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डिसेंट्री या पेचिश (DYSENTERY)

पेचिश जिसे डिसेंट्री भी कहा जाता है, इसमें व्यक्ति को गंभीर दस्त के साथ साथ ब्लड निकलता है कई जगहो पर इसे पर्याय प्रवाहिका , आमातिसार एवं सामान्य बोलचाल में ऑव या पेचिश के दस्त कहा जाता है। 

डिसेंट्री या पेचिश के कारण एवं लक्षण | डिसेंट्री या पेचिश से बचाव की विधि

पेचिस(डिसेंट्री)  में क्या होता है-

पेचिश में मरोड़ के साथ थोड़ा-थोड़ा श्लेष्मायुक्त मल बाहर निकलता है। कभी-कभी श्लेष्मा के साथ खून भी निकलता है। केवल श्लेष्मा (कफ) निकलने को ऑव या मरोड़ तथा साथ में खून निकलने को "पेचिश के दस्त" कहा जाता है। मल त्याग के समय रोगी के उदर में ऐंठनयुक्त पीड़ा होती है।

पेचिस(डिसेंट्री)- पेचिश में पेट में सुई चुभने की सी वेदना होती है, जरा-जरा सी देर में पाखाना जाने की इच्छा होती है, भूख बंद हो जाती है, पेट पर अफारा आ जाता है और रोगी के शरीर से बदबू आती है- ये पेचिश के मुख्य लक्षण हैं जब प्रवाहिका में मल के साथ रक्त भी निकलने लगे तो उसे रक्त प्रवाहिका कहते हैं प्रवाहिका के प्रारंभ में अग्निमांद्य, अतिसार और पेट में दर्द के लक्षण होते हैं।

पेचिस(डिसेंट्री) के समय क्या होता है -

  • मलत्याग के समय और उससे पहले भी पेट में मरोड़ और आँतों में ऐंठन होती है। मलत्याग के समय थोडा जोर लगाना पड़ता है और थोड़ा धैर्य भी रखना पड़ता है, तब जाकर कहीं जरा-सा मल बाहर निकलता है। 
  • उसमें अधिकांश रूप में मवाद जैसे दिखाई पड़ने वाले पदार्थ होते हैं। रोगी जैसे ही मलत्याग करके उठता है और शौचालय से बाहर निकल बिस्तर पर बैठता है कि इतनी ही देर में फिर ऐंठन उठनी शुरू हो जाती है और फिर शौच जाने की इच्छा होती है। 
  • इस प्रकार उसे बार-बार शौच के लिए भागना पड़ता है। मरोड़ की एक और विशेषता भी है- रोगी पेशाब करने भी जाता है, तो भी उसे मलत्याग करने की हाजत होने लगती है और उसे शौच के लिए जाना ही पड़ता है।

पेचिश (डिसेंट्री) कितने प्रकार के होते है –

मुख्य रूप से दो प्रकार की हुआ करती है:

 (1) 'तीव्र' कीटाणुजन्य पेचिश या 'तीव्र बेसीलरी पेचिश' (Bacillary dysentery)

(2) अमीबाजन्य पेचिश या आजकल मॉडर्न युग में इसे 'अमीबिकता' या 'अमीबियासिस (Amoebiasis) कहते हैं। 

पेचिश(डिसेंट्री) का रोग कारक क्या है?-

रोग के प्रमुख कारण शिजेला जाति के विशेष जीवाणु (बीशिगा) के द्वारा रोग पैदा होता है। यह एक प्रबल प्रवाहिका जनक जीवाणु है, जो रोगी के मल के द्वारा बड़ी मात्रा में बाहर निकलते हैं। यह रोग किसी भी आयु के व्यक्ति में हो सकता है, पर बच्चों कमजोर व्यक्तियों एवं उदर विकार से पीड़ित व्यक्तियों में अधिक ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में जहाँ-जहाँ लोग तीर्थ स्थानों में तथा कैंपों में इनके मल से निकले जीवाणुओं के भोजन में तथा जल में संक्रमण कर जाने से रोग ग्रसित होते हैं।

पेचिस(डिसेंट्री) के लक्षण क्या है (What are the symptoms of dysentery):-

  • रोग का आक्रमण एकाएक। ज्वर के साथ उदर में तीव्र अत्यधिक संख्या में मल त्याग की इच्छा। 
  • दिन में 20 से 30 बार तक मल की प्रवृत्ति। 
  • मल में प्राय रक्त आता है। पर कभी-कभी मल त्याग के समय केवल रक्त ही आता है। 
  • उदर प्रदेश में मरोड़ एवं ऐंठन। गुदा के स्थान पर जलन एवं ऐंठन।
  • बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। मेलों में, रोगी में हर समय मल त्याग की इच्छा बनी रहती है एवं प्रत्येक मल त्याग के समय बड़ी आँत के क्षेत्र में ऐंठनयुक्त पीड़ा (Tenes mus) होती है।
  • नाड़ी की गति तीव्र एवं चंचल। अधिक दस्त आने से जलाल्पता (Dehydra tion) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 
  • रोगी अति शीघ्र दुर्बल हो जाता है। इमेटीन इंजेक्शन से कोई लाभ नहीं।
  • प्रारंभ में बहुत पतले दस्त आते हैं, बाद में मल कम और रक्त तथा आँव या केवल आँव ही अधिक आती है।

