आँखों की बिमारी – लक्षण उपचार और बचाव
दोस्तों आँखों की देखभाल करने की आदतें आपको आँखों की बड़ी बिमारी से बचा सकती हैं. आँखे हमारे बॉडी के सबसे महत्वपूर्ण अंगो में आता हैं. तो चलिए आज के इस आर्टिकल में जानते हैं Eye Disorders यानी की आँखों की बीमारियाँ और उन बीमारियों के लक्षण, कारण, उपाय और बचाव के बारे में जानेंगे.साथ ही साथ आपको कुछ Eye Care Tips के बारें में भी जानकारी देंगे जिसके जरिये आप अपने आँखों की सुरक्षा खुद कर सकते हैं.
01. कंजक्टिवाइटिस “आई फ्लू” (Conjunctivitis)
यह आँखों की आम बीमारी है जिसे हम आँख आना भी कहते हैं। हमारी आंखों में एक पारदर्शी पतली झिल्ली, कंजक्टिवा होती है जो हमारी पलकों के अंदरूनी और आंखों की पुतली के सफेद भाग को कवर करती है, इसमें सूजन आने या संक्रमित होने को कंजक्टिवाइटिस या आंख आना कहते हैं।
लक्षण-
- इस बिमारी में रोगी कि आँख लाल हो जाती है, कीचड़ आता है, आंसू आते हैं, चुभन होती है तथा कभी कभी सूजन भी आ जाती है.
उपचार -
- एंटीबायोटिक आई ड्राप जैसे जेंटामाइसीन आई ड्राप आँखों में छः बार एक
- एक बूँद तीन दिनों तक डालना चाहिए.
- तीन दिनों में ठीक नहीं होने पर गंभीर बिमारी कि संभावना हो सकती है. अतः ऐसी स्थिति में नेत्र विशेषज्ञ से उपचार कराना चाहिए.
- लापरवाही बरतने से इष्टि हमेशा के लिए जा सकती है.
बचाव-
यह संक्रामक बिमारी है जो संपर्क से फैलती है .
अतः अपनी आँखों को हाथ न लगावें. रोगी से हाथ मिलाने एवं उसकी वस्तुओं के इस्तेमाल से बचकर इस बिमारी के फैलाव को रोका जा सकता है.
02 . दृष्टिदोष (Visual Impairment)
कभी कभी हम अपने से दूर की वस्तुओ को देखने में परेशानी आती हैं और कई बार इसके विपरीत हमें पास की चीजो को देखने में भी दिक्कत आती हैं. इसे दृष्टीदोष कहा जाता हैं.
लक्षण-
- इसमें दूर कि वस्तुयें साफ़ नहीं दिखाई पड़ती हैं.
- इस रोग से पीड़ित बच्चे किसी भी वास्तु को गौर से देखने की
- कोशिश करते हैं.
- शात्रा में ब्लेकबोर्ड के पास बैठते हैं. पढ़ते समय किताब को चेहरेके पास रखते हैं.ऐसे बच्चे स्वाभाविक रूप से सामान्य बच्चों कि तुलना में सुस्त एवं खेलकूद जैसी गतिविधियों से दूर रहने वाले होते हैं.
उपचार-
- सही नंबर का चश्मा देकर इसका इलाज किया जाता है। ऐसे बच्चों को शासन दूवारा
- निशुल्क चश्मा प्रदान किए जाने की व्यवस्था है।
- चश्मा लगाने में शर्म हो तो कान्टेक्ट लेंस लगाये जा सकते हैं .
- नंबर स्थिर होने पर लेज़र आपरेशन से चश्मा उतर सकता है .
बचाव-
- यदि चश्मा समय पर नहीं पहनाया गया तो एम्ब्लायोपिया नामक बिमारी हो सकती है
- जिसमें चश्मा लगाकर भी साफ़ नहीं देखाई देता . इसे पूर्ण रूप से रोका जा सकता है. सभी
- शालाओं में साल में एक बार नेत्र परीक्षण अवश्य होना चाहिए.
