Active Study Educational WhatsApp Group Link in India

वातस्फीति/एम्फिसीमा (EMPHYSEMA)

एम्फिसीमा (EMPHYSEMA)- एम्फिसीमा को वायु प्रकोष्ठ-विस्तृत पल्मोनरी एम्फिसीमा भी कहते हैं। अर्थात शरीर के ऊतकों अथवा गुहाओं में वायु की असामान्य उपस्थिति। एम्फिसीमा  फेफड़ों का एक दीर्घकालिक रोग जिसमें वायु-थैलियों का असामान्य फैलाव होता है एवं कुछ प्रकरणों में इतना बढ़ जाता है कि मध्यस्थ भित्तियाँ फट जाती हैं एवं फेफड़ों की सतह पर फफोले (Bullac) बन जाते हैं, दीर्घकालिक श्वसन रोगों में होता है एवं श्वसनाभाव उत्पन्न करता है।

एम्फिसीमा  क्यों होता हैं ? जाने लक्षण, कारण और उपाय | Emphysema in hindi

एम्फिसीमा की परिभाषा (Definition Of Emphysema)

एम्फिसीमा एक दीर्घकालिक उत्तरोत्तर बढ़ने वाली फेफड़े की बीमारी है, जिसके कारण प्रारंभ में सांस लेने में तकलीफ होती है। वातस्फीति से ग्रस्त लोगों में शरीर को सहारा देने वाले ऊतक और फेफड़े के कार्य करने की क्षमता नष्ट हो जाती है।

एम्फिसीमा के प्रमुख कारण (Major causes of emphysema)

  • यद्यपि इस रोग. का वास्तविक कारण ज्ञात नहीं है परन्तु कुछ तथ्य हैं जिनसे कारणों को समझने में सहायता मिलती है। 
  • आयु के साथ-साथ फेफड़ों की प्रत्यास्थता (Elasticity) कम होने से वायु कोष पूरी तरह खाली नहीं हो पाते। 
  • वहिःश्वसन (Expiration) में बाधा का होना। जैसे कि जीर्ण ब्रॉन्काइटिस एवं ब्रॉन्कियल अस्थमा में श्वास मार्ग का संकुचित हो जाना। 
  • हृदय एवं श्वास केन्द्रों के कार्यों का भली प्रकार सम्पन्न न हो पाना। 
  • पल्मोनरी डिजीज। फेफड़ों के अधिक कमजोर होने से श्वसन संस्थान में जल्दी-जल्दी जीवाणु संक्रमण के परिणामस्वरूप। 
  • बाह्य पदार्थ एवं नियोप्लाज्म की उपस्थिति। क्रॉनिक ब्रॉन्काइटिस, अस्थमा अथवा Pneu moconiosis के परिणामस्वरूप। 
  • श्वसनी शोथ के साथ वातस्फीति का होना वृद्धावस्था में दक्षिण - हृदयपात सबसे बड़ा करण है। (यह भी पढ़े - आलस को कैसे दूर करें )

एम्फिसीमा के लक्षण (Symptoms Of Emphysema)

  • साँस फूलना एवं वक्ष का बेलनाकार होना। 
  • प्रायः ब्रॉन्काइटिस के पश्चात रोग का प्रारम्भ धीरे-धीरे होता है। 
  • प्रायः ब्रॉन्काइटिस के लक्षण मिलते हैं। आरम्भ में साँस लेने में केवल श्रम करने पर ही कठिनाई प्रतीत होती है, परन्तु धीरे-धीरे आराम करते समय भी होने लगती है और बैठे-बैठे भी साँस कठिनाई से आता है। 
  • प्रायः ऐसे रोगियों में श्वसनीशोथ या ब्रॉन्कियल अस्थमा के आक्रमण होते रहने का इतिहास मिलता है। - दक्षिण हृदयपात में श्वास कृच्छ्रता बढ़ जाती है। 
  • जरा सी सर्दी बढ़ जाने पर श्वास नलियों में इन्फेक्शन होकर खाँसी उठने लगती है। 
  • जिसके बीच में श्वास रोग का दौरा भी हो जाता है। पतला और गाढ़ा बलगम गिरता है। 
  • श्यावता (Cyanosis) इसका एक प्रधान लक्षण है। रोगी के होंठ, नख एवं चेहरा नीला पड़ जाता है। 
  • श्वास और खाँसी के वेग वर्षों तक होते रहते हैं। रोगी की श्रम करने की शक्ति घट जाती है और जरा सा श्रम करने पर उसका श्वास चढ़ने लगता है। 

एम्फिसीमा की पहिचान (Identification Of Emphysema)

  • रोग का निर्णय करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि वातस्फीति में साँस का छोटा होना एक अनिवार्य लक्षण है। 
  • ग्रीवा छोटी एवं शिरायें उभरी हुई मिलती हैं। 
  • श्रवण परीक्षा करने पर बहिःश्वसन के बहुत लम्बा होने का पता चलता है साथ ही सीटियाँ सुनाई पड़ती हैं। 
  • कफ की परीक्षा करने पर कफ झागदार, चिपचिपा तथा पीवयुक्त होता है।(इसे भी देंखे - इयरफोन इस्तिमाल करने के नुकशान)

एम्फिसीमा का परिणाम (Result Of Emphysema) 

  • रोग वर्षों तक बना रहता है। यदि खाँसी और श्वास को नियंत्रित रखा जाय तो रोगी दीर्घकाल तक जीवित रहता है। । 
  • केवल वातस्फीति हो तो जीवन को तुरन्त खतरा नहीं होता है। 
  • यदि साथ में ब्रॉन्को न्यूमोनिया, बॉन्कियल दमा और हृदय रोग (Cardiac disease) भी हो तो दीर्घायु की सम्भावना कम रह जाती है।

एम्फिसीमा की चिकित्सा विधि (Medical Treatment Of Emphysema)

  • सर्वप्रथम खाँसी को दूर करने का यत्न करना चाहिए। 
  • ब्रॉन्को न्यूमोनिया या ब्रॉन्कियल व्यवस्था करनी चाहिए। 
  • वातस्फीति से यदि हृदय विकार हों तो उसकी ओर भी ध्यान देना चाहिये। 
  • रोगी को नींद आना आवश्यक है। पर अहिफेन का प्रयोग इस कार्य के लिये नहीं करना चाहिये। 
  • चिकित्सा कारणों के अनुसार भी करना चाहिये। 
  • खुली हवा में भ्रमण तथा श्वास सम्बन्धी व्यायाम एवं प्राणायाम करना चाहिए।

एम्फिसीमा (EMPHYSEMA) से जुडी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो तो इस एम्फिसीमा (EMPHYSEMA) की जानकारी को जरूरत मंदों को शेयर जरूर करें ताकी उन्हें भी एम्फिसीमा (EMPHYSEMA) की यह जानकारी मिल पाए.
शेयर करें: