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आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) (INTESTINAL OBSTRUCTION)

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट):- बद्ध गुदोदर, आँतों में बंध लग जाना। अंग्रेजी में इसे इंटेस्टाइनल एटोनी भी कहते हैं।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) | अंतड़ियों में रुकावट क्यों आती हैं,  कारण व लक्षण

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रूप रेखा:- 

  • आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) परिचय
  • आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) स्टेटमेंट
  • दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) में क्या होता हैं
  • दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट)रोग के प्रमुख कारण
  • दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रोग के प्रमुख लक्षण क्या-क्या हैं
  • आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रोग की पहचान कैसे करें
  • दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) के लिए चिकित्सा विधि

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) परिचय:- 

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) वह अवस्था है कि जिसके अंतर्गत आंत्र में मल की अग्रगति रुक जाती है. मल वहीं रुक कर सड़ने लगता है, उस सड़ान से गैस उत्पन्न होकर आध्यमान (अफारा) उत्पन्न हो जाता है, तथा सड़ान युक्त वस्तु के आँत की दीवार में लीन होने से विष के लक्षण उत्पन्न हैं; जैसे- वमन, शीतकाय, नाड़ी दौर्बल्य आदि । आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) को INTESTINAL OBSTRUCTION भी कहा जाता हैं.

दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट):

आत्रावरोध वह अवस्था है, जिसमें यांत्रिक (Mechanical) या मंत्रबंध (Paralysis) के कारणों से आँतों में स्थित पदार्थों की आगे बढ़ते रहने की गति रुक जाती है।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) स्टेटमेंट:– 

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) मेंआरंभ के लक्षण रोगी को काय चिकित्सक (Doctor of medicines) के पास ही ले आते हैं। इसी अभिप्राय से इसका वर्णन कायिक व्याधियों (Medicines diseases) में ही किया गया है।

दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) में क्या होता हैं:

आंत्र अवरोध (Intestinal obstruction) में आंत्र की गति (Intestinal peristalsis) रुक जाती है। रोगी का पेट फूल जाता है, उल्टियां (Vomiting) होती है। पेट में बहुत तेज दर्द रहता है।आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) में हृदय गति बहुत तीव्र, नाड़ी कमजोर हो जाती है और रक्तचाप (Bleeding) गिर जाता है।

दूसरे शब्दों में आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट)रोग के प्रमुख कारण:-

  • बध अथवा जोड़। आँत के एक भाग का दूसरे घुस जाना। में ओत्रवृद्धि (हर्निया / Hernia)
  • वृहदांत्र का कैंसर। आँत की दीवार में अर्बुद बन जाना।
  • इन्टस्ससेप्शन (Intussusception) आत्र में बाह्य वस्तुएँ (Foreign Bodies)
  • वाल्लस (Volvulus) आन्त्र पक्षाघात
  • आन्त्र में गांठ पड़ जाना।
  • आँतों में कोई गोल ठोस वस्तु जैसे फलों की गुठली, हुक, दाँत, सिक्के आदि अटकजाना। 
  • आँतों में घाव (व्रण) होकर उसके अच्छा होने पर आँत का सिकुड़ जाना।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रोग के प्रमुख लक्षण क्या-क्या हैं:-

  • रोगी को मल त्याग न होना, इसका विशिष्ट लक्षण है। 
  • पीड़ा- नाभि के आस-पास लगातार रहने वाली पीड़ा पीड़ा शूल के समान प्रारम्भ में रुक-रुक कर, परंतु आगे चल कर बराबर बनी रहती है। 
  • बन्ध की स्थिति में पीड़ा (Strangulation)
  • तीव्र एवं निरन्तर रहती है। वमन-जिसके प्रारम्भ में अधपचा भोजन और पित्त के कण निकलते हैं। 
  • अन्न में मल मिश्रित वमन आती है। यमन में दुर्गन्ध आती है। अंत में वमन का रंग और गन्ध मल के समान हो जाते हैं और रोगी की मृत्यु के कुछ समय पूर्व मल के टुकड़े निकलते हैं।
  • जलाल्पता (Dehydration) वमन निरन्तर और बार-बार होने से शरीर में जल की कमी हो जाती है।
  • प्रकोष्ठबद्धता (Constipation)-पूर्ण कोष्ठ बद्धता रहती है यहाँ तक कि वायु भी नहीं सरती है। बस्ति द्वारा दिया हुआ पानी भी
  • बाहर नहीं आता है। नाड़ी (Pulse) गति तीव्र एवं खाली प्रतीत होती है। हल्के से दबाने पर दब जाती है।
  • श्वास (Breething) श्वास की गति तीव्र होती है वह वक्ष से ही श्वास खींचता प्रतीत होता है।
  • स्वेद (Sweat)- रोगी को ठंडा पसीना आता है।
  • प्रतापक्रम (Temperature) अवसाद के कारण
  • तापक्रम कम हो जाता है। | रक्तचाप (Blood Pressure)-बी. पी. प्रायः सि हुआ होता है।
  • आध्यमान (Flatulence) पेट फूला हुआ