03. विटामिन -ए' की कमी -
- यह बच्चों में पाई जाने वाली एक गंभीर बीमारी है जिसे रतौंधी भी कहा जाता है।
- इसमें बच्चा रात में या कम रोशनी में स्पष्ट नहीं देख पाता।
- यह कुपोषण या खाने मेँ विटामिन 'ए' की पर्याप्त मात्रा नहीं होने से उपजती है, जो दवा से ठीक हो सकती है। लेकिन इस बीमारी में लापरवाही स्थायी इष्टिहीनता का कारण भी बन सकता है।
उपचार-
- विटामिन 'ए' से भरपूर तत्वों वाले पदार्थों जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, पपीता, आम, कद्दू, गाजर, मुनगा, दूध, अंडा, मछली इत्यादि को भोजन मैं शामित्र किया जाना चाहिए. इसके अतिरिक्त बच्चे को विटामिन 'ए' की खुराक पांच वर्ष की उम्र तक हर छः महीने में देना चाहिए. यह दवा सभी स्वास्थ्य केन्द्रों तथा शासकीय अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध होती है. (दांतों को मजबूत करने के लिए क्या खाएं )
04. मोतियाबिंद (880०) –
- यह बढ़ती उम्र के साथ होने वाली स्वाभाविक बीमारी है, अतः व्यापक जनवर्ग को प्रभावित करती है।
- देश में कुल इष्टिहीनता का अस्सी प्रतिसत भाग मोतियाबिंद के वजह से होती है .
- सामान्यतया यह बीमारी पचास वर्ष के बाद आँखों में होती है किन्तु कुछ कारणों से यह किसी भी उम्र मेँ हो सकती है .
लक्षण-
- मोतियाबिंद होने पर प्रारम्भिक अवस्था में दूर कि वस्तुएं धुंधली दिखाई पड़ने लगती हैं तथा धीरे धीरे दृष्टि और कमजोर हो जाती है.
- ऐसे लक्षण महसूस होने पर नेत्र विशेषज्ञ से मिल कर सलाह लेनी चाहिए.
उपचार-
- मोतियाबिंद पूर्णतः साध्य बीमारी है एवं इसका इलाज केवल शल्य क्रिया से ही संभव है. अन्य किसी विधि से इसका इलाज संभव नहीं है. जब भी दैनिक कार्यों में कठिनाई हो इसकी शल्य क्रिया कराई जा सकती है.
- कच्चा या पक्का मोतियाबिंद से अंतर नहीं पड़ता.
- मोतियाबिंद की शल्य क्रिया किसी भी ऋतु में एक सामान सफलता के साथ कराई जा सकती है. वर्तमान में लेंस प्रत्यारोपण विधि से शल्य क्रिया की जाती है जिसकी सुविधा जिला अस्पतालों, मेडिकल कालेज अस्पतालों तथा एन जी ओ अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध है.
- लेंस प्रत्यारोपण के पश्चात बारीक़ देखने के लिए चश्मा लग सकता है.
- मोतियाबिंद का शल्य क्रिया नहीं कराने पर आँखों के भीतर का लेंस फट सकता है और
- आँख में दर्द होता है . लैंस के फटने पर शल्यक्रिया तो करवानी ही पड़ती है लेकिन ऐसी
- स्थिति में आँखों में रोशनी आने की संभावना नहीं होती.
याद खखें–
- मोतियाबिंद से इष्टिहीनता अस्थायी होती है, लेकिन हमारी लापरवाही इसे स्थायी बना सकती है.
