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SUMMER HEALTH TIPS HINDI

Summer Health Tips Hindi- दोस्तों हम सब जानते हैं की गर्मियों के मौसम में हमारे शरीर की हालात क्या होती हैं। वैसे देखा जाए तो मानाव शरीर सभी मौसम के अनुरूप अनुकूल होने की क्षमता होती हैं, पर कई बार कई मौसम के सामने हमार शरीर टिक नहीं पाता. ठीक वैसा ही हाल कुछ गर्मी का हैं।

 

आज के इस आर्टिकल में हम कुछ ऐसे खास टिप्स के बारे में जानने वाले हैं, जिससे हम अपने बॉडी को भीषण गर्मी से बचा सके। Summer Health Tips Hindi

Summer Health Tips Hindi

Summer Health Tips Hindi table of content

  • पानी का नियमित सेवन (Regular Water Intake)
  • अपने अंगों की सुरक्षा(Protect Your Organs)
  • भोजन का रखें ध्यान (Take Care of Food)
  • नरम व सूती के कपड़े पहने (Wear Soft and Cotton Clothes)
  • तरल पदार्थों का उपयोग(Use Of Liquids)
  • AC या कूलर से निकलते ही सीधे धूप के संपर्क में ना जाए
  • गर्मी में व्यायाम और आराम (Summer Exercise And Rest)
  • लू व हीट वेव से रहें सावधान (Beware of Heat Wave and Heat Wave)

1. पानी का नियमित सेवन (Regular Water Intake)-

दोस्तों जैसे ही गर्मियों का मौसम आता हैं वैसे ही हमारे शरीर में पानी की मात्रा अपने आप कम होने लगती हैं। और इसकी सबसे बड़ी वजह हमारे बॉडी का बढ़ता हुआ तापमान, ऐसे स्थिति में पानी की कमी से हमारे शरीर में न जाने ऐसे कई सरे दिक्कते आने लगती हैं, जो कही न कही हमारे शरीर को नुकसान पहुचाता हैं। ऐसी स्थिति में हमें गर्मियों में पानी का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।

2. अपने अंगो की सुरक्षा(Protect Your Organs)-

आपने यह बात नोटिस की ही होगी की, जब भी हम भरी गर्मी में कही बाहर जाते हैं तब त्वचा में जलन महसूस होता है. यह सब तेज धुप की वजह से होता हैं, जिससे हमें बचना जरूरी होता हैं सूर्य की किरने धुप के साथ-साथ कई सारे घाताक किरणों को भी ले कर आता हैं। और यह घातक किरणें हमारे कोशिकाओं को नष्ट करती हैं।Summer Health Tips में यह प्रमुख हैं।

3. भोजन का रखें ध्यान (Take Care of Food)-

गर्मियों के दिनों में कही न कही बाकी मौसमो की तुलना में हमारे शरीर को ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती हैं। हमारी बॉडी का तापमान बढ़ने की वजह से हमारे शरीर में ऊर्जा की अल्पता होती जाती हैं और हमारा शरीर कमजोर पड़ता जाता हैं और ऐसे हमारे सेहत के खराब होने की नौबत ज्यादा बनी रहती हैं। ऐसे में कोशिश करें की जब भी घर से बाहर निकले तो कुछ खा कर ही निकले ताकि बॉडी में ऊर्जा की मात्रा बनी रहें। खाने में कोशिश करें की तली भुनी चीजें ना ले बल्कि उसकी जगह कुछ फल या हल्दी चीजों को शामिल करें

4. नरम व सूती के कपड़े पहने (Wear Soft and Cotton Clothes)-

दोस्तों जैसा की आप सब जानते हैं हम अपने पहनावे को जरूरत के हिसाब से बदलते रहते हैं। जैसे- कही घुमने गए तो घुमने वाले कपड़े, खेलने गए तो स्पोर्ट्स के कपड़े पहनते हैं। ठीक इसी तरह से गर्मियों के दिनों में कुछ खास तरह के कपडे पहने जैसे की सूती के कपड़े, हलके कपड़े, ऐसे कपड़ें जिससे हवा पास हो सके। और गर्मी के वजह से आने वाले पसीने से आपको राहात मिल सके।

5. तरल पदार्थों का उपयोग(Use Of Liquids)-

आपने देखा होगा की जैसे ही गर्मियों का सीजन आता हैं तरल पदार्थो की मांग बढ़ जाती है। इसका मतलब यह हैं की लोग गर्मियों के दिनों में कई ऐसे तरल पदार्थो का सेवन करते हैं जिससे उन्हें ऊर्जा मिल सके। आप भी गर्मियों के दिनो में अपने पसंद के अनुसार तरल पदार्थ जैसे की - नारियल पानी, नींबू पानी, छाछ, लस्सी, जूस का सेवन कर सकते हैं। अब गर्मी के दिनों में ठंठे तरल पदार्थो को कई लोग धुप से आते ही थके हुए हाल में पिने लगते हैं, जो की गलत तरिका हैं आप किसी भी तरल पदार्थो का सेवन करें तो आराम से करें।

6. AC या कूलर से निकलते ही सीधे धूप के संपर्क में ना जाएं-

कई बार होता हैं की जैसे हम अपने घर या ऑफ़िस में बैठे हैं और आपको अचानक बाहर जाना हो गया तो ऐसे में सीधे धूप के संपर्क में न जा कर थोडा कम धूप में पहले जाए फिर आगे बढे।

AC या कूलर में रहने से हमारी त्वचा काफी सेंसेटिव हो जाती हैं और जैसे ही हम बाहर धूप के संपर्क में आते हैं तो हमारी त्वचा धूप में शामिल हानिकारक किरणों से नहीं लड़ पाती और वह जलने लगती हैं, जिससे हमें जलन महसूस होती हैं।

7. गर्मी में व्यायाम और आराम (Summer Exercise And Rest)-

दोस्तों जीवन में जितना आराम जरूरी हैं उतना व्यायाम भी जरूरी हैं, गर्मी के दिनों में कोशिश करें की समय निकल कर व्यायाम करें। और रही बात आराम की तो यदि आपके पास समय बचता हैं दोपहर में पावर नैप जरूर ले ‘ पावर नैप’ का अर्थ थोड़े समय की नींद होती हैं जिसमें आप अपने शरीर के साथ-साथ अपने दिमाग को भी आराम देते हैं ताकि वह अच्छे से और तेजी से काम कर जाएं।

8. लू व हीट वेव से रहें सावधान (Beware of Heat Wave and Heat Wave)-

जैसे ही मई-जून की गर्मिया स्टार्ट होती हैं तब कड़ाके की धूप और गर्मी जीना दुर्भर कर देतीं हैं और इस्क्जे साथ ही साथ आता हैं लू और हीट वेव जो एक आम व्यक्ति के शरीर को झकझोर कर रख देता हैं। जब भी आप गर्मियों के मौसम में घर से बाहर निकले तो कुछ जरूरी तैयारी के साथ ही निकले जैसे की- साथ में एक पानी की बोतल रखना, हाथ व पैरो को पूरी तरह ढकना, चेहरे व सर की सुरक्षा के लिए स्कार्फ व टोपी का इस्तिमाल करना.

