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नेफ्राइटिस - NEPHRITIS

हमारे शरीर में दो किडनियां पायी जाती है, जो हमारे शरीर में उपस्थित अपशिष्ट तत्वों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को बहार निकलती हैं. यदि इन किडनियों में सुजन आ जाए तब इस स्थिति को “नेफ्राइटिस” कहा जाता हैं.

परिचय- जिस रोग में गुर्दे (किडनी) के प्रदाह की वजह से बहुत थोड़ी मात्रा में पेशाब होता है और बहुत शीघ्र सारे शरीर में शोथ (सूजन), कमजोरी, रक्ताल्पता (खून की कमी-Anemia) आदि शिकायतें पैदा हो जाती हैं इसे ब्राइट्स डिजीज कहते हैं। इसका दूसरा नाम नेफ्राइटिस (Nephritis) है। ("वृक्क शोथ' (Nephritis) निम्न दो प्रकार का होता है 1. एक्यूट (नया प्रदाह). 2. क्रॉनिक (पुराना प्रदाह)।

NEPHRITIS IN HINDI

इसे 'एक्यूट ग्लोमेरूलो नेफ्राइटिस' (Acute Glomerulo Nephritis) भी कहते हैं। इसमें दोनों वृक्कों के कोशिका स्तबकों (Glomeruli) में शोथ हो जाता है। नेफ्राइटिस से जुडी इस जानकारी में आज हम जानेंगे – 

  • नेफ्राइटिस के मुख्य कारण 
  • नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण
  • नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें
  • नेफ्राइटिस का परिणाम
  • नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त
  • नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी

नेफ्राइटिस के मुख्य कारण (Main causes of nephritis)-

  • सबसे बड़ा कारण रक्त संलापी (हीमोलाइटिक स्ट्रेप्टोकोकाई) नामक जीवाणु होते हैं। 
  • अधिक ठंड या सर्दी लगना। 
  • स्कारलैट फीवर, रक्तस्रावी चेचक आदि कुछ बीमारियों तथा डिपथीरिया, खसरा, मलेरिया, सेरिब्रो-स्पाइनल मेनिन्जाइटिस, विसर्प, वात ज्वर, एक्यूट ट्यूबरकुलोसिस, सेप्टीसीमिया, उपदंश, हैजा की कमजोरी हालत में तथा आग में जलने और नाना प्रकार के चर्म रोग के साथ भी यह बीमारी होती है। 
  • कुछ विषैली दवाओं यथा-पोटेशियम क्लोरेट, टर्पेन्टाइन, नाइट्रेट आदि के सेवन से।

नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण (Main symptoms of nephritis)-

  • ठंड लग कर बीमारी एकाएक हो सकती है और देखते-देखते थोड़े समय में रोगी को सूजन आ जाती है। कभी-कभी शीत और कम्प होकर बीमारी आरम्भ होती है। 
  • कमर, सारे शरीर एवं माथे में दर्द। 
  • पहले आँखों के नीचे की पलक और पैर की गाँठ से पास सूजन होती है और फिर धीरे धीरे सारे शरीर में। चेहरे का फूलना। 
  • मूत्र की मात्रा अल्प और मूत्र में रक्त की उपस्थिति। 
  • व्याकुलता, ज्वर, अग्निमांद्य, वमन, शिरशूल आदि की प्रधानता।
  • सारा शरीर रक्तहीन दिखाई देता है। 
  • शरीर की त्वचा शुष्क ।
  • नोट- इस रोग में पेशाब बार-बार और जल्दी-जल्दी होता है और बहुत थोड़े परिमाण में होता है। यहाँ तक 2-4 बंद से अधिक नहीं। पेशाब लाल और गाढ़ा होता है। पेशाब बंद होने के कारण यूरीमिया। 

नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें (How to recognize nephritis)–

  • नाड़ी बहुत कड़ी और महाधमनी के ऊपर द्वितीय शब्द (2nd sound) बढ़ जाता है। 
  • पेशाब का आपेक्षिक गुरुत्व (Specific | Gravity) 1020 से 1440 तक। 
  • पेशाब टेस्ट में-एल्बूमेन, रक्त के कण और किडनी की गठित सामग्री यथा-रेनल, हायलिन, एपिथिलियल और रक्त का कास्ट, ट्यूब कास्ट आदि पाये जाते हैं। मूत्र कम, लाल या धूमिल (Smoky) एवं गाढ़ा। 
  • परेटिनल परीक्षण से अक्षिविम्ब शोफ (Papill oedema), रक्तसाव एवं निःसाव की जानकारी।

नेफ्राइटिस का परिणाम (Consequence of nephritis)–

  • सर्दी लग कर बीमारी हुई हो तो थोड़े ही दिनों में ठीक हो जाती है। 0
  • अन्यान्य कारणों से बीमारी हुई हो तो अधिकांश क्षेत्रों में घातक। 
  • ज्वर के साथ बच्चों को और गर्भवती स्त्रियों में 40-50% रोगियों की मृत्यु 
  • कभी-कभी पुराना रूप (Chronic) धारण कर लेती है। 
  • यूरीमिया होने से मस्तिष्क प्रभावित। 
  • कभी कभी बेचैनी, बेहोशी एवं पागलपन जैसे लक्षण। 
  • 'यूरीमिया' एवं 'अम्ल रक्तता से मृत्यु।
  • बच्चों में चिकित्सा द्वारा 90% लाभ, जबकि प्रौढ़ों में 50% की आशा।

नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त (Medical principles for nephritis) –

  • इस बीमारी में गुर्दे का प्रदाह हो जाता है, इसलिये गुर्दे (Kidneys) को जितना ही विश्राम दिया जाय, उतना ही अच्छा है। 
  • ऐसी व्यवस्था करें जिससे दस्त वगैरह साफ हों। 
  • इस रोग में सूजन होती है और शरीर में पानी एकत्रित होता है इसलिये यदि 'प्लूरा और 'हृदयावरण' के भीतर पानी इकट्ठा हो तो उसके लिये दवा की अलग व्यवस्था करनी चाहिये। 
  • यदि पेशाब बहुत थोड़ा हो तो ऐसी व्यवस्था करें जिससे पेशाब का वेग बढ़े। 
  • यदि वमन हो तो उसे 'बर्फ, चूसने को दें। 
  • यदि वमन थोड़ा हो रहा हो तो व्यवस्था की आवश्यकता नहीं। 
  • यदि वमन बहुत देर तक होता रहे तो चिकित्सकों को विशेष सावधानी से काम लेना चाहिये।

नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी- 

  • दूध इस रोग का प्रधान पथ्य है। 
  • रोग के कारण शरीर से जो एल्बुमिन निकल जाता है है दूध से उसकी पूर्ति हो जाती है। 
  • दूध, सागू, दूध बार्ली आदि के सिवाय कुछ न दें। पानी इच्छानुसार दिया जा सकता है। 
  • गर्म पेय अधिक लाभदायक हैं। 
  • ताजे पके फल, आलू, परवल, तोरई वगैरह उबाल कर दी जा सकती हैं। 
  • थोड़ा आराम हो जाने पर 30-45 अथवा दो महीने बाद भात, दाल, मछली का शोरवा दें। माँस कम से कम 6 महीने तक नहीं देना चाहिये। 
  • रोगी को गरम वस्त्रों में लपेट कर रखें, उसे ठंड तथा सीधी हवा नहीं लगनी चाहिये। 
  • बीमारी में आराम हो जाने के बाद भी 5-6 माह तक कमर में ऊनी कपड़ा लपेटे रहना चाहिये। 
  • बदन पर भी गरम कपड़े पहने रहना चाहिये।

उम्मीद है की नेफ्राइटिस से जुडी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो. यदि नेफ्राइटिस के बारे में इतनी जानकारी आपने ले ली तो कृपया इस जानकारी को अन्य जरूरतमंद को जरूर भेजियें. “धन्यवाद”

 

उम्र के हिसाब से कराएँ शारीरिक जाँच 

दोस्तों जाँच किसी भी चीज को परखने का सबसे अच्छा माध्यम जाँच को माना जाता हैं. क्योंकि एक यही चीज होती हैं जिसके जरिये हमारे शरीर में आ रही समस्याओं को जाँच के माध्यम से ही पता लगाया जाता हैं. लक्षण उभरने पर रोग का इलाज कराने से बेहतर है कि उसे पहले ही पहचान लिया जाए। इसलिए चिकित्सक उम्र के अनुसार कुछ जांचें नियमित अंतराल पर कराने की सलाह देते हैं।

अलग-अलग उम्र में शारीरिक जाँच की जरूरत | Physical Examination in Hindi

30 की उम्र से पहले कराए जाने वाले जाँच-

  • हीमोग्लोबिन टेस्ट कराएं, ताकि रक्त की कमी को लेकर समय रहते निदान किया जा सके। 
  • विटामिन-डी की जांच कराएं। इसकी कमी आजकल अमूमन महिलाओं में देखी जाती है। 
  • बीएमआई टेस्ट भी कराना चाहिए।

30 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

खून व विटामिन की जांच - इसमें हीमोग्लोबिन का स्तर, पॉलिमोपस, लिंफोसाइट, मोनोसाइट, प्लेटलेट्स आदि के स्तर को मापा जाता है। विटामिन डी और बी12 की कमी का भी पता लगाया जाता है। इनकी कमी से महिलाओं में थकान और कमजोरी हो जाती है।

पैपस्मिअर के साथ (पेल्विक)परीक्षण - पेल्विक परीक्षण में महिला के जननांगों, गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा, फेलोपियन ट्यूब्स, मलाशय और ब्लैडर की जांच की जाती है। ये दोनों ही परीक्षण महिलाओं में कैंसर को रोकने और शुरुआती उपचार में मददगार होते हैं। 

मधुमेह जांच - गर्भावस्था में होने वाला मधुमेह स्वस्थ महिला को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए ब्लड शुगर की जांच कराएं। यदि मधुमेह आनुवंशिक है तो कुछ समय के अंतराल में इसकी जांच कराती रहें।

