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नेफ्राइटिस - NEPHRITIS

हमारे शरीर में दो किडनियां पायी जाती है, जो हमारे शरीर में उपस्थित अपशिष्ट तत्वों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को बहार निकलती हैं. यदि इन किडनियों में सुजन आ जाए तब इस स्थिति को “नेफ्राइटिस” कहा जाता हैं.

परिचय- जिस रोग में गुर्दे (किडनी) के प्रदाह की वजह से बहुत थोड़ी मात्रा में पेशाब होता है और बहुत शीघ्र सारे शरीर में शोथ (सूजन), कमजोरी, रक्ताल्पता (खून की कमी-Anemia) आदि शिकायतें पैदा हो जाती हैं इसे ब्राइट्स डिजीज कहते हैं। इसका दूसरा नाम नेफ्राइटिस (Nephritis) है। ("वृक्क शोथ' (Nephritis) निम्न दो प्रकार का होता है 1. एक्यूट (नया प्रदाह). 2. क्रॉनिक (पुराना प्रदाह)।

NEPHRITIS IN HINDI

इसे 'एक्यूट ग्लोमेरूलो नेफ्राइटिस' (Acute Glomerulo Nephritis) भी कहते हैं। इसमें दोनों वृक्कों के कोशिका स्तबकों (Glomeruli) में शोथ हो जाता है। नेफ्राइटिस से जुडी इस जानकारी में आज हम जानेंगे – 

  • नेफ्राइटिस के मुख्य कारण 
  • नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण
  • नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें
  • नेफ्राइटिस का परिणाम
  • नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त
  • नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी

नेफ्राइटिस के मुख्य कारण (Main causes of nephritis)-

  • सबसे बड़ा कारण रक्त संलापी (हीमोलाइटिक स्ट्रेप्टोकोकाई) नामक जीवाणु होते हैं। 
  • अधिक ठंड या सर्दी लगना। 
  • स्कारलैट फीवर, रक्तस्रावी चेचक आदि कुछ बीमारियों तथा डिपथीरिया, खसरा, मलेरिया, सेरिब्रो-स्पाइनल मेनिन्जाइटिस, विसर्प, वात ज्वर, एक्यूट ट्यूबरकुलोसिस, सेप्टीसीमिया, उपदंश, हैजा की कमजोरी हालत में तथा आग में जलने और नाना प्रकार के चर्म रोग के साथ भी यह बीमारी होती है। 
  • कुछ विषैली दवाओं यथा-पोटेशियम क्लोरेट, टर्पेन्टाइन, नाइट्रेट आदि के सेवन से।

नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण (Main symptoms of nephritis)-

  • ठंड लग कर बीमारी एकाएक हो सकती है और देखते-देखते थोड़े समय में रोगी को सूजन आ जाती है। कभी-कभी शीत और कम्प होकर बीमारी आरम्भ होती है। 
  • कमर, सारे शरीर एवं माथे में दर्द। 
  • पहले आँखों के नीचे की पलक और पैर की गाँठ से पास सूजन होती है और फिर धीरे धीरे सारे शरीर में। चेहरे का फूलना। 
  • मूत्र की मात्रा अल्प और मूत्र में रक्त की उपस्थिति। 
  • व्याकुलता, ज्वर, अग्निमांद्य, वमन, शिरशूल आदि की प्रधानता।
  • सारा शरीर रक्तहीन दिखाई देता है। 
  • शरीर की त्वचा शुष्क ।
  • नोट- इस रोग में पेशाब बार-बार और जल्दी-जल्दी होता है और बहुत थोड़े परिमाण में होता है। यहाँ तक 2-4 बंद से अधिक नहीं। पेशाब लाल और गाढ़ा होता है। पेशाब बंद होने के कारण यूरीमिया। 

नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें (How to recognize nephritis)–

