अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis )
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) को अमीबिक रुग्णता, अमीबाजन्य पेचिश, आम अतिसार, पैत्तिक प्रवाहिका, अभीबी पेचिश, अमीबिक प्रवाहिका आदि नामों से भी जाना जाता है। आम बोलचाल में इसे "सफेद आँव वाली पेचिश" भी कहते हैं।
अमीबिक डिसेंट्री क्या है ?( What is amoebic dysentery)
अमीबिक डिसेंट्री या अमीबियासिस यह रोग है जो बड़ी आँत (Colon) में एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entumocha Histolytica) नामक जीवाणु के संक्रमण से होता है। अमीबिक डिसेंट्री में प्रतिदिन 3-4 दस्त आते हैं और बड़ी मात्रा में आए पतले मल के साथ काला-लाल (Dark-Red) रक्त भी सामान्यतः पाया जाता है। इसमें आँतों में शोध हो जाती है और उनकी भीतरी सतह में घाव हो जाते हैं। पेट में मरोड़ एवं बार-बार पाखाना आता है। पाखाने में रिक्त एवं ऑव मिली रहती है। अमीबिक डिसेंट्री को आजकल 'अमीबियासिस' कहते हैं। यह सामान्य पेचिश का दूसरा रूप (बेसिलरी डिसेंट्री के अतिरिक्त भेद) हैं।
अमीबाजनित डिसेंट्री- यह अमीबा नामक परजीवी से फैलने वाला रोग है। दूषित जल, अन्य पेय पदार्थ, तरकारियों या अन्य भोज्य पदार्थों के ग्रहण कर लेने पर ये स्वस्थ व्यक्ति की आँतों में पहुँच कर और पनप कर अपनी संख्या बढ़ाते रहते हैं और अंत में तीव्र सूजन पैदा कर देते हैं जिसमें अंत में छोटे-छोटे घाव या छाले बन जाते हैं, जिनसे रक्त प्रवाह भी हो सकता है।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis )को बोलचाल की भाषा में क्या कहते हैं-
चिकित्सा शास्त्र की नई परिभाषा में अमीबाजन्य पेचिश को अमीबियासिस कहा जाता है। जिस अंग में अमीबा संक्रमण करते हैं उसे उसी अंग की अमीबिकता कहते हैं। यदि इनका संक्रमण आँतों में हो तो आंत्र या 'इंटेस्टाइनल अमीबियासिस' (Intestinal Amebiasis) और यदि संक्रमण यकृत में हो तो "यकृत की अमीबिकता" (Hepatic Amocbiasis) कहते हैं।
इस परिभाषा के अनुसार “अमीबिक पेचिश" को "आंत्रगत् अमीबिकता" अथवा केवल 'अमीबिकता' (Amcbiasis) कहते हैं। रोग के लक्षण आंत्रगत अमीबिकता की प्रारंभिक अवस्था में रोग के लक्षण बेसिलरी पेचिश में मिलते-जुलते परंतु उससे कुछ मृदु होते हैं। रोगी के मल में रक्त और श्लेष्मा (आँव) आती है। किसी रोगी में ये लक्षण भी नहीं पाए जाते. केवल दो-चार दस्त रोजाना हो जाते है, जो ढीले या पतले होते हैं।
पेट में दर्द में पीड़ा और गड़गड़ का सा शब्द भी होता है। उदर में गैस बनना, पेट फूलना तथा बार-बार टायलेट जाने पर थोड़ा मल आना लक्षण पाए जा सकते हैं। कितनी ही बार कुछ दिनों तक पतले दस्त और उसके पश्चात् कुछ दिनों तक कब्ज ऐसा क्रम रोगी में कुछ काल तक चलता है। उपरोक्त लक्षण बड़े अस्पष्ट होते हैं तथा आँतों के अन्य रोगों के कारण भी उत्पन्न हो सकते हैं। अतः केवल मल में रक्त आने के अतिरिक्त इस रोग का कोई निश्चित लक्षण नहीं है।
आपको याद रखना चाहिए कि कोई भी औषधि अमीबिकता को 'समूल नष्ट' नहीं कर सकती क्योंकि हमारे देश के रहन-सहन के ढंग और स्वच्छता की कमी के कारण लोगों में बार-ब इसका संक्रमण होता रहता है।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) संक्रमण एवं रोग प्रसार -
एंटाअमीबा हिस्टोलिटिका का उपसर्ग उसकी सिस्टों से, सिस्ट युक्त मल के द्वारा भोजन के दूषित हो जाने से तथा इस प्रकार दूषित बने अन्न या जल का सेवन करने से प्रायः होता है।
अमीबा की सिस्टें खाद्य पेय पदार्थों में महीनों सुस्त अवस्था में उपस्थित रहकर उपसर्ग करने में सफल होती हैं। कुएँ, तालाब एवं अन्य जल के स्रोतों की ठीक-ठीक देखभाल न की जाने पर वे उपसृष्ट हो जाती हैं और उनका जल पीने से अमीबा की सिस्टें पेट में चली जाती हैं।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) के मुख्य एवं सहायक कारण-
- इस रोग का एक मात्र कारण एंटअमीबा हिस्टो लिटिका' नामक रोगाणु का संक्रमण है। गर्म देशों का संक्रामक रोग है।
- मल अत्यंत दुर्गंध युक्त ।
- प्रवाहिका से पीड़ित व्यक्ति अधिक प्रभावित होते हैं।
- रोग प्रसार का माध्यम- मक्खियों, हाथ न धोने जैसी गंदी आदतें और कभी-कभी अस्वच्छ जल के सेवन से इस जीवाणु के सिस्ट्स का मुख मार्ग से अंदर चले जाने से होता है।
- संक्रमण सबसे पहले बड़ी आँत में और फिर यहाँ से यकृत तथा फेफड़ों आदि में
अमीबिक डिसेंट्री के प्रधान लक्षण (Symptoms of amoebic dysentery)क्या हैं-
- अमीबिक पेचिश का प्रायः जी रूप पाया जाता है
- पेट में तेज दर्द होने के साथ दिन में 1-27 अधिक पतले दस्त आते हैं.