मैमोग्राम और स्तन परीक्षण - आमतौर पर 40 की उम्र के बाद स्क्रीनिंग टेस्ट की सलाह दी जाती है, लेकिन अगर ब्रेस्ट कैंसर की आनुवंशिकता हो तो बेहतर है कि पहले ही नियमित स्तन परीक्षण के साथ मैमोग्राम करा लें।

40 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

लिपिड प्रोफाइल - कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग इसमें ब्लड टेस्ट से कोलेस्ट्रॉल चैक होता है। जरूरत पड़ने पर ईसीजी भी करवा लें। 

सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर - स्क्रीनिंग पेप स्मीयर टेस्ट सर्वाइकल कैंसर की जांच के लिए किया जाता है। 40 के बाद तो ये टेस्ट होना ही चाहिए। इसके अलावा नियमित बेस्ट एग्जामिनेशन करवाना ना भूलें। इसमें हर दो से तीन हफ्ते में स्वयं भी शारीरिक परीक्षण कर सकती हैं। किसी तरह की गांठ महसूस होती है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। 

थाइरॉइड टेस्ट - थाइरॉइड धीरे-धीरे बॉडी सिस्टम को प्रभावित करता है। डॉक्टरी सलाह से इसकी जांच कराएं। 

विज़न टेस्ट - अगर नजर का चश्मा पहनती हैं या कॉन्टैक्ट लेंस लगाती हैं तो हर साल विजन टेस्ट करवाएं। अगर चश्मा नहीं पहनती हैं तो हर 2 साल में एक बार टेस्ट करवाना जरूरी है।

50 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

हृदयकेलिए ईसीजी, इको, ईकेजी (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) बीपी और टीएमटी कराने चाहिए। कोलेस्ट्रॉल की जांच हर साल कोलेस्ट्रॉल परीक्षण कराएं। यदि मधुमेह, हृदय या किडनी के रोग से पीड़ित हों हे परीक्षण और भी कम अंतराल में या डॉक्टर को सलाह के मुताबिक़ कराएं। 

साइकोलॉजिकल स्क्रीनिंग मेनोपॉज के कारण मूड स्विंग, डिप्रेशन, नीद ना आना, चिड़चिड़ापन होने लगता है। हॉर्मोनल। बदलाव से 75% महिलाओं में यह होता ही है।

60 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

ब्लड प्रेशर जांच - उच्च रक्तचाप को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि यह कोई लक्षण दिखाए बिना ही स्ट्रोक या दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ा देता है। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच जरूरी है। 

बोन डेंसिटीटेस्ट बुजुगों में ऑस्टियोपोरोसिस सामान्य बीमारी है। डॉक्टरी सलाह से बोन डेंसिटी टेस्ट भी करवाएं। 

आंखों की जांच - उम्र के कारण आंखों में ग्लूकोमा या मोतियाबिंद जैसी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। हर छह महीने या डॉक्टर से परामर्श लेकर समय-समय पर इसकी जांच कराएं।

नोट:- ऊपर दी गई जानकारियां आपको जागरूक करने के लिए हैं। कृपया टेस्ट के लिए डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। 

आशा हैं की ऊपर आर्टिकल में बतायी गए सारी जानकारी आपको अच्छी लगी हो. यदि यह आर्टिकल आपके लाइफ को बेहतर और सेहतमंद बनाने में आपकी मदत करती हैं तो इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें. “धन्यवाद” 

सिस्टाइटिस - CYSTITIS

सिस्टाइटिस  यानी मूत्राशय शोथ जिसे और भी अन्य नाम से जाना जाता हैं जैसे की - वस्ति शोथ, मूत्राशय प्रदाह, वस्ति की सूजन। आज के इस  लेख में हम सिस्टाइटिस से जुडी सभी जानकारियों के बारें में जानेंगे. 

सिस्टाइटिस  क्या होता है?. कभी किसी भी कारण से मूत्राशय के भीतर की श्लेष्मिक झिल्ली (म्यूकस मेम्ब्रेन) में प्रदाह हो जाता है तो उसे मूत्राशय प्रदाह, सिस्टाइटिस या इफ्लेमेशन ऑफ दि लैडर कहते हैं। इसमें मनाशय में असहनीय दर्द होता है तथा वार नारोशानी ना होती है।

सिस्टाइटिस - CYSTITIS IN HINDI

सिस्टाइटिस से जुडी कई ने जानकारी जैसे- 

  • सिस्टाइटिस  रोग के प्रमख कारण
  • सिस्टाइटिस रोग के प्रमुख लक्षण 
  • सिस्टाइटिस  रोग की पहिचान कैसे करें
  • सिस्टाइटिस  रोग का परिणाम
  • सिस्टाइटिस  के लिए पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा 

सिस्टाइटिस  रोग के प्रमख कारण- 

  • अधिक ठंढ लग जाना। 
  • मूत्र मार्ग का तंग होना। 
  • मिर्ची इत्यादि तेज और तीक्ष्ण पदार्थ के अधिक मात्रा में खाने से बाहरी चोट/आघात। 
  • मूत्राशय में पथरी अथवा सुजाक रोग। 
  • कैथेटर डालकर पेशाब कराने के समय मसाने में चोट आने से। 
  • कैन्धरिस, कोपेवा (मूत्र सम्बंधित एलोपैथिक दवाई) आदि उत्तेजक औषधि अधिक दिनों तक सेवन करने से। 
  • विभिन्न प्रकार के वात रोग। वृद्धावस्था में मसाने के कमजोर पड़ने से। 
  • लकवा (Paralysis) मूत्राशय, गुर्दे, आँत, मलाशय एवं गर्भाशय के दूसरे अंगों में संक्रमण (Infection) के फैल जाने से। मूत्राशय के अर्बुद । 
  •  नर्वस रोग।

सिस्टाइटिस  रोग के लक्षण- 

  • मूत्राशय के स्थान पर दर्द का होना। 
  • शरीर या गुप्तांग में अकड़न का होना।  
  • भार का प्रतीत होना। 
  • बार-बार पेशाब जाने  की इच्छा।  
  • मूत्र में जलन। 
  • अंगों में शीत एवं कंपकंपी का होना। 
  • मूत्र में मिला हुआ अथवा अन्त में पूय (Pus) जिसे हम मवाद भी कहते हैं वह निकलता है। 
  • यह रोग निम्न 2 प्रकार का होता है 1. तीव्र मूत्राशय शोथ (Acute Cystitis) | 2. चिरकारी मूत्राशय शोथ (ChronicCystitis)
  • तीव्र मूत्राशय शोथ के लक्षण पूय की मात्रा अधिक नहीं। मूत्र के साथ रक्त की उपस्थिति। 
  • आरम्भ में मूत्र अम्लीय पर शीघ्र क्षारीय। 
  • मूत्र त्याग बार-बार एवं पीड़ा। 
  • ज्वर, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि आदि लक्षण साथ में। 
  • चिरकारी मूत्राशय शोथ के लक्षण पूय की मात्रा अधिक। 
  • मूत्र प्रारम्भ से ही क्षारीय। अन्य लक्षण मृदु रूप में।

सिस्टाइटिस  के लिए याद रखिए:-

  • तीव्र मूत्राशय शोथ में मूत्र त्याग हो चुकने के बाद भी पेशाब करने की इच्छा बनी रहती है। 
  • पीड़ा कुछ समय के लिए शांत हो जाती है। परंतु पथरी (Gall stone) के कारण मूत्राशय शोथ में पीड़ा शांत नहीं होती।

सिस्टाइटिस  रोग की पहिचान कैसे करें- 

  • रोग निदान में कोई कठिनाई नहीं। 
  • मूत्राशय शोथ' में दर्द ऊपर की ओर कमर तक फैल जाता है और 'वृक्क शोथ' में दर्द नीचे की ओर कमर से मूत्राशय की ओर फैलता है।
  • सिस्टाइटिस  रोग का परिणाम- 
  • नया रोग आसानी से ठीक हो जाता है। 
  • लम्बे समय तक रोग आसानी से ठीक नहीं होता। दुर्बलता तथा सेप्टीसीमिया होने से रोगी की मृत्यु।
  • रोग की चिकित्सा विधि कारण का पता लगाकर उसे दूर करें। 
  • तीव्र अवस्था में पूर्ण विश्राम। 
  • इस रोग में पेशाब रुक जाने की सम्भावना अधिक रहती है। 
  • पेशाब रुक जाने से. यदि दवा से शीघ्र लाभ न हो तो सॉफ्ट कैथेटर का प्रयोग करना चाहिये। 
  • परंतु बहुत सावधानी से। किसी तरह की चोट न लग जाये।

सिस्टाइटिस  के लिए पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा 

जल, बार्ली एवं अन्य तरल पदार्थों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें। रोगी को मिश्री का पानी, ईसबगोल या तुकमलंगा का भिगोया हुआ पानी, कच्चे  नारियल का पानी, छेने का पानी, बराबर की मात्रा में कच्चा दूध और पानी, बर्फ आदि सब ठंडे पेय पीने को दें। 

'मूत्राशय' के ऊपर सदैव गरम पानी की पट्टी रखनी चाहिये।

दोस्तों मै उम्मीद करता हु की सिस्टाइटिस से जुडी इस जानकारी में आपको साडी चीजे अच्छे से समझ में आ गए होंगे, सिस्टाइटिस से जुडी यह जानकारी जरूरतमंद लोगो को नहीं हो पाती. तो आपसे निवेदन हैं की इस जानकारी को शेयर जरूर करें. 


