही नियमित स्तन परीक्षण के साथ मैमोग्राम करा लें।

40 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

लिपिड प्रोफाइल - कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग इसमें ब्लड टेस्ट से कोलेस्ट्रॉल चैक होता है। जरूरत पड़ने पर ईसीजी भी करवा लें। 

सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर - स्क्रीनिंग पेप स्मीयर टेस्ट सर्वाइकल कैंसर की जांच के लिए किया जाता है। 40 के बाद तो ये टेस्ट होना ही चाहिए। इसके अलावा नियमित बेस्ट एग्जामिनेशन करवाना ना भूलें। इसमें हर दो से तीन हफ्ते में स्वयं भी शारीरिक परीक्षण कर सकती हैं। किसी तरह की गांठ महसूस होती है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। 

थाइरॉइड टेस्ट - थाइरॉइड धीरे-धीरे बॉडी सिस्टम को प्रभावित करता है। डॉक्टरी सलाह से इसकी जांच कराएं। 

विज़न टेस्ट - अगर नजर का चश्मा पहनती हैं या कॉन्टैक्ट लेंस लगाती हैं तो हर साल विजन टेस्ट करवाएं। अगर चश्मा नहीं पहनती हैं तो हर 2 साल में एक बार टेस्ट करवाना जरूरी है।

50 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

हृदयकेलिए ईसीजी, इको, ईकेजी (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) बीपी और टीएमटी कराने चाहिए। कोलेस्ट्रॉल की जांच हर साल कोलेस्ट्रॉल परीक्षण कराएं। यदि मधुमेह, हृदय या किडनी के रोग से पीड़ित हों हे परीक्षण और भी कम अंतराल में या डॉक्टर को सलाह के मुताबिक़ कराएं। 

साइकोलॉजिकल स्क्रीनिंग मेनोपॉज के कारण मूड स्विंग, डिप्रेशन, नीद ना आना, चिड़चिड़ापन होने लगता है। हॉर्मोनल। बदलाव से 75% महिलाओं में यह होता ही है।

60 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

ब्लड प्रेशर जांच - उच्च रक्तचाप को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि यह कोई लक्षण दिखाए बिना ही स्ट्रोक या दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ा देता है। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच जरूरी है। 

बोन डेंसिटीटेस्ट बुजुगों में ऑस्टियोपोरोसिस सामान्य बीमारी है। डॉक्टरी सलाह से बोन डेंसिटी टेस्ट भी करवाएं। 

आंखों की जांच - उम्र के कारण आंखों में ग्लूकोमा या मोतियाबिंद जैसी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। हर छह महीने या डॉक्टर से परामर्श लेकर समय-समय पर इसकी जांच कराएं।

नोट:- ऊपर दी गई जानकारियां आपको जागरूक करने के लिए हैं। कृपया टेस्ट के लिए डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। 

आशा हैं की ऊपर आर्टिकल में बतायी गए सारी जानकारी आपको अच्छी लगी हो. यदि यह आर्टिकल आपके लाइफ को बेहतर और सेहतमंद बनाने में आपकी मदत करती हैं तो इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें. “धन्यवाद” 

कैसे होता है लीवर ट्रांसप्लांट (How is liver transplant done?)

इसकी सामान्य प्रक्रिया यह है कि जिस व्यक्ति को लीवर प्रत्यारोपण की जरूरत होती है उसके परिवार के किसी सदस्य (माता/पिता, पति/पत्नी के अलावा सगे भाई/बहन) द्वारा लीवर डोनेट किया जा सकता है। इसके लिए मरीज के परिजनों को स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ट्रांसप्लांट ऑथराइजेशन कमेटी से अनुमति लेनी पड़ती है। 

कैसे होता है लिवर ट्रांसप्लांट | Liver Transplant Hindi


यह संस्था डोनर के स्वास्थ्य, उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों की गहन छानबीन और उससे जुड़े करीबी लोगों से सहमति लेने के बाद ही उसे अंग दान की अनुमति देती है। लीवर के संबंध में सबसे अच्छी बात यह है कि अगर इसे किसी जीवित व्यक्ति के शरीर से काटकर निकाल भी दिया जाए तो समय के साथ यह विकसित होकर अपने सामान्य आकार में वापस लौट आता है। इससे डोनर के स्वास्थ्य पर भी कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।