दोस्तों आज के इस आर्टिकल Summer Health Tips Hindi में हमने जाना की कैसे हम अपने और अपने शरीर की सुरक्षा कर सकते हैं। इस लेख में Summer Health Tips Hindi में बताई गयी बातें यदि आपको उपयोगी लगी हो तो इस आर्टिकल को अपने दोस्तों तक शेयर जरूर करे। 

Food fact in Hindi

दोस्तो हमारे आहार और हमारे हेल्थ का रिश्ता कितना गहरा हैं, यह तो मुझे बताने की जरूरत नहीं हैं क्योंकि हमारे रोजाना के खान पान का सीधा आसार हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता ही हैं. 

आज के इस पोस्ट में हम खाने और हमारे हेल्थ से जुड़े कुछ ऐसी जानकारियां को जानेंगे जो शायद ही आप जानते होंगे. 

Food fact in Hindi

Food fact in Hindi Table Of Content- 

  • रसम (Rasam)
  • नींबू के फायदे (Benefits of Lemon)
  • इमली एक गुणकारी फल (Tamarind Is a Beneficial Fruit)
  • हाथ से खाना रहता हैं कारगर (Eating By Hand Remains Effective)
  • जो सामान्य भोजन हम करते हैं (The Normal Food We Eat)

रसम (Rasam)

रसम मूल रूप से, हम इमली के रस और कई अन्य मसालों का उपयोग करके रसम तैयार करते हैं। टमाटर का रसम बहुत प्रसिद्ध है। अन्य लोकप्रिय रसम हैं काली मिर्च जीरा रसम, लहसुन रसम, दाल रसम और भी बहुत कुछ। स्वास्थ्य सुविधाएं रसम कब्ज को रोकता है, वजन घटाने में कारगर, खनिजों से भरपूर होता हैं।

नींबू के फायदे (Benefits Of Lemon)

नींबू मुंहासों के लिए एक प्रभावी उपचार है। अपने दैनिक आहार में नींबू को शामिल करने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य सुविधाएं पाचन में मदद करता है आपके लिवर और त्वचा को साफ करता है, सांसों को तरोताजा करता है, कैंसर के खिलाफ प्रभावी भी हैं।

इमली एक गुणकारी फल (Tamarind Is A Beneficial Fruit)

इमली के बीज खाने से प्रजनन क्षमता बढ़ती है? इमली में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करती है। इमली और इसके बीज मैग्नीशियम और विटामिन बी6 जैसे खनिजों से भरपूर होते हैं जो महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छे होते हैं।

हाथ से खाना रहता हैं कारगर (Eating By Hand Remains Effective)

हाथ से खाना भारतीय परंपरा और आयुर्वेद के अनुसार, जब हम अपने हाथों से अपने भोजन को छूते हैं तो मस्तिष्क तापमान को भांप लेता है और आवश्यक मात्रा में एंजाइम और पाचक रस पैदा करता है। Health benefits : र रक्त संचार बढ़ाता है। के हमारे पाचन तंत्र की रक्षा करता है।

जो सामान्य भोजन हम करते हैं (The Normal Food We Eat)

  • जो सामान्य भोजन हम करते हैं उसके बारे में तथ्य आलू और टमाटर आलू और टमाटर के पत्ते, तना या अंकुरित अनाज न खाएं। 
  • इसमें ग्लाइकोकलॉइड नामक जहरीला पदार्थ होता है। 
  • सेब- सेब के बीजों में एमिण्डालिन होता है। यह हमारे पाचन एंजाइमों को नुकसान पहुंचा सकता है। 
  • कच्चा शहद- गैर-पाश्चुरीकृत शहद में ग्रेनोटॉक्सिन होता है जो उल्टी, चक्कर आना और कमजोरी का कारण बन सकता है।
  • चिकन टिक्का मसाला इस विश्व प्रसिद्ध भारतीय व्यंजन का आविष्कार सबसे पहले स्कॉटलैंड में हुआ था होता है। नान कहा जाता है कि नान को मुगलों द्वारा भारत लाया गया था और इसकी जड़ें फारसी हैं।

खाद्य पदार्थ जो अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में नहीं खा सकते (Foods That Astronauts Can't Eat In Space)

नमक और चीनी रोटी सोडा शराब अंतरिक्ष में फल, सब्जियां, स्पेगेटी, कैंडीज, नट्स, पीनट बटर, दही आदि खाए जाते हैं।

उम्मीद हैं की अज के इस आर्टिकल में दी गयी यह जानकारी आपको रोचक और उपयोगी लगी हो, आपसे निवेदन हैं की कृपया इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें. 


रहस्यमई बीमारियाँ (Mysterious Diseases)

दोस्तों आज के समय में बिमारी के बारे में कौन नहीं जानता. आज-कल हम सब कई तरह के बीमारियों को तो अपने आस-पास के माहोल में ही देख लेते हैं. लेकिन यह तो हो गयी आम बीमारियाँ इसके अलावा और भी कई ऐसी बीमारियाँ होती हैं जो आम बीमारी नहीं होती हैं, और यह बीमारियाँ  थोड़ी रहस्यमई बिमारी होती हैं. 

Mysterious Diseases

TABLE OF CONTENT-

  • मोर्गेलन्स (Morgellons)
  • प्रोजेरिया (progeria)
  • एक्वाजेनिक पित्ती (aquagenic hives)
  • विदेशी एक्सेंट सिंड्रोम(foreign accent syndrome)
  • लाफिंग डेथ (laughing death)
  • एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम (Alice in Wonderland Syndrome)
  • पिका (pica)

मोर्गेलन्स(Morgellons)

Mysterious Diseases में सबसे पहले नंबर में हैं मोर्गेलंस. रोग (एमडी) एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें धीमी गति से ठीक स्किन के अंदर से फाइबर निकलते हैं। एमडी वाले लोग अक्सर अपनी त्वचा पर चुभने, रेंगने या जलन महसूस करने की रिपोर्ट करते हैं। ये लक्षण दर्दनाक और लंबे समय तक चलने वाले हो सकते हैं, जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। हर साल इसके 19,000 मामले सामने आते हैं।

प्रोजेरिया(progeria)