ट्रैवल सिकनेस क्या हैं? (यात्रा के दौरान उल्टी का कारण)

जो लोग सड़क, समुद्र या हवाई यात्रा करते समय बीमार हो जाते हैं, उन्हें ट्रैवल/मोशन सिकनेस का सामना करना पड़ता है। 2 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों और महिलाओं को मोशन सिकनेस का खतरा अधिक होता है, लेकिन यह किसी को भी प्रभावित कर सकता है। मोशन सिकनेस तब होती है जब आपका दिमाग आपकी आंखों, कानों और शरीर से भेजी गई जानकारी को समझ नहीं पाता है।


किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है? (Who gets travel/motion sickness quickly)

मोशन सिकनेस हर व्यक्ति को नहीं होता लेकिन मोशन सिकनेस होने के चांसेज कुछ केस में बढ़ जाते हैं, जैसे की- 

माइग्रेन्स (Migraine) – सिर के केवल एक हिस्से में दर्द या असहनीय पीड़ा को माइग्रेन्स कहते हैं. 

(पढ़ेमाइग्रेन क्या हैं व लक्ष्ण )

प्रेग्नेंसी(Pregnancy)– प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं का शरीर पहले के जैसे नहीं रह पाता जिसके चलते उन्हें ट्रैवल सिकनेस का सामना करना पड़ता हैं, और ट्रैवल सिकनेस जल्दी होती हैं. 

मेंस्ट्रुअल पीरियड्स (Menstrual Periods)- सामन्यतौर पर किसी लड़की की 11 से 13 वर्ष की आयु में मासिक धर्म प्रारम्भ होते हैं और करीबन 3 से 5 दिन या 2 से 7 दिन तक चलते हैं. और मेंस्ट्रुअल पीरियड्स के चलते यात्रा के दौरान उन्हें ट्रैवल सिकनेस होने के चांस ज्यादा होता हैं. 

पार्किंसंस डिसीज (Parkinson’s Disease) – इस डिसीज में मानव दिमाग के एक क्षेत्र में तंत्रिका कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. जिसके चलते मोशन सिकनेस हमारी बॉडी पर हावी होती हैं. 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? (What causes travel sickness)

हमारा दिमाग आपके शरीर के मोशन-सेंसिंग पास से सिग्नल्स प्राप्त करता है : आपकी आंखें, आंतरिक कान, मांसपेशियां और जॉइन्ट्स। जब ये अंग परस्पर विरोधी सूचनाएं भेजते हैं तो दिमाग भ्रमित हो जाता है और प्रतिक्रिया आपको बीमार महसूस कराती है. 

  • मोशन के दौरान कुछ पढ़ना
  • भरा/खाली पेट 
  • आंखें पास से गुजरते पेड़ों को देखती हैं

मोसन सिकनेस से बचने के उपाय (Ways To Avoid Moson Sickness)

अदरक की जड़-

अदरक की जड़ का सेवन सबसे कारगर उपाय है। अदरक में कुछ मतली-विरोधी प्रभाव होते हैं, जो में मतली की इच्छा को रोक सकते हैं। आप अदरक की जड़ को चाय, कैप्सूल, टैबलेट या कैंडी में उपलब्धता के अनुसार ले सकते हैं। के गर्भवती महिलाओं को अदरक का इस्तेमाल करने से पहले हमेशा डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

खट्टे फल- 

सबसे अधिक सेवन किए जाने वाले खट्टे फल जैसे संतरे और अंगूर मोशन सिकनेस से लड़ने के काम आ सकते हैं। तेज स्वाद के कारण, इन फलों को यात्रा के दौरान लोगों को बेहतर महसूस कराने के लिए अच्छा माना जाता है।

पुदीना और भुनी हुई लौंग-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

भारी भोजन न करें-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें-

यात्रा के दौरान किताबें पढ़ना या लैपटॉप पर काम करना या मोबाइल फोन का उपयोग करना आकर्षक हो सकता है। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारक है जो मतली की भावना को ट्रिगर करता है। पुस्तक या मोबाइल स्क्रीन में शब्द स्थिर होते हैं लेकिन आपका परिवेश मोशन में होता है। यह आपके मस्तिष्क को 2 मिश्रित संकेत भेजेगा और मतली को ट्रिगर करेगा।

ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण (Symptoms Of Travel/Motion Sickness)-

  • ठंडा पसीना आना 
  • मतली उल्टी होना 
  • सिर दर्द करना 
  • चक्कर आना 
  • तेजी से सांस लेना व थकान 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे (How To Avoid Travel/Motion Sickness)- 

  • पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें 
  • यात्रा के दौरान आपकी बैठने की स्थिति मोशन सिकनेस से निपटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • फ्रंट सीट
  • खिड़की के पास बैठना, आगे की ओर मुंह करके (ट्रेन चलने की दिशा में) बैठना 
  • वाहन की मिडिल सीट्स को बुक करें 
  • यात्रा में अपना मन लगाये रखना 
  • यात्रा के दौरान बात कर के मन बहलाना 

तो दोस्तों उम्मीद हैं की, आज की इस आर्टिकल में बतायी गयी जानकारी जिसमे हमने जाना ट्रैवल सिकनेस क्या है?, किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है?, ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? मोसन सिकनेस से बचने के उपाय? ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण? और ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे? इन सब की जानकारी हमने आपको दी. यदि आपको यह ट्रैवल सिकनेस से जुडी जानकारी उपयोगी लगी हो तो इस जानकारी को शेयर जरूर करें. 

आंखों की आम बीमारियां | Common Eye Diseases

आज बढ़ते प्रदुषण के समय में यदि पर्यावरण के अलावा और भी कोई चीज हैं जो ज्यादा प्राभावित हुई हैं तो वह हैं मानव शरीर की इन्द्रियां. जिन इन्द्रियों में सबसे महत्वपूर्ण होता हैं हमारी आँखे, आँखों के बिना किसी व्यक्ति का जीवन में अँधेरा हो जाता हैं. आज के इस आर्टिकल में हम आपको आंखों की आम बीमारियो के बारे में जानकारी देंगे. जिसे जानने के बाद आप इन बीमारियों के प्रति जागरूक हो सकते हैं. 

Common Eye Diseases

01. ड्राई आईज सिंड्रोम (Dry Eyes Syndrome)- 

आंखें सूखना एक ऐसी समस्या है, जिसमें आंखों की आंसू बनाने वाली ग्रंथि तेजी से और सही मात्रा में आंसू नहीं बना पाती। केटकंजंक्टिविटिस सिक्काइस नाम से भी जाने-जानी वाली इस बीमारी में आंखों में खुजली, जलन, लाली और सूजन आ जाती है। कभी-कभी इसके कारण कम दिखना भी शुरू हो जाता है। 

02. कंजंक्टिवाइटिस (Conjunctivitis)-

कंजंक्टिवाइटिस में पलकों की अंदरूनी सतह और कॉर्निया को ढंकने वाले टिश्यू में सूजन आ जाती है। इसे पिंक आई, आंख आना या नेत्र शोथ के नाम से भी जाना जाता है। इसके मुख्य लक्षण, आंखों में लाली, खुजली, जलन, आंसू, आंखें हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं। 

इनके बिना हम जीवन की कल्पना करने से भी डरते हैं। आंखे इतनी नाजुक होती हैं कि इनको हुआ हल्का सा भी नुकसान इन्हें खराब कर सकता है। लेकिन इनके प्रति थोड़ी सी सावधानी बरतने से आंखों को सालों सालस्वस्थ्य रखा जा सकता है। कीचड़ और तेज चुभन हैं। यह बीमारी हर उम्र के लोगों को हो सकती है। इसका कारण, संक्रमण, रसायन का संपर्क और उत्तेजक पदार्थ, या एलर्जी होते हैं।

03. आंसू आना (Tears Fall)- 

इस बीमारी में आंखें रोशनी, हवा और तापमान में परिवर्तन के लिए बहुत संवेदनशील हो जाती है और आँखों से बहुत ज्यादा पानी आना शुरू हो जाता है। कभी-कभी धूप का चश्मा और अपनी आंखों को ढंककर इस बीमारी से बचा जा सकता हैकभी-कभी आंखों से लगातार पानी आना, समस्या का संकेत भी हो सकता है।

04. कॉर्नियल डिजीज (Corneal Disease)- 

कॉर्निया, आंखों के सामने साफ और गुंबद के आकार का होता है। यह आंखों पर पड़ने वाले प्रकाश पर फोकस करने में मदद करता है। कोई अन्य बिमारी, संक्रमण, चोट, या किसी टॉक्सिक पदार्थ के संपर्क में आने पर कॉर्निया क्षतिग्रस्त हो जाती है। जिसके कारण आंखें लाल होना, आंखों में पानी, दर्द, देखने की क्षमता कम होना, और हेलो इफेक्ट जैसी समस्या हो सकती है।

05. पलकों की समस्या (Eyelid Problems)- 

हमारी पलकें हमारी आंखों की सुरक्षा करते हैं। यही आंसू वितरण और आंख में प्रवेश करने वाली प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करते है। दर्द, खुजली, आंसू और प्रकाश के लिए आंखों का संवेदनशील. होना इसके आम लक्षण हैं। इसके अलावा डुपिंग आईलिड, पलक झपकाने पर ऐंठन, आईलैश के पास पलकों की बाहरी किनारों पर सूजन जैसी समस्या भी देखने को मिलती है।

06. आंखों की परेशानियां (Eye Problems)-

आंखें शरीर का प्रमुख अंग होती हैं। विभिन्न मौसम के अनुरुप आंखों में अनेक रोगों की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए आंखों से जुड़े विभिन्न लक्षण कई तरह के रोगों की ओर इशारा करते है। किसी भी प्रकार की बीमारी होने पर विशेषज्ञ सबसे पहले आंखों की जांच करते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि कई रोगों की जानकारी आंखों से ही मिलती है। जानते हैं कि आंखों में किसी भी तरह का बदलाव होने से क्रोन सौ बीमारियों का पता लगाया जा सकता है, और ऐसा करके आप आँखों की परेशानी का पता लगाकर उसका इलाज कर सकते हैं.  