पेचिस(डिसेंट्री) की पहचान क्या है (What is the hallmark of dysentery):-  

  • निम्न विशिष्ट लक्षणों से पेचिस(डिसेंट्री)  आसानी से पहिचाना जा सकता है 
  • वर्षा तथा बसंत ऋतु में रोग का सहसा आक्रमण ।
  • एक ही परिवार के कई सदस्यों का एक साथ बीमार होने का इतिहास। 
  • एपेडेमिक रूप में रोग का प्रसार 
  • ज्वर के साथ मरोड़ युक्त श्लेष्मा तथा रक्त मिश्रित मल का उत्सर्ग। निर्जलीभवन एवं विषमयता के लक्षण ।
  • शारीरिक परीक्षा करने पर संपूर्ण बड़ी आंत्र में स्पर्शासहिष्णुता (Tenderness) विशेष रूप से 'इलियक फोसा' पर होती है।
  • रक्त परीक्षा में–पोलीमॉर्स श्वेत कीटाणुओं की वृद्धि ।
  • मूत्र परीक्षा में मूत्र कम। मूत्र का 'कल्चर' करने पर विशिष्ट जीवाणुओं की वृद्धि मिलती है।

पेचिस(डिसेंट्री)  के परिणाम क्या है (What is the result of dysentery)-

  • अत्यधिक तीव्र प्रकार एवं हैजे के समान वाले प्रकार में चिकित्सा में विलम्ब होने पर रोग असाध्य ।
  • विषमयता एवं निपात के लक्षणों की उग्रता होने पर असाध्य ।
  • छोटे बालकों तथा दुर्बल व्यक्तियों में रोग घातक ।
  • शुरू से ही विशिष्ट औषधियों के प्रयोग से रोगी की साध्यता बढ़ती ही जाती है।

पेचिस(डिसेंट्री) के लिए चिकित्सा विधि (Medical method for dysentery):- 

  • औषधि चिकित्सा; एवं आहार चिकित्सा।
  • अन्य - पहले दिन उपवास करावें। तदंतर दीपन पाचन औषधि दें।
  • पेचिस(डिसेंट्री)  अधिक होने पर-स्तंभक औषधि न दें, अपितु ईशवगोल की भूसी 3-4 ग्राम दूध के साथ दें।
  • वायु के आनुलोमन तथा श्लेष्मा के निर्हरण का यत्न करना चाहिए। एतदर्थ दीपन, पाचन और ग्राही आदि के साथ कैस्टर आयल' का प्रयोग करना चाहिए।
  • उदर में शूल (Pain) हो तो-'हॉट वाटर बैग से सेंक करें अथवा कपूर मिला कर तारपीन का तेल मलें।

पेचिस(डिसेंट्री)  के लिए उपचार और अनुकूल - 

नवलग की दाल पतली खिचड़ी कच्चे केले की सब्जी टमाटर आवला होग, लहसुन, मट्ठा, दही एवं बकरी का दूध रोगी के लिए पथ्य है। पुराने रोग में दूध हितकारी है। 

खिचड़ी के साथ दही उपयुक्त पथ्य है। गेंहू उड़द, ईल. गुड, काशीफल, खीरा, कटहल, आलू, सेम, डालडा या तेल में तली चीजें, तीक्ष्ण एवं उष्ण, भारी पदार्थ वर्जित।

दोस्तों इस पेचिस(डिसेंट्री) की जानकारी के आर्टिकल में हमने आपको  पेचिस(डिसेंट्री)  में क्या होता है, पेचिस(डिसेंट्री) के समय क्या होता है, पेचिश (डिसेंट्री) कितने प्रकार के होते है,पेचिस(डिसेंट्री) किस जीवाणु की वजह से होता है, पेचिस(डिसेंट्री) के लक्षण क्या है, पेचिस(डिसेंट्री)  की पहचान क्या है, पेचिस(डिसेंट्री)  के परिणाम क्या है और  पेचिस(डिसेंट्री) के लिए चिकित्सा विधि के साथ साथ पेचिस(डिसेंट्री)  के लिए पथ्य चिकित्सा के बारे में बताया है !!

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