प्रोजेरिया जन्मजात है, जिसका अर्थ है भ्रूण को दोष या क्षति। इस घातक बीमारी से पीड़ित लोगों की उपस्थिति समय से पहले बुढ़ापा जैसी दिखती है, लेकिन औसतन 13 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो जाती है। 9 से 24 महीनों के बीच गहरी वृद्धि में देरी शुरू हो जाती है, जिससे चेहरे का असामान्य विकास होता है। 90% मरीजों की मौत हार्ट अटैक या स्ट्रोक से होती है।

पढ़े बेहतरीन हेल्थ टिप्स - क्लिक करें 

एक्वाजेनिक पित्ती(aquagenic hives)

इस बीमारी ने केवल 30 लोगों को ही प्रभावित किया है। पानी से एलर्जी या "एक्वाजेनिक पित्ती" अत्यंत दुर्लभ है, लेकिन इसके अस्तित्व की पुष्टि मेडिकल रिव्यू बोर्ड द्वारा की गई है। पीड़ितों को पानी से एलर्जी होने लगती है। यह आमतौर पर जीवन में देर से होता है और अक्सर हार्मोनल असंतुलन के परिणामस्वरूप होता है। एक्वाजेनिक पित्ती का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, लक्षणों को कम करने के लिए उपचार के विकल्प उपलब्ध हैं।

विदेशी एक्सेंट सिंड्रोम(foreign accent syndrome)

विदेशी उच्चारण सिंड्रोम के पीड़ित बेवजह खुद को एक अपरिचित बोली में बात करते हुए पाते हैं। केवल 60 मामले अब तक दर्ज किए गए हैं। डॉक्टरों ने शुरू में इसे एक मानसिक समस्या के रूप में खारिज कर दिया, लेकिन 2002 में, इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने देखा कि पीड़ितों में मस्तिष्क की असामान्यताएं समान थीं, जिसके कारण भाषण पिच में बदलाव, स्वर ध्वनियों का लंबा होना और अन्य अनियमितताएं हुईं।

लाफिंग डेथ(laughing death)

लाफिंग डेथ Laughing Death, जिसे आमतौर पर कुरु के नाम से जाना जाता है, न्यू गिनी के आदिवासी लोगों में यह पाया गया था। लोग शुरू में अंगों के कांपने का अनुभव करते हैं और तीन महीनों में, खड़े होने की क्षमता खो देते हैं, अंत में मरने से पहले क्रॉस-आइड हो जाते हैं। गांव में मौत के बाद परिवार के सदस्यों को रवाने की प्रथा के जरिए संक्रमण फैला था। जब इसे बंद कर दिया गया, तो महामारी समाप्त हो गई।

एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम(Alice in Wonderland Syndrome)

ऑक्सफोर्ड हैंडबुक ऑफ क्लिनिकल मेडिसिन के अनुसार, एलिस इन वंडरलैंड सिंड्रोम के पीडित वस्तुओं को उनकी तुलना में बहुत छोटा समझते हैं। स्थिति, जिसे माइक्रोप्सिया या लिलिपुट दृष्टि के रूप में भी जाना जाता है। ये बीमारी सुनने, स्पर्श करने और स्वयं के शरीर की छवि की धारणाओं को प्रभावित करती है।

पिका(pica)

पिका एक खाने का विकार है, जिसमें लोग एक या एक से अधिक गै-रखाद्य पदार्थ, जैसे बर्फ, मिट्टी, कागज, राख या गंदगी रवाने के लिए मजबूर होते हैं। पैगोफैगिया पिका का एक उपप्रकार है। इसमें बर्फ या बर्फ का पानी खाना शामिल है। इसे केवल तभी पिका माना जा सकता है जब भूरव एक महीने से अधिक समय तक बनी रहे और पीड़ित ऐसी उम्र का हो जहां इन वस्तुओं को खाना विकास की दृष्टि से अनुचित माना जाता है। 

तो दोस्तों मै उम्मीद करता हु की आज के इस लेख में बताई गयी जानकारी आपको अच्छी लगी होगी. आज आपने जीतने भी रहस्यमई बीमारियों  (Mysterious Diseases) के बारें में जाना वह आपके ज्ञान को बढ़ाएंगे और यह जानकारी आपको कभी न कभी कम जरूर आएँगी. 

Healthy Lifestyle Tips in Hindi | हेल्थ टिप्स

स्वस्थ जीवन को मानव जीवन का सबसे बड़ा धन कहा जाता हैं. वैसे तो सेहतमंद रहने के हजारों तरीके है, और वह तरीके अलग-अलग नियम के अनुसार काम करती हैं. आज हम उन्ही तरिको में से कुछ महत्वपूर्ण नियमों को जानेंगे जिससे की हम अपने जीवन में सेहतमंद रह सकते हैं।

अपने भोजन को दवा की तरह खाओ ताकि आप उस अवस्था में न पहुंच जाओ, जहां दवा ही आपका भोजन हो। पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें, जैसे लीन प्रोटीन, स्वस्थ कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सिडेंट।

स्वस्थ जीवन के लिए सुनहरा नियम | Health Tips in Hindi

जब 20 साल के हों (When 20 Years Old)-

स्वस्थ जीवन के लिए इस उम्र में, आपका रक्त बिना रुकी हुई धमनियों से मुक्त रूप से बहता है और आपके पास कोशिकाएं होती हैं आहार : मधुमेह और कब्ज से सुरक्षित रहने के लिए फाइबर युक्त भोजन करें। दूध, मछली, टूना, सामन, अनाज, दलिया, सोया जैसे उच्च विटामिन डी वाले भोजन को शामिल करें।

जाने- नींद की कमी से होने वाले नुकशान 

जब 30 साल के हों (When 30 Years Old)-

इस उम्र में, आपका चयापचय धीमा होने लगता है और आपको वजन बढ़ने और मांसपेशियों के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। आपको हृदय रोगों के जोखिम के बारे में भी सोचना होगा। अपने आहार में ओमेगा -3 फैटी एसिड शामिल करें। शराब पीने की आदत न डालें, यह निश्चित रूप से आपके जीवन को बर्बाद कर देगा।

जब 40 साल के हों (When 40 Years Old)-

इस उम्र में, एटाआक्सिडेंट से भरपूर उच्च फाइबर वाले आहार पर अधिक ध्यान दें। मौसमी और स्थानीय रूप से उपलब्ध जैविक फल खाएं। अमरुद, आम, ड्रैगन फ्रूट, चुकंदर, कटी हुई पत्ता गोभी की सलाह दी जाती है। कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करें और जंक फूड को ना कहें।

जब 50 साल के हों (When 50 Years Old)-

इस उम्र में, महिलाओं को चिंता करने के लिए रजोनिवृत्ति होती है, पुरुषों के पास ध्यान केंद्रित करने के लिए उनके मिड्रिफ होते हैं। रक्त शर्करा के स्तर, रक्त में कोलेस्ट्रॉल और उच्च रक्तचाप की जांच करें। अपने आहार में पोटेशियम युक्त खाद्य पदार्थों को शामिल करें। पैकेज्ड और जंक फूड से पूरी तरह परहेज करें।