07. एलर्जी (Allergies)-

आंखों में एलर्जी होना सामान्य बात है जिसका आंखों को गुलाबी रंगत से पता लगाया जा सकता है. एलर्जी किसी भी प्रकार की हो सकती है जैसे धूल-मिट्टी और धूप से भी।

08. आइराइटिस (Iritis)- 

कई बार आंखों में कचरा गिर या हल्की चोट लगने से आंख की पुतली और पर्दे प सूजन व जलन होने लगती है जिस वजह से आंख का रंग बदलकर बैंगनी हो जाता है। इस समस्या के आइराइटिस कहते हैं। वैसे तो आइराइटिस बड़ी ही सामान्य सी चीज लग रहो हो परन्तु यह बड़ा रूप ले कर गंभीर सम्सयायें भी उत्पन्न कर सकता हैं. 

09. काला मोतिया (काला मोतिया)- 

लंबे समय से दर्द महसूस होने और लालिमा दिखने से आंख में काले मोतिया की समस्या की आशंका हो सकती है।

 

10. ब्लेफेराइटिस (Blepharitis)- 

आंखों की पलकों के किनारे इंफेक्शन होने पर जब सूखापन, खिंचाव, सूजन और आंखों को खोलने व बंद करते समय दर्द महसूस हो तो इस समस्या को ब्लेफेराइटिस कहते हैं। 

11. गुहैरी (Guhairy)-

कई बार आंख के अंदरूनी या बाहरी भाग में इंफेक्शन होने के कारण दर्दभरी फुसी हो जाती है। इसे गुहैरी कहते हैं। ऐसे में आंख बंद करने में परेशानी महसूस होती है।

तो दोस्तों आंखों की आम बीमारियां | Common Eye Diseases से जुडी यह जानकारी आपको कैसी लगी कमेंट में बताएं, और आपसे निवेदन हैं की इस जानकारी को अपने सभी दोस्तों को शेयर जरूर करें ताकि वे भी इस जानकारी को जान सके और अपने आँखों को सुरक्षित रख सके. 

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आँखों की बिमारी – लक्षण उपचार और बचाव

दोस्तों आँखों की देखभाल करने की आदतें आपको आँखों की बड़ी बिमारी से बचा सकती हैं. आँखे हमारे बॉडी के सबसे महत्वपूर्ण अंगो में आता हैं. तो चलिए आज के इस आर्टिकल में जानते हैं Eye Disorders यानी की आँखों की बीमारियाँ और उन बीमारियों के लक्षण, कारण, उपाय और बचाव के बारे में जानेंगे.साथ ही साथ आपको कुछ  Eye Care Tips के बारें में भी जानकारी देंगे जिसके जरिये आप अपने आँखों की सुरक्षा खुद कर सकते हैं. 


01. कंजक्टिवाइटिस “आई फ्लू” (Conjunctivitis)

यह आँखों की आम बीमारी है जिसे हम आँख आना भी कहते हैं। हमारी आंखों में एक पारदर्शी पतली झिल्ली, कंजक्टिवा होती है जो हमारी पलकों के अंदरूनी और आंखों की पुतली के सफेद भाग को कवर करती है, इसमें सूजन आने या संक्रमित होने को कंजक्टिवाइटिस या आंख आना कहते हैं।

लक्षण-

  • इस बिमारी में रोगी कि आँख लाल हो जाती है, कीचड़ आता है, आंसू आते हैं, चुभन होती है तथा कभी कभी सूजन भी आ जाती है.

उपचार -

  • एंटीबायोटिक आई ड्राप जैसे जेंटामाइसीन आई ड्राप आँखों में छः बार एक
  • एक बूँद तीन दिनों तक डालना चाहिए. 
  • तीन दिनों में ठीक नहीं होने पर गंभीर बिमारी कि संभावना हो सकती है. अतः ऐसी स्थिति में नेत्र विशेषज्ञ से उपचार कराना चाहिए.
  • लापरवाही बरतने से इष्टि हमेशा के लिए जा सकती है.

बचाव-

यह संक्रामक बिमारी है जो संपर्क से फैलती है .

अतः अपनी आँखों को हाथ न लगावें. रोगी से हाथ मिलाने एवं उसकी वस्तुओं के इस्तेमाल से बचकर इस बिमारी के फैलाव को रोका जा सकता है.

02 . दृष्टिदोष (Visual Impairment)

कभी कभी हम अपने से दूर की वस्तुओ को देखने में परेशानी आती हैं और कई बार इसके विपरीत हमें पास की चीजो को देखने में भी दिक्कत आती हैं. इसे  दृष्टीदोष कहा जाता हैं. 

लक्षण- 

  • इसमें दूर कि वस्तुयें साफ़ नहीं दिखाई पड़ती हैं.
  • इस रोग से पीड़ित बच्चे किसी भी वास्तु को गौर से देखने की
  • कोशिश करते हैं.
  • शात्रा में ब्लेकबोर्ड के पास बैठते हैं. पढ़ते समय किताब को चेहरेके पास रखते हैं.ऐसे बच्चे स्वाभाविक रूप से सामान्य बच्चों कि तुलना में सुस्त एवं खेलकूद जैसी गतिविधियों से दूर रहने वाले होते हैं.

उपचार-

  • सही नंबर का चश्मा देकर इसका इलाज किया जाता है। ऐसे बच्चों को शासन दूवारा
  • निशुल्क चश्मा प्रदान किए जाने की व्यवस्था है।
  • चश्मा लगाने में शर्म हो तो कान्टेक्ट लेंस लगाये जा सकते हैं .
  • नंबर स्थिर होने पर लेज़र आपरेशन से चश्मा उतर सकता है .

बचाव-

  • यदि चश्मा समय पर नहीं पहनाया गया तो एम्ब्लायोपिया नामक बिमारी हो सकती है
  • जिसमें चश्मा लगाकर भी साफ़ नहीं देखाई देता . इसे पूर्ण रूप से रोका जा सकता है. सभी
  • शालाओं में साल में एक बार नेत्र परीक्षण अवश्य होना चाहिए.

03. विटामिन -ए' की कमी -

  • यह बच्चों में पाई जाने वाली एक गंभीर बीमारी है जिसे रतौंधी भी कहा जाता है। 
  • इसमें बच्चा रात में या कम रोशनी में स्पष्ट नहीं देख पाता।
  • यह कुपोषण या खाने मेँ विटामिन 'ए' की पर्याप्त मात्रा नहीं होने से उपजती है, जो दवा से ठीक हो सकती है। लेकिन इस बीमारी में लापरवाही स्थायी इष्टिहीनता का कारण भी बन सकता है। 

उपचार-

  • विटामिन 'ए' से भरपूर तत्वों वाले पदार्थों जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, पपीता, आम, कद्दू, गाजर, मुनगा, दूध, अंडा, मछली इत्यादि को भोजन मैं शामित्र किया जाना चाहिए. इसके अतिरिक्त बच्चे को विटामिन 'ए' की खुराक पांच वर्ष की उम्र तक हर छः महीने में देना चाहिए. यह दवा सभी स्वास्थ्य केन्द्रों तथा शासकीय अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध होती है. (दांतों को मजबूत करने के लिए क्या खाएं )

04. मोतियाबिंद (880०) –

  • यह बढ़ती उम्र के साथ होने वाली स्वाभाविक बीमारी है, अतः व्यापक जनवर्ग को प्रभावित करती है।
  • देश में कुल इष्टिहीनता का अस्सी प्रतिसत भाग मोतियाबिंद के वजह से होती है .
  • सामान्यतया यह बीमारी पचास वर्ष के बाद आँखों में होती है किन्तु कुछ कारणों से यह किसी भी उम्र मेँ हो सकती है .

लक्षण-

  • मोतियाबिंद होने पर प्रारम्भिक अवस्था में दूर कि वस्तुएं धुंधली दिखाई पड़ने लगती हैं तथा धीरे धीरे दृष्टि और कमजोर हो जाती है.
  • ऐसे लक्षण महसूस होने पर नेत्र विशेषज्ञ से मिल कर सलाह लेनी चाहिए.

उपचार-

  • मोतियाबिंद पूर्णतः साध्य बीमारी है एवं इसका इलाज केवल शल्य क्रिया से ही संभव है. अन्य किसी विधि से इसका इलाज संभव नहीं है. जब भी दैनिक कार्यों में कठिनाई हो इसकी शल्य क्रिया कराई जा सकती है. 
  • कच्चा या पक्का मोतियाबिंद से अंतर नहीं पड़ता.
  • मोतियाबिंद की शल्य क्रिया किसी भी ऋतु में एक सामान सफलता के साथ कराई जा सकती है. वर्तमान में लेंस प्रत्यारोपण विधि से शल्य क्रिया की जाती है जिसकी सुविधा जिला अस्पतालों, मेडिकल कालेज अस्पतालों तथा एन जी ओ अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है.
  • लेंस प्रत्यारोपण के पश्चात बारीक़ देखने के लिए चश्मा लग सकता है.
  • मोतियाबिंद का शल्य क्रिया नहीं कराने पर आँखों के भीतर का लेंस फट सकता है और
  • आँख में दर्द होता है . लैंस के फटने पर शल्यक्रिया तो करवानी ही पड़ती है लेकिन ऐसी
  • स्थिति में आँखों में रोशनी आने की संभावना नहीं होती.

 याद खखें–

  • मोतियाबिंद से इष्टिहीनता अस्थायी होती है, लेकिन हमारी लापरवाही इसे स्थायी बना सकती है.