05. ग्लाकोमा (कांचियाबिंद )
- यह बीमारी उम्रजनित तथा आनुवांशिक भी होती है। इस बीमारी में आँख के अंदर का दबाव बढ़ जाता है जिससे आँख की नस सूखने लगती है। यह अत्यंत खतरनाक स्थिति होती है क्योंकि नस सूखने से आने वाली इृष्टिहीनता का कोई इलाज संभव नही है।
- यह दृष्टि वापस नहीं लाई जा सकती इसीलिए इसे काला मोतिया भी कहा जाता है।
- अच्छी बात यह है कि प्रारम्भिक अवस्था में इसका निदान हो जाने पर दवाओं के माध्यम से इससे होने वाली दृष्टि की हानि को नियंत्रित किया जा सकता है।
- इस हेतु चालीस वर्षों की उम्र के बाद प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आँखों की जांच नेत्र विशेषज्ञ से विशेष रूप से ग्लाकोमा के लिए कराना ही चाहिए।
लक्षण-
- ग्लाकोमा का लक्षण स्पष्ट नहीं होता लेकिन कुछ स्थितियों में इस बीमारी की शंका की जा सकती है - जैसे - सिर दर्द होते रहना। विशेष रूप से शाम के वक्त। दृष्टि का दायरा सिकुड़ता हुआ प्रतीत होना यानि सीधे देखते हुये अगल बगल की चीजों का दिखाई न पड़ना।
- पदने के चश्में का नंबर जल्दी जल्दी बढना।
- रोशनी से अंधेरे में आने पर आँखों को अंधेरे का अभ्यस्त होने में हर सामान्य से अधिक वक्त लगता प्रतीत होना।
- बल्ब आदि प्रकाश स्त्रोत अथवा चाँद के चारों ओर रंगीन वलय दिखलाई पड़ना।
उपचार-
- दवाई से नियंत्रण संभव है। आपरेशन की आवश्यकता कम ही पड़ती है।
बचाव-
- पुराने रिकार्ड सहित नियमित परीक्षण ही इसका एकमात्र बचाव है.
- जिनको पारिवारिक ग्लाकोमा हो, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज से पीड़ित हों, आँख में चोट लगी हो उनको ग्लाकोम कि संभावना अधिक होती है.
06. शुष्क आँख. - (ड्राई आई)
इस केस में हमारी आँखों के अन्दर भरी द्रव सुख जाता हैं और इसकी वजह से ना दिखने या धुंधला दिखने की समस्या आती हैं.
लक्षण-
- आँखों में जलन, चुभन।
- आँखें लाल होना।
- धुंधलापन आना जो पलकों को झपकने से दूर हो जाता हो।
- पढ़ने, टी वी देखने, कम्यूटर पर काम करने के बाद आँखों में तकलीफ होना।
बचाव-
- विटामिन 'ए' की कमी, पर्यावरण प्रदूषण, संक्रमण, दवाओं के दुष्प्रभाव, एयर कंडिशनर
- का ज्यादा उपयोग, हार्मोन्स की कमी तथा उम्र का प्रभाव, अधिक देर तक आँखों को बिना
- आराम दिये कम्यूटर में काम करना इत्यादि।
- लुबरिकेटिंग आई ड्राप से आराम हो जाता है.
- धूल, धूप, धुआओँ और गरम हवा से आँखों का बचाव।
- बाहर जाते समय सुरक्षा चश्मों का इस्तेमाल।
- पानी अधिक पियें।
- गुटखा, गुड़ाखू, शराब, तंबाखू से परहेज।
- लगातार पढ़ाई व कंप्यूटर पर अधिक देर तक काम नहीं करें.
06. डायबिटिक रेटिनोपेथी -
डायबिटीज़ की मौजूदगी के अलावा, आपकी रक्त शर्करा कितना नियंत्रित है, यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि आपमें दृष्टिहीनता के साथ डायबेटिक रेटिनोपैथी विकसित होने की कितनी संभावना है
लक्षण–
- आसमान में तैरती हुई चीजें दिखाई देना (Floaters) या काले धब्बे दिखना
- रात को देखने में कठिनाई होना
- धुंधला दिखना
- दोहरा दिखाई देना
- आंख में दर्द होना
- मोतियाबिंद होना
- अंधापन या ठीक से देख ना पाना
- दृष्टि कम ज्यादा होना (कभी ज्यादा दिखने लगना कभी कम)
- रंगों की पहचान करने में कठिनाई होना, रंग फीके लगना
07. आँखों में बाहरी वस्तु का गिरना-
- मधुमेह (डायबिटीज) हमारे देश की बढ़ती हुई समस्या है। अनियंत्रित मधुमेह आँख के पर्दे पर घातक दुष्प्रभाव डालता है।
- दृष्टि का धुंधला पन हो जाना.