पढ़े- तनाव दूर करने के अचूक उपाय 

जब 60 साल के हों (When 60 Years Old)-

आप ग्रेट हैं, जीवन में बहुत आगे निकल आए हैं। इस उम्र में आपको अपनी मांसपेशियों को बनाए रखने और एक्स्ट्रा वेट से लड़ने पर ध्यान देने की जरूरत है। अपने प्रोटीन सेवन में विविधता लाएं और सुनिश्चित करें कि आपको पोषक तत्वों की निरंतर आपूर्ति मिलती रहे।

जब आप 70 या 80 के हों (When You're 70 Or 80)- 

इस उम्र में, हाइड्रेशन चिंता का एक प्रमुख कारण है, इसलिए दिन में लगभग 6-8 गिलास या कप पर्याप्त पानी पिएं। आपकी कैलोरी का सेवन आपकी गतिविधि के स्तर और चयापचय पर निर्भर करता है। वॉक करें, आस-पास से छोटी-मोटी शॉपिंग करें, जिससे ताकत और लचीलापन बना रहे।

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नेफ्राइटिस - NEPHRITIS

हमारे शरीर में दो किडनियां पायी जाती है, जो हमारे शरीर में उपस्थित अपशिष्ट तत्वों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को बहार निकलती हैं. यदि इन किडनियों में सुजन आ जाए तब इस स्थिति को “नेफ्राइटिस” कहा जाता हैं.

परिचय- जिस रोग में गुर्दे (किडनी) के प्रदाह की वजह से बहुत थोड़ी मात्रा में पेशाब होता है और बहुत शीघ्र सारे शरीर में शोथ (सूजन), कमजोरी, रक्ताल्पता (खून की कमी-Anemia) आदि शिकायतें पैदा हो जाती हैं इसे ब्राइट्स डिजीज कहते हैं। इसका दूसरा नाम नेफ्राइटिस (Nephritis) है। ("वृक्क शोथ' (Nephritis) निम्न दो प्रकार का होता है 1. एक्यूट (नया प्रदाह). 2. क्रॉनिक (पुराना प्रदाह)।

NEPHRITIS IN HINDI

इसे 'एक्यूट ग्लोमेरूलो नेफ्राइटिस' (Acute Glomerulo Nephritis) भी कहते हैं। इसमें दोनों वृक्कों के कोशिका स्तबकों (Glomeruli) में शोथ हो जाता है। नेफ्राइटिस से जुडी इस जानकारी में आज हम जानेंगे – 

  • नेफ्राइटिस के मुख्य कारण 
  • नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण
  • नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें
  • नेफ्राइटिस का परिणाम
  • नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त
  • नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी

नेफ्राइटिस के मुख्य कारण (Main causes of nephritis)-

  • सबसे बड़ा कारण रक्त संलापी (हीमोलाइटिक स्ट्रेप्टोकोकाई) नामक जीवाणु होते हैं। 
  • अधिक ठंड या सर्दी लगना। 
  • स्कारलैट फीवर, रक्तस्रावी चेचक आदि कुछ बीमारियों तथा डिपथीरिया, खसरा, मलेरिया, सेरिब्रो-स्पाइनल मेनिन्जाइटिस, विसर्प, वात ज्वर, एक्यूट ट्यूबरकुलोसिस, सेप्टीसीमिया, उपदंश, हैजा की कमजोरी हालत में तथा आग में जलने और नाना प्रकार के चर्म रोग के साथ भी यह बीमारी होती है। 
  • कुछ विषैली दवाओं यथा-पोटेशियम क्लोरेट, टर्पेन्टाइन, नाइट्रेट आदि के सेवन से।

नेफ्राइटिस के मुख्य  लक्षण (Main symptoms of nephritis)-

  • ठंड लग कर बीमारी एकाएक हो सकती है और देखते-देखते थोड़े समय में रोगी को सूजन आ जाती है। कभी-कभी शीत और कम्प होकर बीमारी आरम्भ होती है। 
  • कमर, सारे शरीर एवं माथे में दर्द। 
  • पहले आँखों के नीचे की पलक और पैर की गाँठ से पास सूजन होती है और फिर धीरे धीरे सारे शरीर में। चेहरे का फूलना। 
  • मूत्र की मात्रा अल्प और मूत्र में रक्त की उपस्थिति। 
  • व्याकुलता, ज्वर, अग्निमांद्य, वमन, शिरशूल आदि की प्रधानता।
  • सारा शरीर रक्तहीन दिखाई देता है। 
  • शरीर की त्वचा शुष्क ।
  • नोट- इस रोग में पेशाब बार-बार और जल्दी-जल्दी होता है और बहुत थोड़े परिमाण में होता है। यहाँ तक 2-4 बंद से अधिक नहीं। पेशाब लाल और गाढ़ा होता है। पेशाब बंद होने के कारण यूरीमिया। 

नेफ्राइटिस की पहचान कैसे करें (How to recognize nephritis)–

  • नाड़ी बहुत कड़ी और महाधमनी के ऊपर द्वितीय शब्द (2nd sound) बढ़ जाता है। 
  • पेशाब का आपेक्षिक गुरुत्व (Specific | Gravity) 1020 से 1440 तक। 
  • पेशाब टेस्ट में-एल्बूमेन, रक्त के कण और किडनी की गठित सामग्री यथा-रेनल, हायलिन, एपिथिलियल और रक्त का कास्ट, ट्यूब कास्ट आदि पाये जाते हैं। मूत्र कम, लाल या धूमिल (Smoky) एवं गाढ़ा। 
  • परेटिनल परीक्षण से अक्षिविम्ब शोफ (Papill oedema), रक्तसाव एवं निःसाव की जानकारी।

नेफ्राइटिस का परिणाम (Consequence of nephritis)–

  • सर्दी लग कर बीमारी हुई हो तो थोड़े ही दिनों में ठीक हो जाती है। 0
  • अन्यान्य कारणों से बीमारी हुई हो तो अधिकांश क्षेत्रों में घातक। 
  • ज्वर के साथ बच्चों को और गर्भवती स्त्रियों में 40-50% रोगियों की मृत्यु 
  • कभी-कभी पुराना रूप (Chronic) धारण कर लेती है। 
  • यूरीमिया होने से मस्तिष्क प्रभावित। 
  • कभी कभी बेचैनी, बेहोशी एवं पागलपन जैसे लक्षण। 
  • 'यूरीमिया' एवं 'अम्ल रक्तता से मृत्यु।
  • बच्चों में चिकित्सा द्वारा 90% लाभ, जबकि प्रौढ़ों में 50% की आशा।