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) आधुनिक ऐलोपैथिक पेटेन्ट चिकित्सा:-

याद रखिए - यह एक शल्य संबंधी रोग है जिसमें प्राय ऑपरेशन की आवश्यकता पड़ती है। फिर भी प्रथम बार रोगी को देखने का अवसर प्राय: मेडिसिन के चिकित्सक को ही मिलता है। 

पहले रोगी अपने निकटतम् पारिवारिक चिकित्सक ही के पास आता है अथवा बुलाने पर चिकित्सक को उसके घर जाकर रोगी को देखना पड़ता है और पूर्ण परीक्षा करके यह निर्णय करना होता है कि रोगी का तत्काल ऑपरेशन आवश्यक है। ऐसा निर्णय किया जाए तो भी प्रारंभ से ही किसी सर्जन के साथ परामर्श करके उपयुक्त चिकित्सा का आयोजन उचित है।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रोग की पहचान कैसे करें:-

  • गुदा परीक्षा-बालकों में यह परीक्षा विशेष उपयोगी है। आत्रावरोध का कारण मुख्य रूप से इटस्ससेप्शन हो सकता है। अगुली से इन्टस्ससेप्टिड पिण्ड प्रतीत हो सकती है जिसमें अंगुली में रक्त लग सकता है।
  • एवरे-रे परीक्षा में आँतों में गैस की उपस्थिति का पता लगता है।
  • स्टेथिस्कोप परीक्षा में आँतों में शांति तथा कोलाहल युक्त उदर का पता
  • लगता है। पूर्ण मलबद्धता, पीडा, आध्यमान (Flatulence) एवं वमन रोगी की क्षीणता और नाड़ी की
  • अति तीव्रता इस रोग को स्पष्ट कर देती है। एनीमा द्वारा दिया गया पानी ही निकलता है न कि मल अथवा न किसी प्रकार की वायु सरती है।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) रोग के परिणाम:-

  • जितने विलंब से रोग का निदान होगा रोगी के बचने की कम आशा की जाती है। यदि दो एक दिन में निदान न हो सका और तत्काल चिकित्सा न की गई तो रोगी का बचना असम्भव है।
  • शल्य चिकित्सा जितनी देर से आरंभ होती है उतनी ही जीवन की आशा कम होती है। आ में स्तब्धता हो जाने पर आशा निराशा में बदल जाती है।
  • जैसे-जैसे समय निकलता जाता है, रोगी की दशा खराब होती जाती है। यदि चिकित्सक के देखने के पूर्व ही अधिक समय निकल चुका है, तो वमन आदि के कारण रोगी की दशा पहले से अधिक क्षीण हुई होती है।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) के लिए चिकित्सा विधि:-

  • इसकी कोई औषधि चिकित्सा नहीं है। चिकित्सा मुख्य रूप से ही अस्पताल में होनी चाहिए।
  • प्रयांत्रिक आत्रीय अवरोध (Mechanical Intestial) (Victim) उदर खोलना नितात आवश्यक होता है जिसकी सुविधा अस्पताल में ही संभव है। 
  • यदि घर पर ही चिकित्सा की आवश्यकता प्रतीत हो रही हो तो पर नर्श आदि के लिये सर्जन को अपने पास रखना चा यदि आत्रावरोध का अथवा हर्निया के कारण है तो तत्काल ऑपरेशन आवश्यक होता है। आध्यमान (Flatulence) की स्थिति में ऑक्सीजन जीवाणुनाश के लिए एंटीबायोटिक प्रयोग भरपूर मात्रा में। इसके लिये गैरामाइसिन (Garramycin) फुलफोर्ड कैम्पिसिलीन (Campicillin) मांसपेशीगत् / आई. वी. दें।

आंत्रावरोध (अंतड़ियों में रुकावट) के लिए सहायक चिकित्सा:-

  • यदि रोगी की दशा पहले से ही अधिक क्षीण हुई है, तो रोगी का सामान्य स्वास्थ्य सुधार कर शीघ्र ही ऑपरेशन के लिए तैयार करना चाहिए ताकि वह ऑपरेशन को सहन का सके।
  • इसके लिए द्रवों एवं लवणों की क्षतिपूर्ति की जाय। इसके लिए 1 पाइंट नार्मल सैलाइन 1/V प्रातः सांय दें। साथ ही अवरोध युक्त आंत्र में एकत्रित स्राव अथवा द्रवों को वहाँ से हटाना। इसके लिए। 'नियोस्टिग्मीन' देकर आंत्र की गति को बढ़ाना चाहिए।
विषैले द्रव को निकालने के लिए आंत्र में  रायल नलिका या ऑपरेशन आवश्यक होता है। मिलर-ऐवट की रबर नलिका को नासिका द्वारा आमाशय में होते हुए पक्वाशय में प्रविष्ट कर पम्प द्वारा बाहर निकालें।

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