- काले थब्बे या काली रेखाएँ दिखना।
- इसका एकमात्र बचाव मधुमेह पर नियंत्रण ही है।
- रैटिनोपेथी या पर्दे की खराबी होने पर लेजर से सेंकाई, आँख में इंजेक्शन तथा शल्य क्रिया के द्वारा इसका इलाज किया जाता है जो अत्यंत कठिन होता है तथा सफलता की संभावना भी कम होती है।
- मधुमेह के रोगी को आदर्श रूप से प्रति छह माह में आँख के पर्दे की जांच नेत्र विशेषज्ञ से कराते रहना चाहिए।
- आते जाते हुये आँखों में धूल के कण, उड़ते हुये छोटे कीड़े गिर जाना आम घटना है। ऐसे में त्वरित उपचार में लापरवाही बरतने से आँखों को खासा नुकसान हो सकता है।
08. आँखों में चोट -
- आखों के जलने/झुलसने या अम्लक्षार गिर जाने पर आँखों का राईनो आँखों को हरगिज न मलें, इससे स्वच्छ पटल (कार्निया) पर जख्म बन सकता है तथा इष्टि भी जा सकती है।
- आँखों को स्वच्छ शीतल जल के छीटों से धो लेवें ताकि कचड़ा निकल जाये।
- आराम नहीं आने पर विपरीत करवट लेते हुए पत्रकों को बार बार चलायें, इससे कचडा बहकर नाक की तरफ आँख के किनारे आ जाएगा जिसे सावधानी से रुमाल और उँगलियों कि सहायता से निकाला जा सकता है.
- ऐसे में भी आराम न मिले तो नेत्र विशेषज्ञ को दिखा कर उचित उपचार कराया जाना चाहिए।
- सावधानी के लिए जब भी बाहर निकलें/ड्राइविंग करें सुरक्षा हेतु सादा चश्मा अवश्य लगाएं.
- चोट आँखों के बाहरी या भीतरी हिस्से मैं लग सकती है।
- भोथरी या नुकीली वस्तुओं से लग सकती है। चोट लगने पर तत्काल ही नेत्र विशेषज्ञ से सलाह लें.
- यदि आँखों की रोशनी में कमी महसूस हो या आँखों में खून जमा दिखाई पड़े तो यह गंभीर लक्षण है.
- आँख को बंद कर पैड लगाएं या रुमाल से ढक कर नेत्र विशेषज्ञ को दिखाएँ. आँख को मसलें नहीं. एंटीबायोटिक आई ड्राप हो तो डाल लें.
- ध्यान रहे आँख से खून निकले या नुकीली वस्तु से चोट लगने पर कोई भी दवा या पानी आँख में न डालें. दर्दनिवारक गोली ले सकते हैं.
- आखों को तरंत शीतल जल से कई बार धो लें।
- आँखों में जीवाण्रोधी मलहम लगायें। अरतत्काल नेत्र विशेषज्ञ को दिखाकर उचित उपचार कराएं अन्यथा स्थायी इष्टिहीनता हो सकती है।
- राइनों स्पोरोडिओसिस नामक यह बीमारी जानवरों से मनुष्यों में फैलती है। यह बीमारी उन तालाबों में नहाने से होती है जहां जानवर एवं मनुष्य एक साथ स्नान करते हैं।
- यह बीमारी बच्चों को ही अधिकांशतः प्रभावित करती है। क्योंकि ये अधिक देर तक तालाब में डूबे रहते हैं.
लक्षण-
- इसमें मरीज के आँख में लाल मस्सा बन जाता है जो बढ़ता जाता है, इससे खुन भी निकलता है, छुने से दर्द नहीं होता अधिक बढ़ जाने पर नजर को प्रभावित करता है।
उपचार-
- आपरेशन के अलावा इसका कोई दुसरा उपचार नहीं है। बच्चों के आपरेशन में पूर्ण बेहोसी की
- आवश्यकता होती है, जिसकी सुविधा बड़े अस्पतालों में होती है।
बचाव-
- अतः सामाजिक संकल्प के साथ जानवरों एवं मनुष्यों के नहाने का तालाब पृथक रूप से चिन्हांकित किया जाना चाहिए ताकि इस बीमारी की रोकथाम शतप्रतिशत हो सके।
आखों की देखभाल के टिप्स (Eye Care Tips in Hindi)
- लेट कर ना पढ़ें, और कम रौशनी वाले स्थान में आधे घंटे से जयदा न पढ़े.
