अल्सर क्या है ? (What is Ulcer?)
अल्सर (Ulcer) क्या होता है -'अल्सर' अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है 'घाव' या छाला। घाव या छाला हो जाना यानि 'अल्सर' (Ulceration) हो जाना। हमारे शरीर में खासकर पेट में, आँतों में जो घाव हो जाता है उस घाव को 'अल्सर'(Ulcer) कहते हैं।
अल्सर के बारे में इन जानकारियों को जनांगे:-
- गैस्ट्रिक अल्सर (Gastric Ulcer) क्या है ?( What is Gastric Ulcer)
- अल्सर के कितने प्रकार होते है ?( How many types of ulcers are there)
- गैस्ट्रिक अल्सर (Gastric Ulcer)
- ड्यूडेनल अल्सर (Duodenal Ulcer )
- अन्ननली (Esophagus) के अल्सर
अल्सर के कितने प्रकार होते है ?( How many types of ulcers are there?)
01. गैस्ट्रिक अल्सर (Gastric Ulcer)
पूर्व चेप्टर 17 में- 'गैस्ट्रिक अल्सर' का अलग से वर्णन किया जा चुका है। पर यहाँ पर हम सामान्य अल्सर(Ulcer)' के संबंध में नवीनतम जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि इस आधुनिक सभ्यता की देन आम कष्टकारी व्याधि से सभी को आवश्यक जानकारी प्राप्त हो सके। यह एक ऐसी व्याधि है जो जीवनभर साथ नहीं छोड़ती है। पर यहाँ पर ऐसी जानकारी दी जा रही है, जिससे आम रोगी को इस व्याधि से काफी हद तक छुटकारा मिल सकेगा।
गैस्ट्रिक अल्सर को हिन्दी में आमाशय व्रण कहते हैं। आमाशय में ऊपर, बीच में या बिल्कुल निचले भाग में कहीं भी छाला हो जाना "गैस्ट्रिक अल्सर" हो जाना होता है।
गैस्ट्रिक अल्सर के कारण (due to gastric ulcer):-
मुख्य कारण एसिड है। एसिड की तीव्रता पैदा करने वाले कारणों को भी अल्सर होने का कारण माना जाता है। यदि एसिड बनती ही रहे तो अल्सर अवश्य होगा।
- हम अपनी गलतियों से दिमागी परेशानियों की वजह से, गलत खानपान की वजह से अल्सर पैदा कर लेते हैं।
- शराब अल्सर पैदा करती है, और यदि अल्सर हो चुका है तो उसमें जलन और दर्द करती है।
- एसिड के बढ़ने से अल्सर हो जाता है। मांस भी (एसिड युक्त) अल्सर पैदा करने में अप्रत्यक्ष रूप से सहायक है। जो मांस नहीं खाते वे तेज मिर्च मसालेदार व्यंजन खाते हैं और ऐसे व्यंजन और खाद्य पदार्थ भी एसिड बनाते हैं। लाल मिर्च सबसे अधिक खराब सिद्ध होती है।
- कई लोग तम्बाकू और चूना मिलाकर और मसल कर खाते हैं। अब जो लोग इसे चबाते हुए निगलते भी रहते हैं वे इस व्याधि के शिकार हो जाते हैं।
- अरहर की दाल, खट्टा संतरा, अंगूर या कोई खट्टा फल (Citrus fruit), अमचूर की खटाई,
- नींबू अचार, खट्टी चटनी, खट्टा दही आदि भी एसिड बनाते हैं। ऐसे पदार्थ लंबे समय तक खाते रहने से एसिड की वृद्धि होकर अल्सर का निर्माण होने लगता है।
- उड़द की दाल भी एसिड पैदा करती है। नोट-मूंग की दाल से एसिड कम बनती है। अतः इसे लंबे समय तक खाया जा सकता है। क्योंकि इसमें क्षार (Alkali) होती है। वह पेट में बढ़ने वाले एसिड को सामान्य करती रहती है।
गैस्ट्रिक अल्सर के सामान्य लक्षण(Common symptoms of gastric ulcer):-