05. ग्लाकोमा (कांचियाबिंद )

  • यह बीमारी उम्रजनित तथा आनुवांशिक भी होती है। इस बीमारी में आँख के अंदर का दबाव बढ़ जाता है जिससे आँख की नस सूखने लगती है। यह अत्यंत खतरनाक स्थिति होती है क्योंकि नस सूखने से आने वाली इृष्टिहीनता का कोई इलाज संभव नही है। 
  • यह दृष्टि वापस नहीं लाई जा सकती इसीलिए इसे काला मोतिया भी कहा जाता है।
  • अच्छी बात यह है कि प्रारम्भिक अवस्था में इसका निदान हो जाने पर दवाओं के माध्यम से इससे होने वाली दृष्टि की हानि को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • इस हेतु चालीस वर्षों की उम्र के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आँखों की जांच नेत्र विशेषज्ञ से विशेष रूप से ग्लाकोमा के लिए कराना ही चाहिए।

लक्षण-

  • ग्लाकोमा का लक्षण स्पष्ट नहीं होता लेकिन कुछ स्थितियों में इस बीमारी की शंका की जा सकती है - जैसे - सिर दर्द होते रहना। विशेष रूप से शाम के वक्‍त। दृष्टि का दायरा सिकुड़ता हुआ प्रतीत होना यानि सीधे देखते हुये अगल बगल की चीजों का दिखाई न पड़ना।
  • पदने के चश्में का नंबर जल्दी जल्दी बढना। 
  • रोशनी से अंधेरे में आने पर आँखों को अंधेरे का अभ्यस्त होने में हर सामान्य से अधिक वक्‍त लगता प्रतीत होना।
  • बल्ब आदि प्रकाश स्त्रोत अथवा चाँद के चारों ओर रंगीन वलय दिखलाई पड़ना।

उपचार-

  • दवाई से नियंत्रण संभव है। आपरेशन की आवश्यकता कम ही पड़ती है।

बचाव-

  • पुराने रिकार्ड सहित नियमित परीक्षण ही इसका एकमात्र बचाव है. 
  • जिनको पारिवारिक ग्लाकोमा हो, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज से पीड़ित हों, आँख में चोट लगी हो उनको ग्लाकोम कि संभावना अधिक होती है.

06. शुष्क आँख. - (ड्राई आई)

इस केस में हमारी आँखों के अन्दर भरी द्रव सुख जाता हैं और इसकी वजह से ना दिखने या धुंधला दिखने की समस्या आती हैं.

लक्षण-

  • आँखों में जलन, चुभन। 
  • आँखें लाल होना।
  • धुंधलापन आना जो पलकों को झपकने से दूर हो जाता हो।
  • पढ़ने, टी वी देखने, कम्यूटर पर काम करने के बाद आँखों में तकलीफ होना।

बचाव-

  • विटामिन 'ए' की कमी, पर्यावरण प्रदूषण, संक्रमण, दवाओं के दुष्प्रभाव, एयर कंडिशनर
  • का ज्यादा उपयोग, हार्मोन्स की कमी तथा उम्र का प्रभाव, अधिक देर तक आँखों को बिना
  • आराम दिये कम्यूटर में काम करना इत्यादि।
  • लुबरिकेटिंग आई ड्राप से आराम हो जाता है.
  • धूल, धूप, धुआओँ और गरम हवा से आँखों का बचाव।
  • बाहर जाते समय सुरक्षा चश्मों का इस्तेमाल।
  • पानी अधिक पियें।
  • गुटखा, गुड़ाखू, शराब, तंबाखू से परहेज।
  • लगातार पढ़ाई व कंप्यूटर पर अधिक देर तक काम नहीं करें.

06. डायबिटिक रेटिनोपेथी -

डायबिटीज़ की मौजूदगी के अलावा, आपकी रक्त शर्करा कितना नियंत्रित है, यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि आपमें दृष्टिहीनता के साथ डायबेटिक रेटिनोपैथी विकसित होने की कितनी संभावना है

लक्षण– 

  • आसमान में तैरती हुई चीजें दिखाई देना (Floaters) या काले धब्बे दिखना
  • रात को देखने में कठिनाई होना
  • धुंधला दिखना
  • दोहरा दिखाई देना
  • आंख में दर्द होना
  • मोतियाबिंद होना
  • अंधापन या ठीक से देख ना पाना
  • दृष्टि कम ज्यादा होना (कभी ज्यादा दिखने लगना कभी कम)
  • रंगों की पहचान करने में कठिनाई होना, रंग फीके लगना

07. आँखों में बाहरी वस्तु का गिरना-

  • मधुमेह (डायबिटीज) हमारे देश की बढ़ती हुई समस्या है। अनियंत्रित मधुमेह आँख के पर्दे पर घातक दुष्प्रभाव डालता है।
  • दृष्टि का धुंधला पन हो जाना.
  • काले थब्बे या काली रेखाएँ दिखना।
  • इसका एकमात्र बचाव मधुमेह पर नियंत्रण ही है।
  • रैटिनोपेथी या पर्दे की खराबी होने पर लेजर से सेंकाई, आँख में इंजेक्शन तथा शल्य क्रिया के द्वारा इसका इलाज किया जाता है जो अत्यंत कठिन होता है तथा सफलता की संभावना भी कम होती है।
  • मधुमेह के रोगी को आदर्श रूप से प्रति छह माह में आँख के पर्दे की जांच नेत्र विशेषज्ञ से कराते रहना चाहिए।
  • आते जाते हुये आँखों में धूल के कण, उड़ते हुये छोटे कीड़े गिर जाना आम घटना है। ऐसे में त्वरित उपचार में लापरवाही बरतने से आँखों को खासा नुकसान हो सकता है।

08. आँखों में चोट -

  • आखों के जलने/झुलसने या अम्लक्षार गिर जाने पर आँखों का राईनो  आँखों को हरगिज न मलें, इससे स्वच्छ पटल (कार्निया) पर जख्म बन सकता है तथा इष्टि भी जा सकती है।
  • आँखों को स्वच्छ शीतल जल के छीटों से धो लेवें ताकि कचड़ा निकल जाये।
  • आराम नहीं आने पर विपरीत करवट लेते हुए पत्रकों को बार बार चलायें, इससे कचडा बहकर नाक की तरफ आँख के किनारे आ जाएगा जिसे सावधानी से रुमाल और उँगलियों कि सहायता से निकाला जा सकता है.
  • ऐसे में भी आराम न मिले तो नेत्र विशेषज्ञ को दिखा कर उचित उपचार कराया जाना चाहिए।
  • सावधानी के लिए जब भी बाहर निकलें/ड्राइविंग करें सुरक्षा हेतु सादा चश्मा अवश्य लगाएं.
  • चोट आँखों के बाहरी या भीतरी हिस्से मैं लग सकती है।
  • भोथरी या नुकीली वस्तुओं से लग सकती है। चोट लगने पर तत्काल ही नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें.
  • यदि आँखों की रोशनी में कमी महसूस हो या आँखों में खून जमा दिखाई पड़े तो यह गंभीर लक्षण है.
  • आँख को बंद कर पैड लगाएं या रुमाल से ढक कर नेत्र विशेषज्ञ को दिखाएँ. आँख को मसलें नहीं. एंटीबायोटिक आई ड्राप हो तो डाल लें.
  • ध्यान रहे आँख से खून निकले या नुकीली वस्तु से चोट लगने पर कोई भी दवा या पानी आँख में न डालें. दर्दनिवारक गोली ले सकते हैं.
  • आखों को तरंत शीतल जल से कई बार धो लें।
  • आँखों में जीवाण्रोधी मलहम लगायें। अरतत्काल नेत्र विशेषज्ञ को दिखाकर उचित उपचार कराएं अन्यथा स्थायी इष्टिहीनता हो सकती है।
  • राइनों स्पोरोडिओसिस नामक यह बीमारी जानवरों से मनुष्यों में फैलती है। यह बीमारी उन तालाबों में नहाने से होती है जहां जानवर एवं मनुष्य एक साथ स्नान करते हैं।
  • यह बीमारी बच्चों को ही अधिकांशतः प्रभावित करती है। क्योंकि ये अधिक देर तक तालाब में डूबे रहते हैं.

लक्षण-

  • इसमें मरीज के आँख में लाल मस्सा बन जाता है जो बढ़ता जाता है, इससे खुन भी निकलता है, छुने से दर्द नहीं होता अधिक बढ़ जाने पर नजर को प्रभावित करता है।

उपचार-

  • आपरेशन के अलावा इसका कोई दुसरा उपचार नहीं है। बच्चों के आपरेशन में पूर्ण बेहोसी की
  • आवश्यकता होती है, जिसकी सुविधा बड़े अस्पतालों में होती है।

बचाव-

  • अतः सामाजिक संकल्प के साथ जानवरों एवं मनुष्यों के नहाने का तालाब पृथक रूप से चिन्हांकित किया जाना चाहिए ताकि इस बीमारी की रोकथाम शतप्रतिशत हो सके।

आखों की देखभाल के टिप्स (Eye Care Tips in Hindi) 

  • लेट कर ना पढ़ें, और कम रौशनी वाले स्थान में आधे घंटे से जयदा न पढ़े. 
  • आंखों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन ए , प्रोटीनयुक्त भोजन लेना चाहिए। (जाने – आँखों की रोशनी बढाने के लिए क्या खाएं )
  • विटामिन ए के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां और पीले फल ,आम,पपीता ,गाजर, कुम्हड़ा, मुनगा, खीरा ,अंडा, मछली,दूध, ।
  • प्रोटीन के लिए सोयाबीन बहुत अच्छा है, तीन किलो सोयाबीन के साथ सात किलो गेहूं मिला कर पिसवा लें और इसकी रोटी खाएं ।
  • अपनी आँखों को धूल और धूएँ से बचायें।अपनी आंखों की सुरक्षा के लिए घर से बाहर निकलने पर सादा चश्मा लगाएं ।
  • अपने लिविंग रूम में बहुत ज्यादा रोशनी या बहुत ज्यादा अंधेरा न रखें।
  • एलसीडी मॉनिटर्स का प्रयोग करें। इनसे आँखों पर जोर कम पड़ता है।
  • अपने कंप्यूटर स्क्रीन को हाथ भर के फासले पर रखें, अपनी आँखों के स्तर से नीचे।
  • टीवी स्क्रीन के आकार से तीन गुना दूर से देखें , भुत पास से ना देखें ।
  • कंप्यूटर पर टाइपिंग करते समय फॉंट साइज को बढ़ा लें।
  • साल में एक बार नेत्र विशेषज्ञ से आँखों की जांच जरुर कराएं, चाहे कोई परेशानी हो या ना हो ।
  • सप्ताह में एक दिन बारी -बारी से दोनों आँखों को स्वयं चेक करें दूर की नजर , पास की नजर तथा मेकुलर फंक्शन परीक्षण हेतु विजन काई मिलते हैं ।
  • आँखों की बीमारी होने पर स्वयं चिकित्सा न करें।
  • आँखों में काजल, सुरमे का इस्तेमाल न करें।
  • आंखों में कचरा, धूल का कण आदि पड़ने पर आँख को मलना नहीं चाहिए।
  • प्रतिदिन चार बार अपनी आंखों को स्वच्छ ठण्डे पानी से धोएं।
  • सुबह घास पर दस मिनट तक नंगे पैर टहलें, ऐसा करने से आँखों को आराम के साथ-साथ आँखों की रोशनी में भी वृद्धि होती हैं।
  • अपने मुँह में पानीभर लें और फिर ठंडे पानी की बूंदों से आँखों पर छींटे मारें, ऐसा सुबह पांच बार करें .