इसके अलावा अगर किसी मृत व्यक्ति के परिवार वाले उसके देहदान की इजाजत दें तो उसके निधन के छह घंटे के भीतर उसके शरीर से लीवर निकाल कर उसका सफल प्रत्यारोपण किया जा सकता है इसमें मरीज के लीवर के खराब हो चुके हिस्से को सर्जरी द्वारा हटाकर वहां डोनर के शरीर से स्वस्थ लीवर निकालकर स्टिचिंग के जरिये प्रत्यारोपित किया जाता है। 

इसके लिए बेहद बारीक किस्म के धागे का इस्तेमाल होता है, जिसे प्रोलिन कहा जाता हैलंबे समय के बाद ये धागे शरीर के भीतर घुल कर नष्ट हो जाते हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज का शरीर नए लीवर को स्वीकार नहीं पाता, इसलिए उसे टैक्रोलिनस ग्रुप की दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज के शरीर के साथ प्रत्यारोपित लिवर अच्छी तरह एडजस्ट कर जाए। सर्जरी के बाद मरीज को साल में एक बार लीवर फंक्शन टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।

लिवर ट्रांसप्लांट के बाद क्या?

  • अस्पताल में 7 से 10 दिन रहना पड़ सकता है।
  • कम से कम 3 महीने की नियमित दवाएँ और अस्पताल अपने शेडूल के हिसाब से जाए।
  • लीवर प्रत्यारोपण के बाद तीन से छह महीने में सामान्य व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर लौट सकते हैं।
  • आप अपनी इच्छानुसार खेल, सामजिक गतिविधयों में भाग लेना, यात्रा और व्यायाम कर सकेंगे।

लिवर ट्रांसप्लांट का निर्धारण कैसे किया जाता हैं? 

लीवर के प्रत्यारोपण की उपयुक्तता का निर्धारण करने के लिए  विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा अवलोकन आवश्यक होता है। इसमें आपकी चिकित्सीय इतिवृत एवं भांति प्रकार की जाँच सम्मिलित होती हैं। प्रत्यारोपण दल आपका रक्त परीक्षण, एक्स-रे, एवं अन्य जाँच के क्रियांवयन द्वारा यह निर्धारण करेंगे कि क्या आपको प्रत्यारोपण की आवश्यकता है या क्या प्रत्यारोपण सुरक्षित ढ़ग से पूरा किया जा सकता है। आपके स्वास्थ्य के अन्य पहलू जैसे कि आपका हृदय,फेफड़े, लीवर , प्रतिरक्षी तंत्र एवं मानसिक स्वास्थ्य का परीक्षण किया जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या आप शल्यक्रिया के लिए सबल हैं।

ट्रैवल सिकनेस क्या हैं? (यात्रा के दौरान उल्टी का कारण)

जो लोग सड़क, समुद्र या हवाई यात्रा करते समय बीमार हो जाते हैं, उन्हें ट्रैवल/मोशन सिकनेस का सामना करना पड़ता है। 2 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों और महिलाओं को मोशन सिकनेस का खतरा अधिक होता है, लेकिन यह किसी को भी प्रभावित कर सकता है। मोशन सिकनेस तब होती है जब आपका दिमाग आपकी आंखों, कानों और शरीर से भेजी गई जानकारी को समझ नहीं पाता है।


किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है? (Who gets travel/motion sickness quickly)

मोशन सिकनेस हर व्यक्ति को नहीं होता लेकिन मोशन सिकनेस होने के चांसेज कुछ केस में बढ़ जाते हैं, जैसे की- 

माइग्रेन्स (Migraine) – सिर के केवल एक हिस्से में दर्द या असहनीय पीड़ा को माइग्रेन्स कहते हैं. 

