ब्रोंकोन्यूमोनिया (BRONCHO PNEUMONIA)
ब्रोंकोन्यूमोनिया को हिंदी में श्वसनी फुफ्फुस शोथ ब्रोंकोन्यूमोनिया (BRONCHO PNEUMONIA) में फेफड़ों की सूजन जो अधिकतर अंत की श्वसनिकाओं से प्रारम्भ होती हैं और फेफड़ों की सूजन आमतौर पर टर्मिनल ब्रोन्किओल्स में शुरू होती है। ब्रोंकोन्यूमोनिया (BRONCHO PNEUMONIA) वाले किसी व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी हो सकती है क्योंकि उनके वायुमार्ग संकुचित होते हैं। BRONCHO PNEUMONIA के दौरान सूजन के कारण उनके फेफड़ों को पर्याप्त हवा नहीं मिल पाती है। ब्रोन्कोपमोनिया के लक्षण हल्के या गंभीर हो सकते हैं।
ब्रोंकोन्यूमोनिया क्या हैं (what is bronchopneumonia in hindi):-
ब्रोंकोन्यूमोनिया एक भयानक छूत वाला रोग है। कई प्रकार के जीवाणुओं के द्वारा फेफडों के वायुमार्ग और सूक्ष्म प्रणालियों में तथा उनसे संबंधित वायु कोष्ठों में सूजन पैदा हो जाती है। कहीं अधिक कहीं कम, शोथ से उनका मार्ग तंग हो जाता है।
ब्रोंकोन्यूमोनिया के कारण (due to bronchopneumonia):–
- ब्रोंकोन्यूमोनिया का मुख्य कारण 'न्यूमोकोकस' (Pneumococcus) होता है।
- इसके साथ साथ 'स्ट्रेप्टोकोकस', 'स्टैफिलोकोकस' तथा 'प्रतिश्याय' के जीवाणु कभी-कभी पायें जाते हैं।
- गौण रूप में रोमांतिका वातश्लैष्मिक ज्वर, आंत्रिक ज्वर (Enteric fever) आदि को पैदा करने वाला जीवाणु पहले से ही कंठ, टेंटुआ, वायु प्रणालियों आदि में उपपस्थित रहता है और समय आने पर शोथ पैदा कर देता है।
- माता के अपथ्य सेवन से बच्चों में।
- वयस्कों में प्रायः तीव्र श्वसनी शोथ (Acute Bronchitis) अथवा फ्लू के बाद ।
- विष संसर्गी रोगों के अंत में उपद्रव स्वरूप।
ब्रोंकोन्यूमोनिया के लक्षण (Symptoms of bronchopneumonia):-
- ब्रोंकोन्यूमोनिया का प्रारंभ एकाएक। जाड़ा लगकर बुखार । बुखार प्रतिदिन बढ़ता जाता है।
- दो-तीन दिनों में ही 102 या 103 डि. फा. तक ।
- प्रायः प्रारंभ से ही बुखार तेज रहता है और छः दिनों तक एक स मान रहकर फिर धीरे-धीरे कम होने लगता है।
- अकस्मात एकाएक उतर जाता है।
- छाती में तेज दर्द (High pain in chest) ।
- खाँसी एवं श्वास फूलना (Asthma) खाँसी ।
- इसका एक प्रमुख लक्षण है। 'पूयावता' तथा 'पांडुता' के लक्षण। ।
- शिशुओं में प्रारंभ से ही वमन एवं प्रवाहिका के लक्षण। ।
- शिशुओं में विशेषकर आक्षेप।
- रोगी थका हुआ और दुर्बल दिखायी देता है। कभी-कभी बेचैनी, प्रलाप एवं अनिद्रा के लक्षण।
- गौण रोग के रोगी को
- अधिकतर प्रारंभ से ही रोमांतिका' या तेज खाँसी आदि से तकलीफ होती रहती है और ऐसे ही समय यह रोग गुप्त रूप से प्रारंभ हो जाता है।
