कैसे होता है लीवर ट्रांसप्लांट (How is liver transplant done?)
इसकी सामान्य प्रक्रिया यह है कि जिस व्यक्ति को लीवर प्रत्यारोपण की जरूरत होती है उसके परिवार के किसी सदस्य (माता/पिता, पति/पत्नी के अलावा सगे भाई/बहन) द्वारा लीवर डोनेट किया जा सकता है। इसके लिए मरीज के परिजनों को स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ट्रांसप्लांट ऑथराइजेशन कमेटी से अनुमति लेनी पड़ती है।
यह संस्था डोनर के स्वास्थ्य, उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों की गहन छानबीन और उससे जुड़े करीबी लोगों से सहमति लेने के बाद ही उसे अंग दान की अनुमति देती है। लीवर के संबंध में सबसे अच्छी बात यह है कि अगर इसे किसी जीवित व्यक्ति के शरीर से काटकर निकाल भी दिया जाए तो समय के साथ यह विकसित होकर अपने सामान्य आकार में वापस लौट आता है। इससे डोनर के स्वास्थ्य पर भी कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।
इसके अलावा अगर किसी मृत व्यक्ति के परिवार वाले उसके देहदान की इजाजत दें तो उसके निधन के छह घंटे के भीतर उसके शरीर से लीवर निकाल कर उसका सफल प्रत्यारोपण किया जा सकता है इसमें मरीज के लीवर के खराब हो चुके हिस्से को सर्जरी द्वारा हटाकर वहां डोनर के शरीर से स्वस्थ लीवर निकालकर स्टिचिंग के जरिये प्रत्यारोपित किया जाता है।
इसके लिए बेहद बारीक किस्म के धागे का इस्तेमाल होता है, जिसे प्रोलिन कहा जाता हैलंबे समय के बाद ये धागे शरीर के भीतर घुल कर नष्ट हो जाते हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज का शरीर नए लीवर को स्वीकार नहीं पाता, इसलिए उसे टैक्रोलिनस ग्रुप की दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज के शरीर के साथ प्रत्यारोपित लिवर अच्छी तरह एडजस्ट कर जाए। सर्जरी के बाद मरीज को साल में एक बार लीवर फंक्शन टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।
लिवर ट्रांसप्लांट के बाद क्या?
- अस्पताल में 7 से 10 दिन रहना पड़ सकता है।
- कम से कम 3 महीने की नियमित दवाएँ और अस्पताल अपने शेडूल के हिसाब से जाए।
- लीवर प्रत्यारोपण के बाद तीन से छह महीने में सामान्य व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर लौट सकते हैं।
- आप अपनी इच्छानुसार खेल, सामजिक गतिविधयों में भाग लेना, यात्रा और व्यायाम कर सकेंगे।