आंखों में समस्या होने पर लक्षण - 

  • दूर की या पास की वास्तु स्पष्ट ना दिखाई देना।
  • आँख एवं सिर में भारीपन, आँख लाल होना, आँख से पानी जाना, आँख में जलन होना, आँख में खुजली होना, आँख में सूखापन , रगों का साफ न दिखना।
  • पढाई करने से आंखों से पानी आने का अर्थ है आपकी आंखों की मांसपेशियां कमजोर हैं, ऐसे में आपको आंखों की एक्सरसाइज करनी चाहिए ।
  • यदि आंखों में बहुत ज्यादा तकलीफ या दर्द है तो तुरंत आई स्पेशलिस्ट से मित्रना चाहिए ।
  • यदि आपकी आंखें कमजोर है तो आपको किसी एक केंद्र बिंदु को फोकस कर कुछ देर तक उसे देखना चाहिए.
  • पेन की नोक पर फोकस करते हुए उसे धीरे-धीरे आगे पीछे करना चाहिए।
  • इस एकसरसाइज को दिन में तीन -चार बार करें।
  • आखों को सभी दिशाओं में धीरे| धीरे घुमाएँ-इससे आपकी आंखों की मसल्‍स मजबूत होंगी।
  • आंखों से कम दिखाई देने पर आपको आई स्पेशलिस्ट की सल्राह पर नजर का चश्मा लगाना।
  • चाहिए या फिर आप लेंस का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।नंबर स्थाई होने पर लेजर ऑपेरशन हो सकता है.

याद रखें – 

  • हम सभी बीमारियों को तो नहीं रोक सकते किन्तु तुरंत उपचार से जटिलता को अवश्य बचा सकते हैं।
  • नियमित नेत्र परीक्षण से बीमारी को प्रारंभिक अवस्था में पहचान लेने से समय ,पैसा और परेशानी बचती है तथा ठीक होने की भी ज्यादा संभावना होती है ।

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Eye Care Tips in Hindi

हमारी आखें ही एक मात्र जरिया हैं जिससे हम पूरी दुनियां को देखते हैं, अंधेपन और कम दृष्टि के प्रमुख कारण आयु से संबंधित रोग हैं। मैक्युलर डीजेनरेशन, मोतियाबिंद, डायबिटिक रेटिनोपैथी तथा ग्लूकोमा नाम की बीमारियों से आंख में खराबी आती हैं। एहतियात नहीं बरतने पर रोशन जाने का खतरा रहता हैं। रेटिनोपैथी में तो एक बार रोशनी चली जाय, तो दोबारा उसे नहीं लाया जा सकता। इसी लिए आज के इस आर्टिकल में हम Eye Care Tips के बारें में जानेंगे, अपनी आंखों की सुरक्षा करना तथा आंखों की रोशनी बनाए रखना जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने में मदद करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण चीजों में से एक हैं। Eye Care Tips निम्न हैं-

Eye Care Tips in Hindi

Eye Care Tips in Hindi -

  • पता करें कि क्या आप नेत्र रोगों के उच्च जोखिम में हैं
  • मधुमेह और उच्च रक्तचाप की जांच के लिए नियमित रूप से शारीरिक परीक्षण करवाएं
  • रोजाना व्यायाम करें
  • अपनी दृष्टि में परिवर्तन की चेतावनी संकेतों के लिए सजग रहें
  • अपनी आंखों को हानिकारक यूवी लाइट से बचाएं
  • स्वस्थ और संतुलित आहार ले

1. पता करें कि क्या आप नेत्र रोगों के उच्च जोखिम में हैं -

अपने परिवार के स्वास्थ्य इतिहास से अवगत रहे। क्या आप या आपके परिवार का कोई व्यक्ति मधुमेह (Diabetes) से पीड़ित है या किसी को उच्च रक्तचाप का इतिहास है? क्या आपकी उम 60 वर्ष से अधिक है? इन लक्षणों में से कोई भी दृष्टि को नष्ट करने वाले वाले नेत्र रोगों के आपके जोखिम को बढ़ाता है। 

देखेंओमिक्रॉन से जुडी सभी सवालों के जवाब 

2. मधुमेह और उच्च रक्तचाप की जांच के लिए नियमित रूप से शारीरिक परीक्षण करवाएं-

यदि अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो ये रोग आंखों की समस्या पैदा कर सकते हैं। विशेष रूप से, मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप डायबिटिक रेटिनोपैथी, मैक्युलर डीजेनरेशन और आई स्ट्रोक से दृष्टि हानि का कारण बन सकते हैं।

3. रोजाना व्यायाम करें-

अंतराल रखने से आंखों को नुकसान अध्ययनों से पता चलता है कि नियमित व्यायाम जैसे कि तेज़ चलना- उम्र से संबंधित मैक्युलर डीजेनरेशन के जोखिम को 70 प्रतिशत तक कम कर सकता है । (पढ़े - योग और व्ययाम के जबरदस्त फायदे )

4. अपनी दृष्टि में परिवर्तन की चेतावनी संकेतों के लिए सजग रहें-

यदि आप अपनी दृष्टि में परिवर्तन देखना शुरू करते हैं, तो अपने ऑप्टिशियन से तुरत मिले। देखने के लिए कुछ चेतावनी संकेत हैं सीध में होने, धुंधली दृष्टि और कम रोशनी की स्थिति में देखने में कठिनाई। आँखों की संभावित रूप से गंभीर समस्याओं के अन्य संकेत एवं लक्षण जिन पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए, वे हैं बाहरी लक्षण नहीं होते हैं, प्रकाश का अक्सर चमक उठना, फ्लोटर्स, और आँखों में दर्द और सूजन 

5. अपनी आंखों को हानिकारक यूवी लाइट से बचाएं –

दिन के समय बाहर जाने पर, हमेशा की डाक्टर की सलाह लेना आपके लिए बेहतर रहेगा। सनग्लास से आपकी आँखों को सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाता है। यह आपके मोतियाबिंद, पिंगुइकुला और आँखों की अन्य समस्याओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। (पढ़े - आँखों की रौशनी बढाने के घरेलु उपाय )

6. स्वस्थ और संतुलित आहार ले-

रोशनी बढ़ने में मदगार होते हैं फल अनुसंधान से पता चला है कि एंटीअक्सिडेंट संभवतः मोतियाबिंद के जोखिम को कम कर सकते हैं। ये एंटीऑक्सिडेंट फलों और रंगीन या गहरी हरी सब्जियों की भरपूर मात्रा वाले आहार लेने से प्राप्त होते हैं। 

अध्ययनों से यह भी पता चला है कि ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर मछली खाने से मैक्यूलर डीजेनरेशन होने का खतरा कम हो सकता है। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपको आँखों को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्त्व मिल रहे हैं, अपने आहार में आंखों के लिए उपयोगी विटामिन मिलाने पर विचार करें।

Eye Care Tips – आज के इस Eye Care Tips के आर्टिकल में हमने आँखों की रौशनी को बचाने के उपाय और आखों की देखभाल करने के तरीको के बारें जाना. यदि यह Eye Care Tips की जानकारी आपको उपयोगी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें. 

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Important Information About Omicron

बीते वर्ष में पहले ही बहुत तबाही मचा चुका कोरोना वायरस एक बार फीर नए वेरियंट के रूप में उभर रहा हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने ओमिक्रॉन (Omicron) नाम दिया हैं. इस ओमिक्रॉन (Omicron) वायरस के चलते ओमिक्रॉन (Omicron) से जुड़े कई सवाल सामने आये हैं, और वैज्ञानिक शोध में भी इसे खतरा बताया जा रहा हैं. आज के इस लेख में हम उन्ही कुछ महत्वपूर्ण सवाल और उनके जवाबो को जानेंगे – 

Omicron In Hindi

ओमिक्रॉन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ -

  • ओमिक्रॉन क्या है?
  • ओमिक्रॉन को चिंताजनक वैरिएंट क्यों माना जा रहा है? 
  • ओमिक्रॉन की म्यूटेशन काउंट क्या है? 
  • किन देशों में ओमिक्रॉन (कोरोना का नया वैरिएंट) पाया गया? 
  • ओमिक्रॉन कैसे उभरा? 
  • ओमिक्रॉन के खिलाफ टीके का क्या प्रभाव होगा? 
  • ओमिक्रॉन के लक्षण (Symptoms Of Omicron)

ओमिक्रॉन क्या है?