(पढ़ेमाइग्रेन क्या हैं व लक्ष्ण )

प्रेग्नेंसी(Pregnancy)– प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं का शरीर पहले के जैसे नहीं रह पाता जिसके चलते उन्हें ट्रैवल सिकनेस का सामना करना पड़ता हैं, और ट्रैवल सिकनेस जल्दी होती हैं. 

मेंस्ट्रुअल पीरियड्स (Menstrual Periods)- सामन्यतौर पर किसी लड़की की 11 से 13 वर्ष की आयु में मासिक धर्म प्रारम्भ होते हैं और करीबन 3 से 5 दिन या 2 से 7 दिन तक चलते हैं. और मेंस्ट्रुअल पीरियड्स के चलते यात्रा के दौरान उन्हें ट्रैवल सिकनेस होने के चांस ज्यादा होता हैं. 

पार्किंसंस डिसीज (Parkinson’s Disease) – इस डिसीज में मानव दिमाग के एक क्षेत्र में तंत्रिका कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. जिसके चलते मोशन सिकनेस हमारी बॉडी पर हावी होती हैं. 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? (What causes travel sickness)

हमारा दिमाग आपके शरीर के मोशन-सेंसिंग पास से सिग्नल्स प्राप्त करता है : आपकी आंखें, आंतरिक कान, मांसपेशियां और जॉइन्ट्स। जब ये अंग परस्पर विरोधी सूचनाएं भेजते हैं तो दिमाग भ्रमित हो जाता है और प्रतिक्रिया आपको बीमार महसूस कराती है. 

  • मोशन के दौरान कुछ पढ़ना
  • भरा/खाली पेट 
  • आंखें पास से गुजरते पेड़ों को देखती हैं

मोसन सिकनेस से बचने के उपाय (Ways To Avoid Moson Sickness)

अदरक की जड़-

अदरक की जड़ का सेवन सबसे कारगर उपाय है। अदरक में कुछ मतली-विरोधी प्रभाव होते हैं, जो में मतली की इच्छा को रोक सकते हैं। आप अदरक की जड़ को चाय, कैप्सूल, टैबलेट या कैंडी में उपलब्धता के अनुसार ले सकते हैं। के गर्भवती महिलाओं को अदरक का इस्तेमाल करने से पहले हमेशा डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

खट्टे फल- 

सबसे अधिक सेवन किए जाने वाले खट्टे फल जैसे संतरे और अंगूर मोशन सिकनेस से लड़ने के काम आ सकते हैं। तेज स्वाद के कारण, इन फलों को यात्रा के दौरान लोगों को बेहतर महसूस कराने के लिए अच्छा माना जाता है।

पुदीना और भुनी हुई लौंग-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

भारी भोजन न करें-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें-

यात्रा के दौरान किताबें पढ़ना या लैपटॉप पर काम करना या मोबाइल फोन का उपयोग करना आकर्षक हो सकता है। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारक है जो मतली की भावना को ट्रिगर करता है। पुस्तक या मोबाइल स्क्रीन में शब्द स्थिर होते हैं लेकिन आपका परिवेश मोशन में होता है। यह आपके मस्तिष्क को 2 मिश्रित संकेत भेजेगा और मतली को ट्रिगर करेगा।

ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण (Symptoms Of Travel/Motion Sickness)-

  • ठंडा पसीना आना 
  • मतली उल्टी होना 
  • सिर दर्द करना 
  • चक्कर आना 
  • तेजी से सांस लेना व थकान 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे (How To Avoid Travel/Motion Sickness)- 

  • पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें 
  • यात्रा के दौरान आपकी बैठने की स्थिति मोशन सिकनेस से निपटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • फ्रंट सीट
  • खिड़की के पास बैठना, आगे की ओर मुंह करके (ट्रेन चलने की दिशा में) बैठना 
  • वाहन की मिडिल सीट्स को बुक करें 
  • यात्रा में अपना मन लगाये रखना 
  • यात्रा के दौरान बात कर के मन बहलाना 

तो दोस्तों उम्मीद हैं की, आज की इस आर्टिकल में बतायी गयी जानकारी जिसमे हमने जाना ट्रैवल सिकनेस क्या है?, किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है?, ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? मोसन सिकनेस से बचने के उपाय? ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण? और ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे? इन सब की जानकारी हमने आपको दी. यदि आपको यह ट्रैवल सिकनेस से जुडी जानकारी उपयोगी लगी हो तो इस जानकारी को शेयर जरूर करें. 