- कभी-कभी 67 10 बार मल त्याग।
- मल में म्यूकस की उपस्थिति।
- मल में रक्त की उपस्थिति ।
- किसी-किसी में दुर्बलता।
- उंडुक और मलाशय क्षेत्रों में से एक स्थान
- पर या दोनों जगहों पर स्पर्श करने से काठिन्य या पिंड का आभास । प्रायः अभाव रहता है ।
- ज्वर का प्राय: 3-4 दस्त आते हैं पर 12 से अधिक नहीं। मल रक्त युक्त एवं साम होता है।
- नाभि के चारों और तीव्र मरोड़ की अनुभूति ।
- पेट में तेज दर्द अमीबिक पेचिश (Amoebic dys entery) का महत्वपूर्ण लक्षण है। शूल 'मलाशय' या 'सिग्माइड कोलन' में एंटीरियर इलियक स्पाइन के सामने होता है।
- आध्यमान' इस रोग का निर्णायक लक्षण है।
- इसमें अजीर्ण एक निरंतर मिलने वाला लक्षण है।
- ग्रहणी व्रण (Duodenal ulcer) भी मिल सकता है।
अति तीव्र अवस्था में आंत्र की श्लेष्म कला का अतिशय विनाश होकर सेप्टीसीमिया द्वारा मृत्यु हो जाती है।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) के लक्षणों के संबंध में रोगी को पेट दर्द के साथ लगभग पाँच-छ पतले दस्त प्रतिदिन होते हैं जिनमें प्रायः म्यूकस तथा रक्त मिल आता है। पाखाने बहुत बदबूदार होते हैं और कभी-कभी मवाद भी आ सकता है। इस रोग में कभी-कभी बड़ी रक्तनलिका के फट जाने से बहुत अधिक मात्रा में खून निकल जाता है। रोगी की नाड़ी तेज चलने लगती है और रक्तचाप (Blood Pressure) गिर जाता है। कुछ रोगियों की आँत फट भी सकती है, जिससे रोगी को अचानक पेट में जोर का दर्द उठता है।
अमीबा परजीवी आँत की रक्त नलिकाओं द्वारा यकृत (Liver), फेफड़े (Lungs) एवं आत्र अंगों में पहुँच कर बड़े-बड़े फोड़े बना सकते हैं, जिनमें सुई डालकर मवाद निकालने की आवश्यकता पड़ सकती है।
कुछ घंटों से लेकर दो तीन दिनों के भीतर ही इस रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। आरंभ में रोगी के पेट में मरोड़ के साथ दर्द (Pain) होता है, पतली टट्टियाँ होने लगती हैं, जी मिचलाता (nausea) है और उल्टी (Vomiting) भी हो सकती हैं। कुछ समय पश्चात टट्टी में खून आने लगता है, पेट में तीव्र दर्द होने लगता है और रोगी को बुखार चढ़ने लगता है। थोड़े ही समय में रोगी को कई-कई बार शौच के लिए भागना पड़ता है। कभी-कभी तो टट्टी के स्थान पर मुख्यतः आँद (Mucus) तथा खून (Blood) ही आने लगता है। कुछ व्यक्तियों को मवाद भी आता है। एक दिन में दस्तों की संख्या चालीस-पचास तक भी हो सकती है।
याद रखिए:-
- यह रोग मृदु (Mild), तीव्र (Acute), अतितीव्र (Fulminating), तथा जीर्ण स्वरूप (Chronic) इन चार रूपों में मिलता है। इनमें जीर्ण स्वरूप अधिक देखने को मिलता है।
- आरंभ में मृदु स्वरूप के रोगियों में केवल 'अतिसार' मिलता है। फिर मल में आंव और रक्त आने लगता है।
- फिर अति तीव्र अवस्था में द्वितीयक उपसर्ग होने पर ज्वर' (जो प्रायः अन्य अवस्थाओं में अनुपस्थित रहता है)।