ओमिक्रॉन कोविड का एक नया रूप है, जिसे सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में खोजा गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यचओ) द्वारा बी.1.1.529 के रूप में पहचाने जाने वाले नए वैरिएंट को 'चिंताजनक वैरिएंट' घोषित किया गया है और इसे ओमिक्रॉन नाम दिया गया है।

ओमिक्रॉन को चिंताजनक वैरिएंट क्यों माना जा रहा है? -

तकनीकी टर्म बी.1.1.529 से जाना जाने वाला ओमिक्रॉन दर्शाता है कि वैरिएंट में बड़ी संख्या में म्यूटेशन्स हैं, जिनमें से कुछ में चिंताजनक लक्षण हैं। सरल शब्दों में, यह अधिक आसानी से फैल सकता है और ज्यादा गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

ओमिक्रॉन की म्यूटेशन काउंट क्या है? -

ओमिक्रॉन में कुल मिलाकर 50 म्यूटेशन्स हैं, जिसमें अकेले "स्पाइक प्रोटीन" पर 30 से अधिक म्यूटेशन्स शामिल हैं। भारी म्यूटेशन्स वायरस को वैक्सीन के प्रति अधिक प्रतिरोधी बना सकते हैं, फैलने की क्षमता बढ़ा सकते हैं और अधिक गंभीर लक्षण पैदा कर सकते हैं। स्पाइक प्रोटीन : यह वायरस का वह हिस्सा है, जो मानव कोशिकाओं से जुड़ता है, जिससे इसे प्रवेश मिलता है।

पढ़े बेहतरीन हेल्थ टिप्स - क्लिक करें 

किन देशों में ओमिक्रॉन(कोरोना का नया वैरिएंट) पाया गया? -

जिन देशों में नए कोविड वैरिएंट के मामले दर्ज किए हैं, वे हैं ऑस्ट्रेलिया, इटली, जर्मनी, नीदरलैंड, ब्रिटेन, इज़राइल, हांगकांग, बोत्सवाना और बेल्जियम हैं।

ओमिक्रॉन कैसे उभरा? -

यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि यह संस्करण कैसे उभरा। म्यूटेशन के असामान्य लक्षणों ने स्ट्रेन के तेजी से फैलने के बारे में आशंकाएं बढ़ा दी हैं। थोड़े ही समय में, यह दक्षिण अफ्रीका में नए संक्रमणों के बीच एक प्रमुख स्ट्रेन बन गया है।

ओमिक्रॉन के खिलाफ टीके का क्या प्रभाव होगा? -

अभी इस नतीजे तक पहुंचने के लिए बहुत कम रिसर्च हुआ है, विशेषज्ञों ने सावधानी बरतने का आग्रह किया है, लेकिन घबराने का नहीं। तमाम तरह की अटकलें हैं, लेकिन ओमिक्रॉन के खिलाफ टीकों के प्रभाव के बारे में कोई पुष्ट रिपोर्ट नहीं है। म्यूटेशन की अधिक संख्या के कारण ओमिक्रॉन सबसे अधिक चिंताजनक प्रकार है।

इलाज से बेहतर है सावधानी - 

महामारी अब तक खत्म नहीं हुई है और ना ही कोरोना अब तक गया है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम सभी महामारी संबंधी सावधानियां और कोविड सुरक्षा उपाय करें। - हर किसी को इस नए कोविड वैरिएंट - ओमिक्रॉन के बारे में जानने की जरूरत है। कृपया इस उपयोगी जानकारी को अपने परिवार और दोस्तों के साथ साझा करें। हम इसमें एकसाथ हैं। आप सुरक्षित हैं तो मैं भी सुरक्षित हूं।

ओमिक्रॉन के लक्षण | Symptoms Of Omicron 

  1. ओमिक्रॉन वैरिएंयट से संक्रमित मरीजों में अत्यधिक थकान देखने को मिली है।
  2. मरीजों के ऑक्सीजन के स्तर में कोई गंभीर गिरावट देखने को नहीं मिली है।
  3. मरीजों ने मांसपेशियों में दर्द, गला खराब होने और सूखी खांसी की शिकायत की है।
  4. डॉक्टरों के अनुसार कुछ मरीजों में ही तेज बुखार की समस्या सामने आई है।
  5. ओमिक्रॉन संक्रमित अधिकांश मरीजों को भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ी है।

कोरोना वायरस हो या ओमिक्रॉन जब तक आप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी और अपने सेहत का ख्याल खुद नही रखेंगे तब तक आप अपने आपको और अपने परिवार वालो को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं .आपसे निवेदन हैं की  कृपया ओमिक्रॉन से जुडी यह जानकारी सभी को साझा जरूर करें. 

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ब्रेन सर्जरी के फायदे | Benefits Of Brain Surgery

ब्रेन सर्जरी के क्षेत्र में एक वरदान है एंडोस्कोपिक ब्रेन सर्जरी चूंकि, ब्रेन सर्जरी (Brain Surgery) काफी संवेदनशील प्रक्रिया होती है, ब्रेन सर्जरी (Brain Surgery) से तात्पर्य ऐसी सर्जरी से है, जिसे मस्तिष्क या उसके आस-पास के अंग जैसे आंख, नाक, इत्यादि से संबंधित समस्याओं का समाधान करने के लिए किया जाता  है। मस्तिष्क की सर्जरी को करना काफी मुश्किल भरा काम होता है, इसलिए इसे अनुभवी डॉक्टरों द्वारा ही किया जाता है, ताकि इस दौरान किसी तरह का जोखिम न हो। इसी कारण इसे इन 5 स्थितियों में किया जाता है ब्रेन सर्जरी, जो इस प्रकार हैं –

Benefits Of Brain Surgery

ब्रेन ट्यूमर का इलाज करना -

ब्रेन सर्जरी को मुख्य रूप से ब्रेन ट्यूमर का इलाज करने के लिए किया जाता है क्योंकि यह सर्जरी ब्रेन ट्यूमर का सर्वोत्तम इलाज होती है। 

पार्किसन का उपचार करना -

मस्तिष्क की सर्जरी को उस स्थिति में भी किया जाता है, जब कोई व्यक्ति पार्किसन नामक बीमारी से पीड़ित होता है। यह सर्जरी इस बीमारी के उपचार का बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।

असामान्य रक्त वाहिकाओं को ठीक करना -

यदि किसी व्यक्ति की रक्त वाहिकाएं (Blood Vessel) असामान्य होती हैं, तो उन्हें सामान्य करने के लिए मस्तिष्क की सर्जरी को किया जाता है। 

ब्लड क्लोट्स को ठीक करना -

कई बार ब्रेन सर्जरी को ब्लड क्लोट्स को ठीक करने के लिए भी किया जाता है। कई बार किसी सर्जरी के कारण किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में ब्लड क्लोट्स हो जाता है, उस स्थिति में ब्रेन सर्जरी लाभकारी साबित हो सकती है।

ब्रेन स्ट्रोक के खतरेको कम करना –

कई बार मस्तिष्क की सर्जरी को उस स्थिति में किया जाता है, जब किसी व्यक्ति में ब्रेन स्ट्रोक के होने का खतरा रहता है। मस्तिष्क की सर्जरी के माध्यम से ब्रेन स्ट्रोक के खतरे को कम किया जाता है।

ब्रेन सर्जरी इन पाच कारणों से किया जाता हैं . ब्रेन सर्जरी  की यह जानकारी न होने पर हमे काफी डर लगा रहता हैं ब्रेन सर्जरी से जुडी यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें.  

25 की उम्र के बाद कराये जाने वाले टेस्ट

बढ़ते समय के साथ-साथ हमारे शरीर और स्वास्थ्य की भी उम्र बढ़ती जाती हैं जिसकी वजह से हमारे बॉडी में कई महत्वपूर्ण तत्वों की कमी होने लगती हैं और हमारा शरीर कमजोर होने लगता हैं. तो ऐसे में अपने सेहत को हमेशा अच्छे रखने और अपने शरीर में कमियों  को जान कर उन्हें दूर करने का एक उपाय परीक्षण होता हैं. जिसमें ज़चा के जरियें हम अपने बॉडी को समझ पाते हैं और अपने आप में सुधार ला सकते हैं, आज के इस लेख में हम जानेंगे कुछ ऐसे परीक्षण (Test) के बारे में जो आपको 25 की उम्र के बाद कराने ही चाहिए क्योंकि यह जांच आवश्यक होते हैं.

Necessary Physical Examination

25 की उम्र के बाद कराये जाने वाले टेस्ट – 

  • ECG टेस्ट (ECG Test) 
  • जेनेटिक टेस्ट (Genetic Test) 
  • लिपिड प्रोफाइल टेस्ट (Lipid Profile Test) 
  • लीवर कार्य परीक्षण (Liver Function Test) 
  • पैप स्मीयर (Pap Smear) 
  • कॉलोनोस्कोपी टेस्ट (Colonoscopy Test)
  • सामान्य परीक्षण (Routine Test) 

ECG टेस्ट (ECG Test) - 

हृदय संबंधी जटिलताएं कभी भी आ सकती हैं। ECG (इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम) टेस्ट करवाना सेहत के लिए जरुरी है और फायदेमंद भी है क्योंकि इस आसान सस्ते टेस्ट के द्वारा आप समय से पहले दिल की बीमारियों का पता लगा सकते हैं ताकि बाद में वो खतरनाक रूप न ले लें। अगर आप दिल की बीमारियों का पता ठीक समय से लगा लेते हैं, तो इन्हें आसानी से ठीक किया जा सकता है।

जेनेटिक टेस्ट (Genetic Test) -

आनुवंशिक परीक्षण या जेनेटिक टेस्ट एक प्रकार का चिकित्सा परीक्षण है जो जीन, गुणसूत्र या प्रोटीन में परिवर्तन की पहचान करता है। इस परीक्षण के जरिए रक्त के नमूने का विश्लेषण किया जाता है। जांच के परिणाम से शुरुआती उपचार विकल्पों का चयन करने में मदद मिलती है। यदि आप बच्चा पैदा करने की योजना बना रहे हैं, तो ये टेस्ट मददगार है। इस टेस्ट के माध्यम से होने वाले बच्चे को माता-पिता से कोई जेनेटिक डिसऑर्डर होगा, उसका पता चल जाता है और आप जरूरी सावधानी ले सकते हैं।

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट (Lipid Profile Test) - 

एक पूर्ण लिपिड प्रोफाइल परीक्षण आपके कोलेस्ट्रॉल के स्तर-अच्छे और बुरे के बारे में विस्तार से बता सकता है और आपको यह संकेत दे सकता है कि आपका दिल कितना स्वस्थ है। हर दो साल में एक बार पूर्ण परीक्षण के लिए जाना 30 साल की उम्र के बाद मददगार हो सकता है। स्वस्थ लक्ष्य LDL (कम घनत्व वाले लिपोप्रोटीन) <130 और LDL (उच्च घनत्व वाले लिपोप्रोटीन]> 60 जैसा कुछ होना चाहिए।