नेफ्राइटिस  के लिए चिकित्सा सिद्धान्त (Medical principles for nephritis) –

  • इस बीमारी में गुर्दे का प्रदाह हो जाता है, इसलिये गुर्दे (Kidneys) को जितना ही विश्राम दिया जाय, उतना ही अच्छा है। 
  • ऐसी व्यवस्था करें जिससे दस्त वगैरह साफ हों। 
  • इस रोग में सूजन होती है और शरीर में पानी एकत्रित होता है इसलिये यदि 'प्लूरा और 'हृदयावरण' के भीतर पानी इकट्ठा हो तो उसके लिये दवा की अलग व्यवस्था करनी चाहिये। 
  • यदि पेशाब बहुत थोड़ा हो तो ऐसी व्यवस्था करें जिससे पेशाब का वेग बढ़े। 
  • यदि वमन हो तो उसे 'बर्फ, चूसने को दें। 
  • यदि वमन थोड़ा हो रहा हो तो व्यवस्था की आवश्यकता नहीं। 
  • यदि वमन बहुत देर तक होता रहे तो चिकित्सकों को विशेष सावधानी से काम लेना चाहिये।

नेफ्राइटिस  के लिए आहार व सावधानी- 

  • दूध इस रोग का प्रधान पथ्य है। 
  • रोग के कारण शरीर से जो एल्बुमिन निकल जाता है है दूध से उसकी पूर्ति हो जाती है। 
  • दूध, सागू, दूध बार्ली आदि के सिवाय कुछ न दें। पानी इच्छानुसार दिया जा सकता है। 
  • गर्म पेय अधिक लाभदायक हैं। 
  • ताजे पके फल, आलू, परवल, तोरई वगैरह उबाल कर दी जा सकती हैं। 
  • थोड़ा आराम हो जाने पर 30-45 अथवा दो महीने बाद भात, दाल, मछली का शोरवा दें। माँस कम से कम 6 महीने तक नहीं देना चाहिये। 
  • रोगी को गरम वस्त्रों में लपेट कर रखें, उसे ठंड तथा सीधी हवा नहीं लगनी चाहिये। 
  • बीमारी में आराम हो जाने के बाद भी 5-6 माह तक कमर में ऊनी कपड़ा लपेटे रहना चाहिये। 
  • बदन पर भी गरम कपड़े पहने रहना चाहिये।

उम्मीद है की नेफ्राइटिस से जुडी यह जानकारी आपको उपयोगी लगी हो. यदि नेफ्राइटिस के बारे में इतनी जानकारी आपने ले ली तो कृपया इस जानकारी को अन्य जरूरतमंद को जरूर भेजियें. “धन्यवाद”

 

उम्र के हिसाब से कराएँ शारीरिक जाँच 

दोस्तों जाँच किसी भी चीज को परखने का सबसे अच्छा माध्यम जाँच को माना जाता हैं. क्योंकि एक यही चीज होती हैं जिसके जरिये हमारे शरीर में आ रही समस्याओं को जाँच के माध्यम से ही पता लगाया जाता हैं. लक्षण उभरने पर रोग का इलाज कराने से बेहतर है कि उसे पहले ही पहचान लिया जाए। इसलिए चिकित्सक उम्र के अनुसार कुछ जांचें नियमित अंतराल पर कराने की सलाह देते हैं।

अलग-अलग उम्र में शारीरिक जाँच की जरूरत | Physical Examination in Hindi

30 की उम्र से पहले कराए जाने वाले जाँच-

  • हीमोग्लोबिन टेस्ट कराएं, ताकि रक्त की कमी को लेकर समय रहते निदान किया जा सके। 
  • विटामिन-डी की जांच कराएं। इसकी कमी आजकल अमूमन महिलाओं में देखी जाती है। 
  • बीएमआई टेस्ट भी कराना चाहिए।

30 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

खून व विटामिन की जांच - इसमें हीमोग्लोबिन का स्तर, पॉलिमोपस, लिंफोसाइट, मोनोसाइट, प्लेटलेट्स आदि के स्तर को मापा जाता है। विटामिन डी और बी12 की कमी का भी पता लगाया जाता है। इनकी कमी से महिलाओं में थकान और कमजोरी हो जाती है।

पैपस्मिअर के साथ (पेल्विक)परीक्षण - पेल्विक परीक्षण में महिला के जननांगों, गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा, फेलोपियन ट्यूब्स, मलाशय और ब्लैडर की जांच की जाती है। ये दोनों ही परीक्षण महिलाओं में कैंसर को रोकने और शुरुआती उपचार में मददगार होते हैं। 

मधुमेह जांच - गर्भावस्था में होने वाला मधुमेह स्वस्थ महिला को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए ब्लड शुगर की जांच कराएं। यदि मधुमेह आनुवंशिक है तो कुछ समय के अंतराल में इसकी जांच कराती रहें।

मैमोग्राम और स्तन परीक्षण - आमतौर पर 40 की उम्र के बाद स्क्रीनिंग टेस्ट की सलाह दी जाती है, लेकिन अगर ब्रेस्ट कैंसर की आनुवंशिकता हो तो बेहतर है कि पहले ही नियमित स्तन परीक्षण के साथ मैमोग्राम करा लें।

40 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

लिपिड प्रोफाइल - कोलेस्ट्रॉल स्क्रीनिंग इसमें ब्लड टेस्ट से कोलेस्ट्रॉल चैक होता है। जरूरत पड़ने पर ईसीजी भी करवा लें। 

सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर - स्क्रीनिंग पेप स्मीयर टेस्ट सर्वाइकल कैंसर की जांच के लिए किया जाता है। 40 के बाद तो ये टेस्ट होना ही चाहिए। इसके अलावा नियमित बेस्ट एग्जामिनेशन करवाना ना भूलें। इसमें हर दो से तीन हफ्ते में स्वयं भी शारीरिक परीक्षण कर सकती हैं। किसी तरह की गांठ महसूस होती है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। 

थाइरॉइड टेस्ट - थाइरॉइड धीरे-धीरे बॉडी सिस्टम को प्रभावित करता है। डॉक्टरी सलाह से इसकी जांच कराएं। 

विज़न टेस्ट - अगर नजर का चश्मा पहनती हैं या कॉन्टैक्ट लेंस लगाती हैं तो हर साल विजन टेस्ट करवाएं। अगर चश्मा नहीं पहनती हैं तो हर 2 साल में एक बार टेस्ट करवाना जरूरी है।

50 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

हृदयकेलिए ईसीजी, इको, ईकेजी (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) बीपी और टीएमटी कराने चाहिए। कोलेस्ट्रॉल की जांच हर साल कोलेस्ट्रॉल परीक्षण कराएं। यदि मधुमेह, हृदय या किडनी के रोग से पीड़ित हों हे परीक्षण और भी कम अंतराल में या डॉक्टर को सलाह के मुताबिक़ कराएं। 