- धीरे धीरे बुखार 102 से 103° डि. फा. तक पहुँच जाता है।
- खाँसी और कष्टदायक श्वास दमे के समान तेज हो जाती है।
- बलगम अल्प मात्रा में निकलता है। अथवा सूख कर कष्ट पहुँचाता है।
- बलगम के सूख जाने पर भयानक स्थिति पैदा हो जाती है रोगी के नथुने फूल जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि पसलियाँ भीतर की ओर घुसी जा रहीं हैं।
ब्रोंकोन्यूमोनिया की पहचान कैसे करें (How to Diagnose Bronchopneumonia):-
- एश्वास कठिनता से आना, पूयता एव बलगम |
- (Sputum) इसके प्रधान निदानात्मक लक्षण। परीक्षा में- शुष्क जिव्हा का मिलना। श्रवण परीक्षा में-हृदय गति तीव्र।
- कफ परीक्षा में-रोग उत्पादक जीवाणु की उपस्थित।
- छाती के एक्स-रे परीक्षा में दोनों फेफड़ों में अपारदर्शिता के क्षेत्र स्थान-स्थान पर, रक्त परीक्षा में श्वेत कोशिकाओं एवं पॉलीमार्क्स की वृद्धि मिलती है।
ब्रोंकोन्यूमोनिया का परिणाम (consequences of bronchopneumonia):-
- ब्रोंकोन्यूमोनिया रोग सप्ताह से 3-4 सप्ताह तक रहता है और कभी-कभी महीनों तक रहता है। ।
- गौण रूप में 'रोमांतिका' या 'टायफॉइड' के रहने पर अपेक्षाकृत अधिक भयानक होता है।
- वृद्ध रोगी को लंबी खाँसी 'एम्फाइसीमा' या 'नेफ्राइटिस' का रोग होने पर रोग कष्ट साध्य ।
- अंड-बंड बकना, बहुत तेज नाड़ी, श्वास, शरीर का पीला पड़ना आदि का होना मारत्मक होते हैं।
ब्रोंकोन्यूमोनिया चिकित्सा विधि (bronchopneumonia therapy method):-
- ब्रोंकोन्यूमोनिया रोगी को शीत व वायु के झोंकों से बचाएँ। मुख्य तथा गौण दोनों की चिकित्सा के लिए 'सल्फा ड्रग्स' तथा पेनिसिलीन एवं 'टेट्रासाइक्लीन' हैं, जो अचूक साबित हो चुकी है फिर भी इन्हें गौण चिकित्सा में पूर्ण लाभकारी नहीं समझा जा सकता।
- चूँकि गौण रोग अधिक समय तक रहता है। इसलिए इसमें हृदय को उत्तेजना देने वाली दवाएँ खासतौर से देना चाहिए।
- आधुनिकतम चिकित्सा विधि के अनुसार पहले 'सल्फा ड्रग्स' न देकर चार लाख की दैनिक मात्रा में प्रोकेन पेनिसिलीन (Procain Penicillin) देनी ही उत्तम है।
- इस प्रकार एक बार इन्जे. देकर तब चिकित्सा शुरू करनी चाहिए। जहाँ पेनिसिलीन के प्रयोग से लाभ दिखायी न दे वहाँ स्ट्रेप्टोमाइसीन' (Streptomycin) अथवा 'क्लोरोमाइसिटीन (Chloromycetin) ' के व्यवहार की सलाह देनी चाहिए।
- 08-10 दिन से अधिक 'सल्फाजातीय औषधियाँ सेवन न कराई जायें । इससे रक्ताल्पता' और 'रक्त विकृति' आ सकती है।
- 2-3 दिनों तक नियमित मात्रा सेवन कराने पर भी यदि रोग लक्षण कम न हो तो इस औषधि से लाभ न होगा।
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