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पीलिया/ जॉन्डिस (JAUNDICE) जाने इसके लक्षण कारण और उपाय

पीलिया रोग सामान्यतः कई जगहों पर देखा जाता है. पीलिया हो जाने पर पूरे शरीर में पीलापन देखा जाता हैं, रक्त में लाल कणों का अधिक नष्ट होना तथा उसके परिणामस्वरूप अप्रत्यक्ष पित्तरंजक का अधिक बनना बच्चों में पीलिया, नवजात शिशु में रक्त-कोशिका-नाश तथा अन्य जन्मजात पीलिया, अथवा अर्जित, रक्त-कोशिका-नाश-जनित रक्ताल्पता इत्यादि रोगों का कारण पीलिया होता है. 

पीलिया क्या हैं ? जाने इसके लक्षण कारण और उपाय | What is Jaundice hindi

पीलिया/ जॉन्डिस (JAUNDICE) की रुपरेखा:-

  • पीलिया रोग को और क्या कहा जाता हैं? 
  • पीलिया में क्या होता हैं और पीलिया क्यों होता है?
  • पीलिया होने के सामान्य कारण क्या हैं?
  • पीलिया होने के लक्षण क्या है?
  • पीलिया या जौंडिस बीमारी कैसे होता है?
  • पीलिया की जांच कैसे करें?
  • पीलिया रोग का परिणाम कैसे देखें?
  • पीलिया के लिए चिकित्सा विधि क्या हैं?

पीलिया रोग को और क्या कहा जाता हैं? 

पीलिया को  यरकान, इक्टेरस (Icterus), पाण्डु, कमलवाई, रक्ताल्पता जन्य रोग पीलिया के नाम से जाना जाता हैं। सामान्य बोलचाल में शरीर का पीला पड़ जाना। 

पीलिया का परिचय:- रक्त में पित्तजनक' या पित्तरंजक (Bile Pigment) की उपस्थिति के कारण त्वचा एवं नेत्र श्लेष्मकला का पीलापन यह पीलिया हो सकता है।

  • पीलिया में नेत्र, नाखून, मूत्र एवं त्वचा में अत्यधिक पीलापन दिखायी देता है। 
  • पीलिया (Jaundice) वह अवस्था है जिसमें रक्तप्लाविका (Plasma) में 'विलिरुविन की मात्रा 3 मि.ग्रा. प्रति 100 मि. ली. प्लाज्मा से अधिक हो जाती है। 
  • यह वृद्धि सर्वप्रथम रक्त में फिर मूत्र में उसके बाद नेत्र श्लेष्मकला (कंजक्टाइवा) में और अंत में त्वचा में दिखाई देती है।

पीलिया में क्या होता हैं और पीलिया क्यों होता है?

जब यकृत से निकलने वाली पित्तवाहिनी नली (Bile duct) के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होने से अथवा यकृत एवं पित्ताशय से निकलने वाली पित्तवाहिनी नली के संगम स्थान में अवरोध (Obstruction) उत्पन्न होने से पित्त बजाय पक्वाशय (ड्यूडेनम) में जाने के रक्त में वापस मिलने लगता है, तब रक्त में लाल रक्तकण (R. B.C.) की मात्रा नष्ट होने लगती है और पित्त का प्रभाव बढ़ने से शरीर का रंग पीला पड़ जाता है। इस स्थिति को पीलिया कहते हैं।

पीलिया होने के सामान्य कारण क्या हैं?

  • अति स्त्री प्रसंग और अम्ल, लवण का अधिक प्रयोग।
  • मद्य एवं मिट्टी का सेवन । तीक्ष्ण पदार्थों का प्रयोग ।
  • यकृत की गड़बड़ी । दाह एवं अपचन और विरुद्ध आहार।
  • सामान्य पौष्टिक आहार की कमी एवं पाचन विकृति ।
  • चिरकालीन मलेरिया ज्वर का सताते रहना।
  • खुली स्वच्छ शुद्ध वायु का अभाव, स्वच्छ जल एवं पर्याप्त सूर्य के प्रकाश की कमी। 
  • स्त्री में मासिक धर्म से अत्यधिक रक्त का हास। 
  • वायु प्रदूषण एवं आर्द्र तथा अंधेरे स्थान में निरंतर रहने आदि कारणों से।

पीलिया में शरीर पीला क्यों हो जाता हैं? 

पित्त प्रणाली में पथरी का अटक जाना। कभी-कभी किसी रोग विशेष के कारण पित्तवाहिनी का मार्ग छोटा एवं संकीर्ण हो जाता है, तो पित्त आँतों में न जाकर रक्त में ही सीधा जाने लगता है और उसमे मिलने लगता है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर पीला हो जाता है। 

पीलिया होने के लक्षण क्या है?