साइकोलॉजिकल स्क्रीनिंग मेनोपॉज के कारण मूड स्विंग, डिप्रेशन, नीद ना आना, चिड़चिड़ापन होने लगता है। हॉर्मोनल। बदलाव से 75% महिलाओं में यह होता ही है।

60 की उम्र के बाद कराए जाने वाले जाँच-

ब्लड प्रेशर जांच - उच्च रक्तचाप को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है क्योंकि यह कोई लक्षण दिखाए बिना ही स्ट्रोक या दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ा देता है। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच जरूरी है। 

बोन डेंसिटीटेस्ट बुजुगों में ऑस्टियोपोरोसिस सामान्य बीमारी है। डॉक्टरी सलाह से बोन डेंसिटी टेस्ट भी करवाएं। 

आंखों की जांच - उम्र के कारण आंखों में ग्लूकोमा या मोतियाबिंद जैसी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। हर छह महीने या डॉक्टर से परामर्श लेकर समय-समय पर इसकी जांच कराएं।

नोट:- ऊपर दी गई जानकारियां आपको जागरूक करने के लिए हैं। कृपया टेस्ट के लिए डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। 

आशा हैं की ऊपर आर्टिकल में बतायी गए सारी जानकारी आपको अच्छी लगी हो. यदि यह आर्टिकल आपके लाइफ को बेहतर और सेहतमंद बनाने में आपकी मदत करती हैं तो इस आर्टिकल को शेयर जरूर करें. “धन्यवाद” 

सिस्टाइटिस - CYSTITIS

सिस्टाइटिस  यानी मूत्राशय शोथ जिसे और भी अन्य नाम से जाना जाता हैं जैसे की - वस्ति शोथ, मूत्राशय प्रदाह, वस्ति की सूजन। आज के इस  लेख में हम सिस्टाइटिस से जुडी सभी जानकारियों के बारें में जानेंगे. 

सिस्टाइटिस  क्या होता है?. कभी किसी भी कारण से मूत्राशय के भीतर की श्लेष्मिक झिल्ली (म्यूकस मेम्ब्रेन) में प्रदाह हो जाता है तो उसे मूत्राशय प्रदाह, सिस्टाइटिस या इफ्लेमेशन ऑफ दि लैडर कहते हैं। इसमें मनाशय में असहनीय दर्द होता है तथा वार नारोशानी ना होती है।

सिस्टाइटिस - CYSTITIS IN HINDI

सिस्टाइटिस से जुडी कई ने जानकारी जैसे- 

  • सिस्टाइटिस  रोग के प्रमख कारण
  • सिस्टाइटिस रोग के प्रमुख लक्षण 
  • सिस्टाइटिस  रोग की पहिचान कैसे करें
  • सिस्टाइटिस  रोग का परिणाम
  • सिस्टाइटिस  के लिए पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा 

सिस्टाइटिस  रोग के प्रमख कारण- 

  • अधिक ठंढ लग जाना। 
  • मूत्र मार्ग का तंग होना। 
  • मिर्ची इत्यादि तेज और तीक्ष्ण पदार्थ के अधिक मात्रा में खाने से बाहरी चोट/आघात। 
  • मूत्राशय में पथरी अथवा सुजाक रोग। 
  • कैथेटर डालकर पेशाब कराने के समय मसाने में चोट आने से। 
  • कैन्धरिस, कोपेवा (मूत्र सम्बंधित एलोपैथिक दवाई) आदि उत्तेजक औषधि अधिक दिनों तक सेवन करने से। 
  • विभिन्न प्रकार के वात रोग। वृद्धावस्था में मसाने के कमजोर पड़ने से। 
  • लकवा (Paralysis) मूत्राशय, गुर्दे, आँत, मलाशय एवं गर्भाशय के दूसरे अंगों में संक्रमण (Infection) के फैल जाने से। मूत्राशय के अर्बुद । 
  •  नर्वस रोग।

सिस्टाइटिस  रोग के लक्षण- 

  • मूत्राशय के स्थान पर दर्द का होना। 
  • शरीर या गुप्तांग में अकड़न का होना।  
  • भार का प्रतीत होना। 
  • बार-बार पेशाब जाने  की इच्छा।  
  • मूत्र में जलन। 
  • अंगों में शीत एवं कंपकंपी का होना। 
  • मूत्र में मिला हुआ अथवा अन्त में पूय (Pus) जिसे हम मवाद भी कहते हैं वह निकलता है। 
  • यह रोग निम्न 2 प्रकार का होता है 1. तीव्र मूत्राशय शोथ (Acute Cystitis) | 2. चिरकारी मूत्राशय शोथ (ChronicCystitis)
  • तीव्र मूत्राशय शोथ के लक्षण पूय की मात्रा अधिक नहीं। मूत्र के साथ रक्त की उपस्थिति। 
  • आरम्भ में मूत्र अम्लीय पर शीघ्र क्षारीय। 
  • मूत्र त्याग बार-बार एवं पीड़ा। 
  • ज्वर, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि आदि लक्षण साथ में। 
  • चिरकारी मूत्राशय शोथ के लक्षण पूय की मात्रा अधिक। 
  • मूत्र प्रारम्भ से ही क्षारीय। अन्य लक्षण मृदु रूप में।

सिस्टाइटिस  के लिए याद रखिए:-

  • तीव्र मूत्राशय शोथ में मूत्र त्याग हो चुकने के बाद भी पेशाब करने की इच्छा बनी रहती है। 
  • पीड़ा कुछ समय के लिए शांत हो जाती है। परंतु पथरी (Gall stone) के कारण मूत्राशय शोथ में पीड़ा शांत नहीं होती।

सिस्टाइटिस  रोग की पहिचान कैसे करें- 

  • रोग निदान में कोई कठिनाई नहीं। 
  • मूत्राशय शोथ' में दर्द ऊपर की ओर कमर तक फैल जाता है और 'वृक्क शोथ' में दर्द नीचे की ओर कमर से मूत्राशय की ओर फैलता है।
  • सिस्टाइटिस  रोग का परिणाम- 
  • नया रोग आसानी से ठीक हो जाता है। 
  • लम्बे समय तक रोग आसानी से ठीक नहीं होता। दुर्बलता तथा सेप्टीसीमिया होने से रोगी की मृत्यु।
  • रोग की चिकित्सा विधि कारण का पता लगाकर उसे दूर करें। 
  • तीव्र अवस्था में पूर्ण विश्राम। 
  • इस रोग में पेशाब रुक जाने की सम्भावना अधिक रहती है। 
  • पेशाब रुक जाने से. यदि दवा से शीघ्र लाभ न हो तो सॉफ्ट कैथेटर का प्रयोग करना चाहिये। 
  • परंतु बहुत सावधानी से। किसी तरह की चोट न लग जाये।

सिस्टाइटिस  के लिए पथ्यापथ्य एवं सहायक चिकित्सा 

जल, बार्ली एवं अन्य तरल पदार्थों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग करें। रोगी को मिश्री का पानी, ईसबगोल या तुकमलंगा का भिगोया हुआ पानी, कच्चे  नारियल का पानी, छेने का पानी, बराबर की मात्रा में कच्चा दूध और पानी, बर्फ आदि सब ठंडे पेय पीने को दें। 

'मूत्राशय' के ऊपर सदैव गरम पानी की पट्टी रखनी चाहिये।

दोस्तों मै उम्मीद करता हु की सिस्टाइटिस से जुडी इस जानकारी में आपको साडी चीजे अच्छे से समझ में आ गए होंगे, सिस्टाइटिस से जुडी यह जानकारी जरूरतमंद लोगो को नहीं हो पाती. तो आपसे निवेदन हैं की इस जानकारी को शेयर जरूर करें. 