इन्हें भी पढ़े - स्वास्थ्य जीवन के 05 मूल मंत्र 

लीवर कार्य परीक्षण (Liver Function Test) - 

लिवर केमिस्ट्री टेस्ट, जो कुछ शारीरिक एंजाइमों, प्रोटीन, ट्राइग्लिसराइड्स के चार्टिंग को मापकर काम करते हैं, यह निर्धारित कर सकते हैं कि आपका लीवर कितना स्वस्थ है। 30 साल की उम्र में प्रवेश करने के बाद हर दूसरे साल में ये टेस्ट जरूर करवाएं। (पढ़े - लीवर को स्वास्थ्य रखने के लिए क्या खाएं )

पैप स्मीयर (Pap Smear) - 

यह गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) में कैंसर के शुरुआती लक्षणों की जांच करने का एक टेस्ट है। सर्वाइकल कैंसर के अलावा एचपीवी संक्रमण की जांच के लिए भी पैप स्मीयर टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है। सही समय पर पैप स्मीयर जांच करवाने से सर्वाइकल कैंसर का पहले ही पता लगाया जा सकता है। यह गर्भाशय में उन कोशिकाओं को पता लगाती हैं जो कैंसर ग्रस्त हैं या भविष्य में जिनके कैंसर ग्रस्त होने की संभावना है।

कॉलोनोस्कोपी टेस्ट (Colonoscopy Test) - 

पुरुषों के लिए कोलोनोस्कोपी टेस्ट जरूरी है। जबकि इस तरह के परीक्षण आमतौर पर 45-50 वर्ष की आयु के बाद किए जाते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि पुरुषों को अपने 30 के दशक में ही परीक्षण करवाना शुरू कर देना चाहिए, खासकर यदि उनके पास कोलन कैंसर का प्रथम-डिग्री रिश्तेदार या पारिवारिक इतिहास है। टेस्ट आंतों की समस्याओं, रक्तस्राव के साथ-साथ कोलन कैंसर के संकेतों की जांच करने में मदद कर सकते हैं।

सामान्य परीक्षण (Routine Test) - 

इन चेक-अप के अलावा, कई अन्य स्क्रीनिंग टेस्ट हैं, जिन्हें करना चाहिए। इसमें थायराइड फंक्शन टेस्ट और किडनी फंक्शन टेस्ट महत्वपूर्ण हैं। आमतौर पर, डॉक्टरों द्वारा इन परीक्षणों की सिफारिश की जाती है, लेकिन यह सलाह दी जाती है कि अपने प्रमुख सिस्टम/अंगों को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी जांच करवाएं।

तो दोस्तों यदि आपका उम्र 25 वर्ष या उससे ज्यादा हैं तो कृपया इस जानकारी को जानने के साथ इनमें से जरूरी परिक्षण जरूर करवाएं. आज की यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो तो इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें. 

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अंतर्हद शोथ/एण्डोकार्डाइटिस (ENDOCARDITIS)

एंडोकार्डिटिस (Endocarditis) दिल की आंतरिक परत पर होने वाला एक संक्रमण है।एन्डोकार्डिटिस आमतौर पर तब होता है जब आपके शरीर के किसी दूसरे हिस्से से बैक्टीरिया या अन्य रोगाणु, जैसे आपके मुंह से, आपके रक्त प्रवाह में होते हुए, दिल के क्षतिग्रस्त हिस्सों में पहुंचता है। इस रोग के निम्न दो रूप मुख्यतया पाए जाते हैं रियुमेटिक अंतर्दृत् शोथ (Rheumatic Endocarditis); संक्रमणजन्य अन्तर्हत् शोथ (Infective Endocarditis)। चिकित्सा क्षेत्र में संक्रमणजन्य अंतर्हत् शोथ का विशेष महत्व है और अधिकांश रोगी जनरल प्रेक्टिस में मिलते हैं। उपयोगिता की दृष्टि से इसी का विवरण नीचे दिया रहा है।

What Is Endocarditis Is Hindi

एण्डोकार्डाइटिस के प्रमुख कारण (Major Causes Of Endocarditis)

  • यह स्ट्रेप्टोकोकस विरीडेन्स, स्टेफिलो कोकस ऑरियस, न्यूमोकोकस, ग्रुप ए स्ट्रेप्टोकोकस, गोनोकोकस, ब्रूसेला एवं रिकेटसिया आदि कीटाणुओं के कारण विशेष रूप से होता है। सामान्य रूप से टॉन्सिललेक्टोमी दाँत निकलना (Dental extraction) अथवा पूयमय सैलूलाइटिस एवं ओपिन हार्ट सर्जरी आदि अवस्थाओं से रोग का प्रसार होता है।
  • जन्मजात हृदय रोग जैसे-विकृत धमनी वाहिनी, फुफ्फुस कपाटिका संकीर्णता आदि में भी इस विकार के होने की सम्भावना रहती है। 
  • नॉन-हीमोलाइटिक स्ट्रेप्टोकोकाई जो कि दन्त, दन्तमास, टॉन्सिल्स में प्रायः पाए जाते हैं, विकारग्रस्त हृत् कपाटिकाओं को इस रोग से पीडित कर देते हैं।
  • ओरल एक्टिविटी के कारण मुंह में मौजूद बैक्टीरिया खून में पहुंच जाते हैं। अगर आप अपने मुंह को नियमित रूप से साफ नहीं करते हैं तो ये मसूड़ों से निकलने वाले खून के द्वारा आपके दिल के अंदरूनी टिश्यू में चले जाते हैं।

एण्डोकार्डाइटिस के प्रमुख लक्षण (Major Symptoms Of Endocarditis)

  • शीत के साथ बुखार कंपपाहट एवं पसीने के साथ उतरना। 
  • कार्डियक फेल्योर का सम्बन्ध होने पर बढ़ती हुई रक्ताल्पता (Anemia)/ माह तक बुखार की अनुपस्थिति। 
  • रोग का आक्रमण शनैः-शनैः । 
  • अरुचि (Anorexia) । रोगी का अचानक ही कमजोर हो जाना। 
  • कमर दर्द का होना 
  • सास लेते समय सीने में दर्द की अनुभूति होना
  • व्याकुलता एवं थकान का होना 
  • हाथ पैर क जोड़ो में दर्द (Pain in Joint) 
  • त्वचा के नीचे रक्तस्राव। 1020 से 40 वर्ष की अवस्था में।
  • बहुत अधिक मेहनत करने वालों को भी यह हो सकता है।
  • हृदय के अग्र भाग में तेज स्पंदन या धड़कन।(पढ़े - सीने में जलन क्यों होता हैं )

एण्डोकार्डाइटिस की पहचान (Diagnosis Of Endocarditis)

  • यदि हृदय की कपाटिकायें (Valves) व्याधिग्रस्त हों अथवा इनका विकार जन्म से ही उपस्थित हो और साथ में ज्वर कुछ दिन तक निरन्तर बना रहने लगे तो इस रोग का संदेह करना चाहिये। 
  • ईएस. आर. (ESR) बढ़ा हुआ मिलता है। 
  • 'ल्यूकोसिटोसिस' एवं 'हाईपोक्रोमिक अनीमिया (Anemia) भी उपस्थित।

एण्डोकार्डाइटिस का परिणाम (Result Of Endocarditis)

  • यदि रोग निर्णय आरम्भ में ही हो जाय तो 90% रोगी ठीक हो सकते हैं। 
  • विलम्ब से निदान होने पर पूर्वानुमान गम्भीर। 
  • विशेषकर हार्ट फेल्योर, यूरीमिया (Uraemia) तथा गम्भीर स्वरूप की अनीमिया की स्थिति में। 
  • अति घातक रोग। एक से 4 सप्ताह में मृत्यु।

एण्डोकार्डाइटिस की चिकित्सा विधि (Endocarditis therapy method)

  • जहाँ तक सम्भव हो रक्त संवर्धन (Blood Culture) द्वारा रोग के जीवाणुओं को पृथक कर एवं एण्टीबायोटिक्स के प्रति उसकी सुग्राहिता की जाँच कर उपयुक्त औषधि की व्यवस्था करनी चाहिये। 
  • जितने भी सहायक कारण हों उन्हें दूर करना चाहिये। 
  • कोई दूषित व्रण आदि हो तो शल्य कर्म से आरोग्य करायें। जैसे-दाँत, मसूड़े आदि में घाव हो या जीवाणु हों तो उन्हें तुरन्त निकलवा दें। 
  • आँतों की सफाई तथा कब्जियत पर विशेष ध्याना।
  • खाने से पहले मुह की सफाई आवश्यक करें।

एण्डोकार्डाइटिस का सहायक चिकित्सा (Adjuvant Therapy Of Endocarditis)

  • स्वच्छ हवा एवं प्रकाश युक्त स्थान में रहना।
  • तरल भोजन का सेवन करें।
  • गर्म पानी में थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर हमेशा पिलाते रहें। 
  • रोगी को दो-तीन माह तक पूर्ण आराम करायें। 
  • प्रचुर मात्रा में प्रोटीन एवं विटामिन्स तथा लौह से युक्त पदार्थों का सेवन कराते हैं।  
  • अरक्तता दूर करने के लिये बीच-बीच में रक्ताधान (Blood Transfusion)।

तो आज के इस लेख में हमने एण्डोकार्डाइटिस के बारे ने जाना जिसमे हमने जाना - एण्डोकार्डाइटिस क्या हैं ?, एण्डोकार्डाइटिस के लक्ष्ण, एण्डोकार्डाइटिस की पहचान और उपाय  के बारें में. यदि यह जानकरी आपको उपयोगी लगी हो तो इस जानकारी को शेयर करें. 

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