  • चेहरा निस्तेज एवं सफेद होकर अंत में पीला पड़ जाता है।
  • नेत्र, त्वचा, मुख, नख का हल्दी जैसे रंग का पीला होना।
  • मल-मूत्र रक्त मिश्रित पीत वर्ण का होना।
  • अरुचि (Anorexia) |शरीर दुर्बल एवं बल क्षय ।
  • जैसा पाचन क्रिया खराब एवं मुँह का स्वाद कडुवा
  • पाखाना मैला, पीला एवं दुर्गंधित साथ चर्मरोग यथा-खुजली, फोड़े फुंसी आदि ।
  • नाड़ी क्षीणता।जरा से श्रम से तत्काल थक जाना।
  • मल कड़ा, एवं गाँठदार। कभी पतले दस्त ।
  • ज्वर भाव । श्वास कम एवं छोटा । 
  • रोगी में सुस्ती छायी रहती है और कभी चुस्ती चली जाती है।
  • शरीर में भारी थकावट एवं कमजोरी मालूम होना।
  • नाड़ी की गति 40 से 50 बार प्रति मिनट तक हो जाती है।
  • रोग पुराना होने पर हाथ, पैर, मुँह आदि में सूजन।

पीलिया / जॉन्डिस 187 इसमें रोगी को प्रत्येक वस्तु पीली दिखाई देती है और त्वचा का रंग पीला पड़ जाता है।यकृत की क्रिया बिगड़ने पर पित्त अच्छी तरह अवशोषित नहीं होता, वह पित्त खून में मिलकर खून के स्वाभाविक रंग को बदल देता है। बस इसी से पाण्डु रोग' या 'पीलिया' हो जाता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मान्यता के अनुसार- जब यकृत (Liver) पर शोध हो, उसका आकार बढ़ जाए तो उस व्याधि को हेपाटाइटिस (Hepatitis) कहते हैं जो पीलिया से मिलती-जुलती होते हुए भी एक अलग व्याधि है

पीलिया या जौंडिस बीमारी कैसे होता है?

  1. पीलिया दरअसल रक्ताल्पता (Anaemia) के कारण होने वाली व्याधि है, जिसे पाण्डु कहते हैं। रोग के कारणों के संबंध में नवीनतम विचार
  2. अधिक मात्रा में और लम्बे समय तक तेज मिर्च मसालेदार तले हुए भुने एवं खटाई युक्त. खट्टे पदार्थ का सेवन करने से। 
  3. अंडा-माँस और शराब का अत्यधिक मात्रा में सेवन एवं पित्त कुपित करने वाले पदार्थों का अति सेवन। इसके विपरीत स्निग्ध एवं पौष्टिक पदार्थों का सेवन न करने से।
  4. अधिक उष्ण एवं तेज धूप में लगातार परिश्रम करने अथवा अधिक परिश्रम या व्यायाम करने से।
  5. शरीर से खून जाने से व्याधि होती है। जैसे- बवासीर, पेचिश (खूनी) आदि में लगातार काफी समय तक खून गिरने से यह व्याधि हो सकती है।
  6. महिलाओं में रक्त प्रदर के कारण मासिक स्राव के दिनों में अधिक रक्त स्राव (Bleeding) होना। घातक चोट लग जाने के फलस्वरूप अधिक रक्त बहने से

पीलिया के लिए याद रखें:- 

कुछ रोग ऐसे होते हैं, जो रक्ताल्पता की स्थिति पैदा कर देते हैं, जैसे मलेरिया, मोतीझरा संग्रहणी, यकृत, प्लीहा (तिल्ली) का बढ़ जाना एवं कमजोर पड़ जाना आदि जीर्ण रोग

पीलिया से जुडी सावधानी:- इस रोग को उत्पन्न करने वाला मुख्य कारण है खान-पान में लापरवाही करना आदि सिर्फ जीभ के बस में होकर स्वाद के लालच में फंस कर ऐसी चीजें खाना जो खाते समय भले ही मजेदार लगती हों पर अंततः उनके सेवन का परिणाम रोग कारक एवं दुखदायी ही होता है।

पीलिया की जांच कैसे करें?

'पित्त, वसा, कृमि आदि के लिए मल परीक्षा करनी चाहिए ।

पित्त की उपस्थिति जानने के लिए मूत्र परीक्षा की जाती है।

पेट का एक्स-रे, छाती का एक्स-रे बेरियम मील, लिवर बायोस्पी, एण्डोस्कोपी, ब्लड काउंट आदि उदर भेदन भी आवश्य कतानुसार रोग निर्णय के लिए करने होते हैं