कैसे होता है लीवर ट्रांसप्लांट (How is liver transplant done?)

इसकी सामान्य प्रक्रिया यह है कि जिस व्यक्ति को लीवर प्रत्यारोपण की जरूरत होती है उसके परिवार के किसी सदस्य (माता/पिता, पति/पत्नी के अलावा सगे भाई/बहन) द्वारा लीवर डोनेट किया जा सकता है। इसके लिए मरीज के परिजनों को स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन काम करने वाली ट्रांसप्लांट ऑथराइजेशन कमेटी से अनुमति लेनी पड़ती है। 

कैसे होता है लिवर ट्रांसप्लांट | Liver Transplant Hindi


यह संस्था डोनर के स्वास्थ्य, उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थितियों की गहन छानबीन और उससे जुड़े करीबी लोगों से सहमति लेने के बाद ही उसे अंग दान की अनुमति देती है। लीवर के संबंध में सबसे अच्छी बात यह है कि अगर इसे किसी जीवित व्यक्ति के शरीर से काटकर निकाल भी दिया जाए तो समय के साथ यह विकसित होकर अपने सामान्य आकार में वापस लौट आता है। इससे डोनर के स्वास्थ्य पर भी कोई साइड इफेक्ट नहीं होता।

इसके अलावा अगर किसी मृत व्यक्ति के परिवार वाले उसके देहदान की इजाजत दें तो उसके निधन के छह घंटे के भीतर उसके शरीर से लीवर निकाल कर उसका सफल प्रत्यारोपण किया जा सकता है इसमें मरीज के लीवर के खराब हो चुके हिस्से को सर्जरी द्वारा हटाकर वहां डोनर के शरीर से स्वस्थ लीवर निकालकर स्टिचिंग के जरिये प्रत्यारोपित किया जाता है। 

इसके लिए बेहद बारीक किस्म के धागे का इस्तेमाल होता है, जिसे प्रोलिन कहा जाता हैलंबे समय के बाद ये धागे शरीर के भीतर घुल कर नष्ट हो जाते हैं और इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज का शरीर नए लीवर को स्वीकार नहीं पाता, इसलिए उसे टैक्रोलिनस ग्रुप की दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज के शरीर के साथ प्रत्यारोपित लिवर अच्छी तरह एडजस्ट कर जाए। सर्जरी के बाद मरीज को साल में एक बार लीवर फंक्शन टेस्ट जरूर करवाना चाहिए।

लिवर ट्रांसप्लांट के बाद क्या?

  • अस्पताल में 7 से 10 दिन रहना पड़ सकता है।
  • कम से कम 3 महीने की नियमित दवाएँ और अस्पताल अपने शेडूल के हिसाब से जाए।
  • लीवर प्रत्यारोपण के बाद तीन से छह महीने में सामान्य व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन पर लौट सकते हैं।
  • आप अपनी इच्छानुसार खेल, सामजिक गतिविधयों में भाग लेना, यात्रा और व्यायाम कर सकेंगे।

लिवर ट्रांसप्लांट का निर्धारण कैसे किया जाता हैं? 

लीवर के प्रत्यारोपण की उपयुक्तता का निर्धारण करने के लिए  विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा अवलोकन आवश्यक होता है। इसमें आपकी चिकित्सीय इतिवृत एवं भांति प्रकार की जाँच सम्मिलित होती हैं। प्रत्यारोपण दल आपका रक्त परीक्षण, एक्स-रे, एवं अन्य जाँच के क्रियांवयन द्वारा यह निर्धारण करेंगे कि क्या आपको प्रत्यारोपण की आवश्यकता है या क्या प्रत्यारोपण सुरक्षित ढ़ग से पूरा किया जा सकता है। आपके स्वास्थ्य के अन्य पहलू जैसे कि आपका हृदय,फेफड़े, लीवर , प्रतिरक्षी तंत्र एवं मानसिक स्वास्थ्य का परीक्षण किया जाएगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या आप शल्यक्रिया के लिए सबल हैं।

तनाव को कैसे दूर करें

तनाव कही न कही हमारे लाइफ को घेरे रहता हैं और साथ ही साथ कई तरह की अन्य बीमारियों को भी अपने साथ ले कर आता हैं. बेहतर तो यही होगा कि तनाव को बढ़ने न दें। भावनाओं का प्रबंधन सीखें। दुख, चिंता, निराशा जैसी भावनाएं तो आएंगी, परंतु आप उनसे कितना प्रभावित होते हैं यह आपके ऊपर हैं। लेकिन अपने तनाव को कम कैसे करें या किस तरह से हम अपने तनाव को कम कर सकते हैं. इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां आज हम आपको इस लेख में डे रहे हैं, जिसके जरियें आप अपने तनाव को कम कर सकते हैं.

तनाव को दूर करने के अचूक उपाय - Stress Relieve Tips

मेडिटेशन यानी ध्यान करें:-

अध्ययनों से साबित हुआ हैं कि ध्यान करने से तनाव में राहत मिलती हैं। साथ ही इसे ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों में भी कारगर पाया गया हैं। शांत मन से आप सोच-समझकर खाते हैं। आप इस बात पर गौर करते हैं कि आपको ज्यादा फैट या चीनी से मुक्त आहार का सेवन कैसे करना चाहिए।

पढ़े – मेडिटेशन के फायदे

योग-व्यायाम करें:-

व्यायाम करने से शरीर में कॉर्टिसोल की मात्रा नियंत्रण में रहती हैं, जिससे आप तनाव के नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रह सकते हैं। योग जैसी गतिविधियों में व्यायाम और ध्यान दोनों का संयोजन शामिल होता है।

जब हम व्यायाम करते हैं तो हमारे बॉडी में कुछ ऐसे हार्मोन्स रिलीज होते हैं जो हमें खुशी महसूस करता हैं और यही खुशी हमें हमारे तनाव से लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं.

