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फाइलेरिया रोग | What is Filariasis

परिचय : हाथी पाँव, हाथी पगा, फाइलेरिया (Filariasis ), श्लीपद परिचय फाइलेरिया के जीवाणु के उपसर्ग से उत्पन्न यह ज्वर है जिसमें लसीका का अवरोध और शोध होता है। फाइलेरिया (Filariasis ) रोग में रोगी की टांग हाथी के पैर क समान हो जाता है इस वजह से फाइलेरिया को  हाथी पगा या हाथी पाँव कहा जाता है .

What is Filariasis | फाइलेरिया के लक्षण, पहचान व परिणाम

फाइलेरिया से जुड़े सवाल को जानेंगे-

  • फाइलेरिया रोग 
  • फाइलेरिया रोग के कारण 
  • फाइलेरिया के सामान्य लक्षण 
  • फाइलेरिया के विशेष लक्षण
  • फाइलेरिया रोग की पहचान 
  • फाइलेरिया रोग का पहचान 

फाइलेरिया रोग के कारण (due to filariasis) :-

श्लीपद (फाइलेरिएसिस) उत्पन्न करने वाली कृमि (Vuchererea Bancrafli) प्रजाति की है जो फाइलेरिया परिवार की कई प्रकार की कृमियों में से है।

फाइलेरिया  का संक्रमण (Infection) क्यूलेक्स फेटागेन्स नामक मच्छर के काटने से होता है। प्रकृमियों मनुष्य की लसग्रन्थियाँ थोरेसिक डक्ट्स और लसवाहिनियों में रहती है।

फाइलेरिया रोग के सामान्य लक्षण (Common symptoms of filarial ) :-

  1. सामान्यतः ठंड के साथ तेज बुखार दौरे के समय उबकाई एवं वमन ज्वर क्रमश: 3 से 5 दिन में उतर जाता हैं, कुछ दिन, सप्ताह या माह के बाद पुन: आक्रमण होता है।
  2. अत्यधिक स्वेद के साथ ज्वर उतरता है। कभी-कभी प्रतिदिन निश्चित समय पर मलेरिया के समान अथवा सेप्टिक फीवर के समान ।
  3. ज्वर के साथ ही किसी अंग विशेष की लसीका वाहिनियाँ कड़ी मोटी और टेढ़ी-मेढी दबाने पर कड़ी रस्सी के समान ऊपरी चर्म पर लाली।
  4. अधिकांश प्रभावित होने वाली लसीका वाहिनियाँ 'अण्डकोष' जाँघ और भुजा की होती हैं। ग्रन्थियों में 'वक्षण' 'कक्षा' कोहनी और गले की प्रायः प्रभावित होती हैं। उदर के अंदर की प्रायः प्रभावित होती हैं। उदर के अंदर और वक्ष की लसीका वाहिनियाँ और ग्रंथियाँ भी।

फाइलेरिया के विशेष लक्षण (Symptoms of filariasis)- 

  1. दूरस्थ में शोफ (Oedema) । प्रायः पैर, अण्डकोष एवं अग्रबाहु (Fore arm) में पैर में, पैर के पृष्ठ, टखने और टॉग में घुटनों तक बहुत अधिक। 
  2. शोफ की मात्रा बढ़ती ही जाती है यहाँ तक कि पैर बहुत मोटा, हाथी पैर के समान हो जाता है। हाथ में इतना अधिक सोफ नहीं होता। 
  3. पैर एवं अण्डकोष सदैव नीचे लटके होते हैं।
  4. गोफ के ऊपर की त्वचा मोटी और कड़ी होती है और अनेक बार गांठदार भी। 
  5. अण्डकोष कभी-कभी इतना बड़ा होता है कि शिश्न (Penis) उसमें धंस सा जाय और चलने में भी कठिनाई।
  6. उदर की लसीका वाहिनियाँ प्रभावित होने से तीव्र स्वरूप की उदर पीड़ा होती है और कभी-कभी मृत्यु भी।
  7. दक्ष की 'ग्रन्थियों' एवं 'लसीका वाहिनियाँ प्रभावित होने से छाती में पीड़ा एवं खाँसी। खुजली, अनियमित लालिमायुक्त त्वक् शोथ सारे शरीर पर बिखरा हुआ मिलता है।

फाइलेरिया रोग की पहिचान (diagnosis of filarial disease) :-

  1. बार बार ज्वर के साथ लसीका वाहिनियों के शोध एवं अन्य लक्षणों से निदान होता है।
  2. रक्त परीक्षा में फाइलेरिया जीवाणु का मिलना। परिपक्व कृमि की पहिचान के लिये 'ग्लैंड बायोप्सी करना चाहिये।

फाइलेरिया रोग का परिणाम (consequences of filariasis) :-

  1. जैव अंगों (Vital organs) में जीवाणु उपद्रव से कभी-कभी मृत्यु ।
  2. शौफयुक्त अंगों के आकार एवं बोझ से
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