- अत्यंत तीव्र उदर शूल मिलता है। ऐसा लगता है कि तीव्र 'एपेंडीसाइटिस' (Appendicitis) अथवा बेसिलरी डिसेंट्री हो गई है।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) की पहचान क्या हैं-
- माइक्रोस्कोप परीक्षा द्वारा मल में जीवित अमीबा (E. H) की उपस्थिति रोग निदान में सहायक।
- रासायनिक परीक्षण में मल में रक्त की उपस्थिति ।
- रक्त की परीक्षा में श्वेत कणों की संख्या दस सहस्त्र तथा उससे भी अधिक देखी जाती है।
- मलाशय के प्रत्यक्ष दर्शन (Siginoidos copy) से मलाशय में अमीबिक डिसेंट्री द्वारा उत्पन्न विक्षत देखे जा सकते हैं। याद रखिए- जीर्ण अमीबिक डिसेंट्री में सिस्ट को देखने के लिए मल का लगातार कई बार परीक्षण करना चाहिए।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) के परिणाम-
जिस व्यक्ति को यह रोग एक बार हो जाता। है वह बार-बार इससे ग्रसित हो सकता है।
तत्काल चिकित्सा न करने पर यकृत शोथ (Hepatitis) और यकृत विद्रधि (Liver Ab scess) जैसे विशिष्ट प्रकार के भयानक उपद्रव हो जाते हैं।
नोट-'यकृत विद्रधि' एक भयानक अवस्था है। यदि इस अवस्था का सावधानी से उपचार न किया जाए तो रोगी के जीवन को खतरा बढ़ जाता है।
याद रखिए- इस रोग में कई घातक उपद्रव मिलते हैं। इनमें आँतों का छिद्रण (Perforation) एक है। यकृत की विद्रधि दूसरा है और किसी बड़ी रक्तवाहिनी के फटने से उत्पन्न 'गंभीर रक्तस्राव तीसरा है।
अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis )चिकित्सा विधि-
- रोग का सही निदान कर तद्नुसार चिकित्सा करें।
- रोगी को दूर रखें तथा उसके मल को दूर फिकवा दें।
- आधुनिक उपचार में 'अमीबिक प्रवाहिका' के लिए इमेटीन राम बाण औषधि मानी जातीहै।
- अतः इसका प्रयोग सुचारु रूप से करें।
- औषधि उपचार के उपरांत 4 सप्ताह में मल परीक्षण (Stool test) कराना चाहिए, जिससे मि सुधार की सही-सही जानकारी मिल सके।
- खान-पान में स्वच्छता का ध्यान रखने से रोग से बचा जा सकता है।
- 'आम प्रवाहिका' के सभी प्रमुख लक्षण प्रमुख व्याधि की चिकित्सा करने से ठीक पे हो जाते हैं। जीर्णता होने पर 'भूख की कमी' तथा अरुचि (Anorexia) का कष्ट भी स्वंत्रल चिकित्सा की अपेक्षा करता है।
- अमीबिक डिसेंट्री (amoebic dysentery या Amoebiasis ) के लिए पथ्य एवं सहायक चिकित्सा
- लघुपाकी पौष्टिक आहार दें।
- मट्ठा, धान के लाबे का मांड़, दलिए का रस,
- अनार एवं बकरी का दूध इसमें पथ्य है।
- रोग की पहली अवस्था में गाय का दूध सहते-सहते प्रति बार 5-6 चम्मच एक या दो दिन तक पिलावें ।
- सहायक एवं आनुषांगिक चिकित्सा के रूप में 100 भाग ईशवगोल + 40 भाग साँफ मिलाकर दे सकते हैं। अथवा ईशवगोल 12 ग्राम, मिश्री 12 ग्राम मिलाकर पानी के साथ नित्य दें। इससे पेट ठंडा रहता है।
- बीमारी की जीर्ण (Chronic) अवस्था में खाने के तत्काल बाद कॉड लिवर आयल 2-3 बूँदें दें।
- पेट दर्द की तीव्र अवस्था में 'हॉट बैग' से सिकाई कराएँ ।
- पूर्ण विश्राम आवश्यक
- विशेष- बिना उबला जल न पिलाएँ।
- खट्टे पदार्थों से पूर्ण परहेज।