- आंखों को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन ए , प्रोटीनयुक्त भोजन लेना चाहिए। (जाने – आँखों की रोशनी बढाने के लिए क्या खाएं )
- विटामिन ए के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां और पीले फल ,आम,पपीता ,गाजर, कुम्हड़ा, मुनगा, खीरा ,अंडा, मछली,दूध, ।
- प्रोटीन के लिए सोयाबीन बहुत अच्छा है, तीन किलो सोयाबीन के साथ सात किलो गेहूं मिला कर पिसवा लें और इसकी रोटी खाएं ।
- अपनी आँखों को धूल और धूएँ से बचायें।अपनी आंखों की सुरक्षा के लिए घर से बाहर निकलने पर सादा चश्मा लगाएं ।
- अपने लिविंग रूम में बहुत ज्यादा रोशनी या बहुत ज्यादा अंधेरा न रखें।
- एलसीडी मॉनिटर्स का प्रयोग करें। इनसे आँखों पर जोर कम पड़ता है।
- अपने कंप्यूटर स्क्रीन को हाथ भर के फासले पर रखें, अपनी आँखों के स्तर से नीचे।
- टीवी स्क्रीन के आकार से तीन गुना दूर से देखें , भुत पास से ना देखें ।
- कंप्यूटर पर टाइपिंग करते समय फॉंट साइज को बढ़ा लें।
- साल में एक बार नेत्र विशेषज्ञ से आँखों की जांच जरुर कराएं, चाहे कोई परेशानी हो या ना हो ।
- सप्ताह में एक दिन बारी -बारी से दोनों आँखों को स्वयं चेक करें दूर की नजर , पास की नजर तथा मेकुलर फंक्शन परीक्षण हेतु विजन काई मिलते हैं ।
- आँखों की बीमारी होने पर स्वयं चिकित्सा न करें।
- आँखों में काजल, सुरमे का इस्तेमाल न करें।
- आंखों में कचरा, धूल का कण आदि पड़ने पर आँख को मलना नहीं चाहिए।
- प्रतिदिन चार बार अपनी आंखों को स्वच्छ ठण्डे पानी से धोएं।
- सुबह घास पर दस मिनट तक नंगे पैर टहलें, ऐसा करने से आँखों को आराम के साथ-साथ आँखों की रोशनी में भी वृद्धि होती हैं।
- अपने मुँह में पानीभर लें और फिर ठंडे पानी की बूंदों से आँखों पर छींटे मारें, ऐसा सुबह पांच बार करें .
आंखों में समस्या होने पर लक्षण -
- दूर की या पास की वास्तु स्पष्ट ना दिखाई देना।
- आँख एवं सिर में भारीपन, आँख लाल होना, आँख से पानी जाना, आँख में जलन होना, आँख में खुजली होना, आँख में सूखापन , रगों का साफ न दिखना।
- पढाई करने से आंखों से पानी आने का अर्थ है आपकी आंखों की मांसपेशियां कमजोर हैं, ऐसे में आपको आंखों की एक्सरसाइज करनी चाहिए ।
- यदि आंखों में बहुत ज्यादा तकलीफ या दर्द है तो तुरंत आई स्पेशलिस्ट से मित्रना चाहिए ।
- यदि आपकी आंखें कमजोर है तो आपको किसी एक केंद्र बिंदु को फोकस कर कुछ देर तक उसे देखना चाहिए.
- पेन की नोक पर फोकस करते हुए उसे धीरे-धीरे आगे पीछे करना चाहिए।
- इस एकसरसाइज को दिन में तीन -चार बार करें।
- आखों को सभी दिशाओं में धीरे| धीरे घुमाएँ-इससे आपकी आंखों की मसल्स मजबूत होंगी।
- आंखों से कम दिखाई देने पर आपको आई स्पेशलिस्ट की सल्राह पर नजर का चश्मा लगाना।
- चाहिए या फिर आप लेंस का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।नंबर स्थाई होने पर लेजर ऑपेरशन हो सकता है.
याद रखें –
- हम सभी बीमारियों को तो नहीं रोक सकते किन्तु तुरंत उपचार से जटिलता को अवश्य बचा सकते हैं।
- नियमित नेत्र परीक्षण से बीमारी को प्रारंभिक अवस्था में पहचान लेने से समय ,पैसा और परेशानी बचती है तथा ठीक होने की भी ज्यादा संभावना होती है ।