- इसके रोगी को खाना खाते समय तो दर्द होता है, पर फिर थोड़ी देर के लिए आराम हो जाता है। लेकिन 2 घंटे बाद तकलीफ होने लगती है।
- याद रखिए यह दर्द इतना तेज होता है कि रोगी को पेट पकड़ना पड़ता है। आगे झुकने या पीछे झुकने से आराम मालूम पड़ता है। ऐसी दशा में दूध या कोई सौम्य पदार्थ खा लेने पर बड़ी राहत मिल जाती है। इसलिए रोगी बीच-बीच में कुछ खाता रहता है और मिलता रहता है।
- इस प्रकार का रोग धनी वर्ग के लोगों में अधिक देखने को मिलता है।
02. ड्यूडेनल अल्सर (Duodenal Ulcer )
- जो अल्सर ड्यूडेनम (Duodenum) में होता है उसे 'ड्यूडीनल अल्सर कहते हैं। वक्तव्य-यह अल्सर भी उन्हीं कारणों से होता है, जिनसे आमाशय में अल्सर होता है।
- उचित खान-पान न करने वालों में अधिक होते हैं। मांसाहारी और तेज मिर्च मसालों वाले व्यंजनों का सेवन करते हैं, शराब पीने के आदी होते हैं। अथवा फिर गरीब वर्ग के उन लोगों को होता है जिनका खान-पान अच्छा नहीं होता, निम्न स्तर का होता है।
- यहाँ का अल्सर मुश्किल से ठीक होता है और लंबे समय तक सही इलाज और सख्त परहेज करने पर ही ठीक हो सकता है।
ड्यूडेनल अल्सर के सामान्य लक्षण(Common symptoms of duodenal ulcer):-
- इसका रोगी खाना खाने से डरता है, क्योंकि खाना खाते ही जो दर्द शुरू होता है, तो तब तक बंद नहीं होता जब तक खाना पूरी तरह पच कर आमाशय से आगे नहीं निकल जाता।
- ऐसे मरीज खाना खाने से डरते हैं कि खाना खायेंगे तो दर्द होगा तो वे खाने की अपेक्षा करते हैं और भूखा रहना पसंद करते हैं। डरते-डरते थोड़ा सा खाते हैं। इसलिए 'ड्यूडेनल' के रोगी का शरीर प्रायः धीरे-धीरे दुर्बल होता जाता है।
03. अन्ननली के अल्सर(Cesophagus ulcer ):-
जो 'अल्सर' 'अन्ननली' (ईसोफेगस) में होता है, उसे अन्ननली का अल्सर (ईसोफिजियल) अल्सर) कहते हैं।
अन्ननली अल्सर के लक्षण(Symptoms of esophagus ulcer):-
अन्ननली में जलन।खाना खाते समय कष्ट ।
व्याख्या:-जरा भी तीखा या मिर्च-मसाले वाला पदार्थ खाते ही अन्ननली में जलन एवं पेट के ऊपरी हिस्से में खाते-खाते ही दर्द, ऐसा लगे कि खाना अटक रहा है। अतः बार-बार पानी पीना पड़े ताकि पानी के दबाव से अटका हुआ अन्न नीचे उतर जाए, क्योंकि खाया और निगला हुआ पदार्थ जैसे ही अन्ननली के अल्सर से स्पर्श करता है वैसे ही वहाँ जलन होती है। जिससे सिकुड़न पैदा होती है और अन्ननली के निचले भाग में स्थित आमाशय द्वारा सिकुड कर बंद हो जाता है पदार्थ को आमाशय में नहीं पहुँचने देता।
नोट- यह सब लक्षण अन्ननली अल्सर होने की खबर देते हैं। अन्ननली के अल्सर वाला रोगी बीच-बीच में पानी पीता रहता है।
अन्ननली अल्सर के लिए याद रखिए-खाना खाने के बाद लेटने पर, इसके रोगी को कष्ट होता है। क्योंकि आमाशय का अन्न डकार के साथ अन्ननली में या गले तक आ जाने पर ऐसा लगता है कि तेजाब (अम्ल यानि एसिड) से छाती एवं गले को जला डाला है। तब छाती, गले और पेट के ऊपरी हिस्से में बहुत जलन एवं पीड़ा होती है।