दिल की बीमारी कैसे बढ़ती है | Dil ki bimari kaise badhti hain

दिल की बीमारी - आज बढती आधुनिकता और दुनिया के विकास के साथ-साथ कई बीमारिया भी अपना पैर पसार रहा हैं. इसमें से दिल की बीमारी भी एक हैं। दिल की बीमारी की अनेक वजह हो सकती हैं, दिल की बीमारी धीरे-धीरे बढती जाती हैं और यह एक-एक स्टेज से बढती हैं। लेकिन कैसे बढ़ती जाती है दिल की बीमारी क्या आप यह जानते हैं? यदि नहीं तो चलिए जानते हैं कैसे बढ़ती जाती है दिल की बीमारी, 6 स्टेज में समझिए – 

कैसे बढ़ती जाती है दिल की बीमारी | 6 स्टेज से समझिए

दिल की बीमारी के बढ़ने के 06 स्टेज:- 

  • इस्कीमिक हार्ट डिजीज (Ischemic Heart Disease)
  • एन्जाइना (Angina)
  • मायोकार्डिअल इंफार्शन (Myocardial Infarction)
  • एट्रियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation)
  • हार्ट फेल (Heart Failure)
  • कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest)
 

1) इस्कीमिक हार्ट डिजीज (Ischemic Heart Disease):-

धमनियों में प्लैक (वसा की परत) जमा होने लगता है। यह कोलेस्ट्रॉल की वजह से जमता है। हार्ट की मांसपेशियां सिकुड़ने लगती हैं। खून का प्रवाह कम हो जाता है।(जाने - खून की कमी के कारण )

2) एन्जाइना (Angina):-

प्लैक की वजह से हार्ट की मसल्स में दर्द होने लगता है। यह अटैक की चेतावनी भी हो सकती है। जीवन शैली में परिवर्तन करके इस स्थिति को संभाला जा सकता है।

2) मायोकार्डिअल इंफार्शन (Myocardial Infarction):-

इस स्थिति में हार्ट में खून का प्रवाह बाधित होता है। रक्त वाहिकाओं में ब्लड क्लॉट बनने लगता है। ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित होने लगता है। जरूरी कोशिकाएं मरने लगती हैं। जितनी ज्यादा कोशिकाएं मृत होंगी, उतना तीव्र हार्ट अटैक हो सकता है।

4) एट्रियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation):-

इस स्थिति में धड़कनें असामान्य, अनियमित हो जाती हैं। हार्ट फेल होने और कार्डियके अरेस्ट का यह मुख्य कारण बनती है। (जाने - सीने में जलन क्यों होता हैं?)

5) हार्ट फेल (Heart Failure):-

हार्ट पर सूजन आ जाती है। इससे वह जरूरत के मुताबिक ब्लड पंप नहीं कर पाता। इस स्थिति से हार्ट अटैक होता है।

6) कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest):-

हार्ट अटैक अगर कार्डियक अरेस्ट में बदल जाए तो हार्ट ब्लड पंप करना पूरी तरह बंद कर देता है। कृत्रिम रूप से सांस न दी जाए या छाती को पंप करते हुए मुंह से सांस न दी जाए तो शरीर के अंग और टिश्यू काम करना बंद कर देते हैं। और मौत हो जाती है।

 

तो दोस्तों आपने जाना कैसे बढ़ती जाती है दिल की बीमारी, इन 6 स्टेज को जानने के बाद आप समझ ही गए होंगे. इस आर्टिकल में बताए गयी जानकारी आपको सही और उपयोगी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें। 

पित्ताशय शोथ/कोलीसिस्टाइटिस (CHOLECYSTITIS)

कोलीसिस्टाइटिस की परिभाषा - पित्ताशय प्रदाह, पित्त की थैली की सूजन, पित्ते की सूजन परिचय- पित्ताशय में सूजन आकर उसका परिमाण बढ़ जाता है। इस रोग के प्रमुख 2 भेद पाए जाते हैं .