  • नाड़ी बहुत कड़ी और महाधमनी के ऊपर द्वितीय शब्द (2nd sound) बढ़ जाता है। 
  • पेशाब का आपेक्षिक गुरुत्व (Specific | Gravity) 1020 से 1440 तक। 
  • पेशाब टेस्ट में-एल्बूमेन, रक्त के कण और किडनी की गठित सामग्री यथा-रेनल, हायलिन, एपिथिलियल और रक्त का कास्ट, ट्यूब कास्ट आदि पाये जाते हैं। मूत्र कम, लाल या धूमिल (Smoky) एवं गाढ़ा। 
  • परेटिनल परीक्षण से अक्षिविम्ब शोफ (Papill oedema), रक्तसाव एवं निःसाव की जानकारी।

नेफ्राइटिस का परिणाम (Consequence of nephritis)–

  • सर्दी लग कर बीमारी हुई हो तो थोड़े ही दिनों में ठीक हो जाती है। 0
  • अन्यान्य कारणों से बीमारी हुई हो तो अधिकांश क्षेत्रों में घातक। 
  • ज्वर के साथ बच्चों को और गर्भवती स्त्रियों में 40-50% रोगियों की मृत्यु 
  • कभी-कभी पुराना रूप (Chronic) धारण कर लेती है। 
  • यूरीमिया होने से मस्तिष्क प्रभावित। 
  • कभी कभी बेचैनी, बेहोशी एवं पागलपन जैसे लक्षण। 
  • 'यूरीमिया' एवं 'अम्ल रक्तता से मृत्यु।
  • बच्चों में चिकित्सा द्वारा 90% लाभ, जबकि प्रौढ़ों में 50% की आशा।

नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त (Medical principles for nephritis) –

  • इस बीमारी में गुर्दे का प्रदाह हो जाता है, इसलिये गुर्दे (Kidneys) को जितना ही विश्राम दिया जाय, उतना ही अच्छा है। 
  • ऐसी व्यवस्था करें जिससे दस्त वगैरह साफ हों। 
  • इस रोग में सूजन होती है और शरीर में पानी एकत्रित होता है इसलिये यदि 'प्लूरा और 'हृदयावरण' के भीतर पानी इकट्ठा हो तो उसके लिये दवा की अलग व्यवस्था करनी चाहिये। 
  • यदि पेशाब बहुत थोड़ा हो तो ऐसी व्यवस्था करें जिससे पेशाब का वेग बढ़े। 
  • यदि वमन हो तो उसे 'बर्फ, चूसने को दें। 
  • यदि वमन थोड़ा हो रहा हो तो व्यवस्था की आवश्यकता नहीं। 
  • यदि वमन बहुत देर तक होता रहे तो चिकित्सकों को विशेष सावधानी से काम लेना चाहिये।

नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी- 

  • दूध इस रोग का प्रधान पथ्य है। 
  • रोग के कारण शरीर से जो एल्बुमिन निकल जाता है है दूध से उसकी पूर्ति हो जाती है। 
  • दूध, सागू, दूध बार्ली आदि के सिवाय कुछ न दें। पानी इच्छानुसार दिया जा सकता है। 
  • गर्म पेय अधिक लाभदायक हैं। 
  • ताजे पके फल, आलू, परवल, तोरई वगैरह उबाल कर दी जा सकती हैं। 
  • थोड़ा आराम हो जाने पर 30-45 अथवा दो महीने बाद भात, दाल, मछली का शोरवा दें। माँस कम से कम 6 महीने तक नहीं देना चाहिये। 
  • रोगी को गरम वस्त्रों में लपेट कर रखें, उसे ठंड तथा सीधी हवा नहीं लगनी चाहिये। 
  • बीमारी में आराम हो जाने के बाद भी 5-6 माह तक कमर में ऊनी कपड़ा लपेटे रहना चाहिये। 
  • बदन पर भी गरम कपड़े पहने रहना चाहिये।

उम्मीद है की नेफ्राइटिस से जुडी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो. यदि नेफ्राइटिस के बारे में इतनी जानकारी आपने ले ली तो कृपया इस जानकारी को अन्य जरूरतमंद को जरूर भेजियें. “धन्यवाद”

 

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