अन्ननली अल्सर का परिणाम(Consequences of esophageal ulcer):-
- जिसको अल्सर एक बार हो जाता है। वह जल्दी से उसके चंगुल से नहीं छूट पाता और लंबे समय तक रोग बना रहता है कभी-कभी तो लोग वर्षों तक अल्सर के रोगी बने रहते हैं।
- जब तक इलाज चलता रहता है तब तक “आराम रहता है। या बिलकुल आराम हो जाता है। लेकिन ठीक होने पर फिर से गलत खान-पान शुरू करने पर रोग के लौटने में देरी नहीं लगती है।
- लंबे समय तक अल्सर ठीक न हो तो कुछ अन्य जटिलताएँ (Complications) यानि अतिरिक्त व्याधियाँ पैदा होने लगती हैं, जो कि बहुत भयानक और जानलेवा साबित हो सकती हैं।
- कभी-कभी अल्सर फूट जाने पर एसिड पेरीटोनियम में चली जाती है और पेट फूल जाता है और फौरन इलाज न किया गया रोगी की मृत्यु हो सकती है।
- कभी-कभी अल्सर के कारण ‘हेमेरेज’ (Haemorrhage) हो जाता है यानि रोगी को उल्टी एवं दस्त में खून आने लगता है। रोगी पीला पड़ जाता है। इस स्थिति में फौरन ऑपरेशन करना पड़ता है। अथवा इंडोस्कोपी (Endoscopy) द्वारा ‘काटराइज’ करना पड़ता है। यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।
अन्ननली अल्सर के लिए बचाव एवं आहार व्यवस्था(Prevention and diet for esophageal ulcer):-
- उन सभी कारणों से बचना चाहिए जो अल्सर पैदा करने वाले होते है।
- मांस, शराब, तम्बाकू आदि का सेवन न करके रोगी बने शाकाहारी भोजन, दूध, घी, फल, दाल और शाक, चावल आदि का ही सेवन करना चाहिए।
- खाद्य पदार्थों को भून कर बनाने की अपेक्षा उबाल कर बनाना चाहिए। शाकाहारी पदार्थों में भी तेज मिर्च, मसाले,खट्टे और चटपटे व्यंजनों का सेवन कम मात्रा में और यदा-कदा ही करना चाहिए।
- ताजा मट्ठा, दही, पनीर, घी आदि का सेवन करने से अम्ल या तेजाब (Acid) की मात्रा सामान्य होती रहती है। फलों में केला, पपीता, चीकू, पका अनार आदि गुड़ के साथ मूँगफली आदि का सेवन।
- तले हुए भोजन, कच्ची सब्जी, अचार, चटनी तथा सलाद, घूम्रपान एवं मद्य, तेज कॉफी एवं चाय, सिरका, सोड़ा वाटर, बादाम, अखरोट एवं गर्म मेवे, तिल, खट्टा दही एवं तम्बाकू बीजों तथा छिलका युक्त सब्जी, छिलके वाली दाल, अधिक गर्म एवं शीतल पेय आदि से सदैव बचना चाहिए।
- इसके अतिरिक्त-कोर्टीकोट्रोपिन, (Corticot rophin) एड्रिनल स्टेरॉइड्स (Adrenal ste roids), फेनिल बूटाजोन एस्प्रिन एवं तीक्ष्ण गुण वाली औषधियों होता है।
- जल भी एक समय में एक कप से अधिक नहीं पीना चाहिए।
अल्सर में प्रयोगार्थ एलो औषधियाँ(Aloe Medicines for Ulcers):-
- म्यूकेन जैल (Mucaine gel) दो चम्मच तीन बार प्रतिदिन
- फेसिड 20mg (Facid 20mg) 1 टैबलेट दो बार प्रतिदिन।
- रेस्टिल (Restyl 0.25mg) 1 टैबलेट दो बार प्रतिदिन।
- एल्यूड्राक्स जैल (Aludrox gel) 2 चम्मच तीन बार प्रति दिन।
- एगाराल (Agarol) दो चम्मच दो बार प्रति दिन ।
- क्रेमाफिन सिरप (Cremaffin syp) चार चम्मच रात को सोते समय ।