कोलीसिस्टाइटिस क्या है | Cholecystitis complete information in hindi

रूप रेखा –

  • कोलीसिस्टाइटिस की परिभाषा 
  • कोलीसिस्टाइटिस के प्रकार 
  • कोलीसिस्टाइटिस के कारण 
  • कोलीसिस्टाइटिस के लक्षण 
  • कोलीसिस्टाइटिस की पहचान 
  • कोलीसिस्टाइटिस का परिणाम 

(1) तीव्र पित्ताशय शोथ (Acute Cholecystitis), (2) जीर्ण पित्ताशय शोथ (Chronic Cholecystitis) 

कोलीसिस्टाइटिस के कारण -

कोलीसिस्टाइटिस अधिकतर पित्ताशय की ग्रीवा अथवा पित्ताशय वाहिनी में अवरोध के परिणाम स्वरूप। साथ में संक्रमण भी उपस्थित। अवरोध का हेतु प्रायः पित्ताश्मरी (Gall Stone) है ।तीव्र पित्ताशय शोथ-टाइफॉइड, पैराटाइ फॉइड ज्वर तथा सिप्टीसीमिया में विष किसी अवरोध के भी हो सकता है।

कोलीसिस्टाइटिस के लक्षण - 

  • भारी शरीर की बहु प्रसूता की स्त्रियों में अधिक । अवरोध न होने पर और 40-60 वर्ष
  • वमन की इच्छा। उदर के उर्ध्व भाग में बेचैनी एवं ज्वर।
  • रोगी को गहरी साँस लेने पर बाएँ अधःपर्शुका प्रदेश (Hypochondrium) में स्पर्श द्वारा परीक्षा करने पर अत्यधिक स्पर्शासहिष्णुता (Tender ness) पायी जाती है। 
  • अवरोध की स्थिति में -पित्त शूल (Biliary colic) जो तीव्र होता है एवं बेचैनी उपस्थित रहती है।
  • कामला (Jaundice) अनुपस्थित अथवा अल्प |
  • गोफ के कारण होने वाले सामान्य पित्तवाहिनी के

कोलीसिस्टाइटिस की पहचान / जाँच - 

  • पित्त की उपस्थिति के लिए मूत्र परीक्षण एवं सीरम बिलिरुविन के लिए रक्त परीक्षण आवश्यक । सीरम विलीरुविन ज्यादा होता है।
  • बहुरूपी केंद्रक श्वेत कोशिका बहुलता
  • प्रायः मिलती है। अर्थात खून की जांच में TLC बढ़े हुए होते हैं। 
  • सीरम इमाइलेज थोड़ा-सा बढ़ जाता है
  • पेशाब में वाइल साल्ट्स होते हैं। 
  • एक्स-रे करवाने पर गालस्टोन दिखाई दे सकते हैं ।
  • अल्टासोनोग्राफी करने पर गालस्टोन व पित्ताशय की स्थिति का ज्ञान हो जाता है।

कोलीसिस्टाइटिस के परिणाम -

  • संरक्षी चिकित्सा (Conservative treatment) द्वारा कुछ दिनों में लक्षण शांत हो जाते हैं। परंतु सप्ताहों, महीनों अथवा वर्षों के बाद पुन: इसके पुनरावर्तन की आशंका रहती है। अवरोध अथवा
  • संक्रमण के परिणामस्वरूप रोग बढ़ जाय अथवा विद्रधि या तीव्र
  • शोथ हो जाए। ऐसी अवस्था में 
  • नाड़ी तीव्र,ज्वर तीव्र, रोगी की दशा गंभीर 

तो दोस्तों आज के इस कोलीसिस्टाइटिस की जानकारी में हमने आपको कोलीसिस्टाइटिस की परिभाषा कोलीसिस्टाइटिस के प्रकार, कोलीसिस्टाइटिस के कारण, कोलीसिस्टाइटिस के लक्षण और कोलीसिस्टाइटिस की पहचान साथ ही कोलीसिस्टाइटिस के परिणाम के बारे में बताया.

इन जानकारियों को भी पढ़े:-