पीलिया रोग का परिणाम:-

  • दीर्घकालिक (Long Standing) पीलिया में सार ऊतक यकृत कोशिकाएँ (Parenchymal Liver Cell) अधिक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं जिससे यकृत का चयापचयिक (Metabolic) कार्य भी बिगड़ जाता है। रोगी अंत में ठंडा (Drowsy) और अर्ध-चेतनावस्था में पहुँच जाता है।
  • यकृत और पित्ताशय बढ़े हुए हों तो कैंसर संभव है।
  • चिकित्सा में विलम्ब होने पर शारीरिक शोथ।
  • याद रखिए चिकित्सक के पास जैसे ही कोई रोगी आए (पीलिया से सम्बन्धित) तो उससे रोग के आक्रमण का विस्तृत इतिवृत्त (History ) जानना आवश्यक होता है। 
  • यदि किसी प्रौढ़ स्त्री को पीलिया का आक्रमण एकाएक हुआ हो तो पित्ताश्मरी द्वारा अवरोध होना अधिक संभव है।
  • ऐसा पीलिया जो कैंसर के दबाव स्वरूप हुआ है वह पीलिया धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। 
  • कुछ सप्ताह तक बना रहने वाला पीलिया प्रायः अवरोध जन्य होता है।
  • आयुध कारखानों में काम करने वालों में पीलिया (Jaundice) प्रायः हो जाता है।

पीलिया के लिए चिकित्सा विधि:- 

  • चिकित्सा कारण के अनुरूप । 
  • कृमि कारण प्रतीत हो रहे हों तो कृमि नाशक औषधि । 
  • अश्मरी (स्टोन) की स्थिति में ऑपरेशन।
  • आध्यमान, (Flatulence) अजीर्ण आदि के
  • लिए अग्नि औषधि प्रयोग में लानी चाहिए। 
  • रक्तस्राव की अधिकता में रक्तधान (Blood Transfusion) की व्यवस्था करनी होती है,

एवं विटामिन 'के' का उपयोग । सावधान- इस रोग की चिकित्सा किसी अनुभवी एवं प्रतिष्ठित डॉक्टर से करानी चाहिए, क्योंकि इस रोग में सही चिकित्सा मिलने में देर हो जाए तो यह रोग बढ़कर विकराल रूप धारण कर लेता है और कभी -कभी जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है।

पीलिया के रोगी को क्या क्या खाना चाहिए?

  • वसारहित दुग्ध उत्तम पेय है।
  • जल पर्याप्त मात्रा में आवश्यक।
  • यदि यकृत कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो गई हों तो ग्लूकोज पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए।
  • पीलिया के रोगी को पर्याप्त गन्ने का रस, नारंगी, अंगूर, मुनक्का, केला, अंजीर, सेव फल, नींबू, मक्खन निकली छाछ, खिचड़ी मूँग की छिलकेयुक्त दाल, चावल (थोड़ी सी शक्कर डालकर) खाना चाहिए।
  • पानी उबाल कर ठंडा करके पीना चाहिए। कच्ची मूली, परवल, आंवला, कच्चे केले की सब्जी का सेवन उत्तम ।
  • पूर्ण विश्राम आवश्यक (Complete Bed Rest) | भारी और गरिष्ठ भोजन वर्जित।
  • पीलिया के उपचार में आहार में सुधार करना सबसे महत्वपूर्ण है। आहार में क्षारीय तत्व
  • अधिक होने चाहिए।  पर्याप्त लौह वाली सब्जियाँ, हरी प्याज, कुम्हडा, गाजर, मूली, चुकंदर, टमाटर, आलू आदि का सेवन।
  • घर में बना पनीर, अंडे और दूध का सेवन करना चाहिए।
  • विटामिन बी 12 पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे, इसके लिए दूध अडे, पनीर, मूँगफली, सूजी एवं
  • सोयाबीन उत्तम आहार हो सकता हैं । 
  • दो नींबू नित्य आवश्यक रूप से  भोजन में सेवन करना चाहिए।
  • चुकदर पीलिया के लिए उत्तम आहार है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। 
  • वर्जित- तले व चिकने पदार्थ, घी, तेल, मिर्च, खटाई, सरसों, गुड, माँस, शराब, चाय, तम्बाकू आदि का सेवन नहीं करना चाहिए.
  • प्रारंभ में रोगी को 5 दिन तक ताजे फलों के आहार पर रखना उत्तम रहता है। इन दिनों
  • रोगी को प्रति 5 घंटों पर 3 बार ताजे रसीले फलों का आहार लेना चाहिए। तत्पश्चात् 15 दिन तक उसे फल और दूध इन 15 दिनों के बाद संतुलित आहार 

पीलिया के मामले में यह याद रखिए:- 

इस रोग में कुछ चिकित्सकों की राय के अनुसार वस्ति कर्म (Anema) अत्युपयोगी है। प्रतिदिन विरेचन आवश्यक।

छेने का सुपाच्य और मृदु भोजन दें। 0 दिन में 3-4 लिटर जल पिलावें।

पीलिया रोग की औषधि चिकित्सा:-

लिवर इक्स्ट्रेक्ट विद बी कॉम्पलेक्स' 2 मि. ली. मास में इंजेक्शन अथवा निओमेथीडीन 10 मि. ली. आई. वी. (I.V.) 1 सीरप रूप में मेथिओनिन विद कोलीन फोर्ट (Methionin with Coline forte) 2-2 चम्मच दिन में 3 बार। 

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