सामाजिक सहयोग:-

परिवार, दोस्त और समाज के अन्य लोगों से मिलने वाला सहयोग भी तनाव को दूर करने में कारगर हो सकता हैं। यदि अकेले रहने से आपको ऊब होती हैं, तनाव घेरता है तो प्रियजनों से मिले-जुलें, कोई टीम गेम खेले. इससे आप अपने मन की शांति भी कर सकते हैं और साथ ही साथ तनाव से मुक्ति भी.

भरपूर नींद लेने की आदत:-

दोस्तों जिस तरह हमारे जीवन में खाना,पीना और वायु जरूरी हैं, उतना ही जरूरी नींद का भी हैं. जब भी हम अपना नींद पूरा नहीं कर लेते तब तक हमें फ्रेश महसूस नहीं होता, और ऐसे करते करते हम तनाव का शिकार हो जाते हैं जिससे निकलने में समय लग जाता हैं. तो याद रखें की हमें तनाव मुक्त रहने के लिए नींद की आवश्यकता होती ही होती हैं.

ज्यादा सोचने की आदत:-

दोस्तों कई लोग ऐसे होते हैं जो छोटी-छोटी बातों के बारे में ज्यादा ही सोचते हैं, जो की कई न कही गलत हैं. किसी चीज के बारे में जब जरूरत से ज्यादा सोचते हैं तो हमारी मानसिक ऊर्जा एक ही जगह पर खपत होने लगती हैं और हमें थकान महसूस होने लगता हैं और कई लोग इसी वजह से चिड़चिड़ा भी हो जाते हैं. और फिर उन्हें तनाव होना सुरु हो जाता हैं. तो कोशिश करें की ज्यादा सोचने से बचे और बात बात पे चिंता करने से बचे.

पढ़े - भूलने की बीमारी के कारण व इलाज 

दोस्तों आप ऊपर बताई गयी टिप्स को अपना कर एक तनाव मुक्त जीवन जी कसते हैं और अपने तन के साथ साथ अपने मन को भी स्वस्थ रख सकते हैं, क्योकि जब तक मन स्वस्थ नहीं होगा तब तक स्वस्थ तन का कोई महत्त्व नहीं माना जाता हैं. तनाव कम करने के लिए बताई गयी बातें यदि आपको अच्छी और उपयोगी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें. 


ट्रैवल सिकनेस क्या हैं? (यात्रा के दौरान उल्टी का कारण)

जो लोग सड़क, समुद्र या हवाई यात्रा करते समय बीमार हो जाते हैं, उन्हें ट्रैवल/मोशन सिकनेस का सामना करना पड़ता है। 2 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों और महिलाओं को मोशन सिकनेस का खतरा अधिक होता है, लेकिन यह किसी को भी प्रभावित कर सकता है। मोशन सिकनेस तब होती है जब आपका दिमाग आपकी आंखों, कानों और शरीर से भेजी गई जानकारी को समझ नहीं पाता है।


किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है? (Who gets travel/motion sickness quickly)

मोशन सिकनेस हर व्यक्ति को नहीं होता लेकिन मोशन सिकनेस होने के चांसेज कुछ केस में बढ़ जाते हैं, जैसे की- 

माइग्रेन्स (Migraine) – सिर के केवल एक हिस्से में दर्द या असहनीय पीड़ा को माइग्रेन्स कहते हैं. 

(पढ़ेमाइग्रेन क्या हैं व लक्ष्ण )

प्रेग्नेंसी(Pregnancy)– प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं का शरीर पहले के जैसे नहीं रह पाता जिसके चलते उन्हें ट्रैवल सिकनेस का सामना करना पड़ता हैं, और ट्रैवल सिकनेस जल्दी होती हैं. 

मेंस्ट्रुअल पीरियड्स (Menstrual Periods)- सामन्यतौर पर किसी लड़की की 11 से 13 वर्ष की आयु में मासिक धर्म प्रारम्भ होते हैं और करीबन 3 से 5 दिन या 2 से 7 दिन तक चलते हैं. और मेंस्ट्रुअल पीरियड्स के चलते यात्रा के दौरान उन्हें ट्रैवल सिकनेस होने के चांस ज्यादा होता हैं. 

पार्किंसंस डिसीज (Parkinson’s Disease) – इस डिसीज में मानव दिमाग के एक क्षेत्र में तंत्रिका कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं. जिसके चलते मोशन सिकनेस हमारी बॉडी पर हावी होती हैं. 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? (What causes travel sickness)

हमारा दिमाग आपके शरीर के मोशन-सेंसिंग पास से सिग्नल्स प्राप्त करता है : आपकी आंखें, आंतरिक कान, मांसपेशियां और जॉइन्ट्स। जब ये अंग परस्पर विरोधी सूचनाएं भेजते हैं तो दिमाग भ्रमित हो जाता है और प्रतिक्रिया आपको बीमार महसूस कराती है. 

  • मोशन के दौरान कुछ पढ़ना
  • भरा/खाली पेट 
  • आंखें पास से गुजरते पेड़ों को देखती हैं

मोसन सिकनेस से बचने के उपाय (Ways To Avoid Moson Sickness)

अदरक की जड़-

अदरक की जड़ का सेवन सबसे कारगर उपाय है। अदरक में कुछ मतली-विरोधी प्रभाव होते हैं, जो में मतली की इच्छा को रोक सकते हैं। आप अदरक की जड़ को चाय, कैप्सूल, टैबलेट या कैंडी में उपलब्धता के अनुसार ले सकते हैं। के गर्भवती महिलाओं को अदरक का इस्तेमाल करने से पहले हमेशा डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

खट्टे फल- 

सबसे अधिक सेवन किए जाने वाले खट्टे फल जैसे संतरे और अंगूर मोशन सिकनेस से लड़ने के काम आ सकते हैं। तेज स्वाद के कारण, इन फलों को यात्रा के दौरान लोगों को बेहतर महसूस कराने के लिए अच्छा माना जाता है।

पुदीना और भुनी हुई लौंग-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

भारी भोजन न करें-

पुदीने की तेज और ताजगी भरी महक मस्तिष्क को फिर से जीवंत करने और आपके मुंह को तरोताजा महसूस कराने के लिए जानी जाती है। यात्रा की शुरुआत से पहले, कुछ भुनी हुई लौंग को अपने मुंह में रखने से चक्कर आना और मिचली का अहसास काफी हद तक सीमित हो सकता है।

पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें-

यात्रा के दौरान किताबें पढ़ना या लैपटॉप पर काम करना या मोबाइल फोन का उपयोग करना आकर्षक हो सकता है। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कारक है जो मतली की भावना को ट्रिगर करता है। पुस्तक या मोबाइल स्क्रीन में शब्द स्थिर होते हैं लेकिन आपका परिवेश मोशन में होता है। यह आपके मस्तिष्क को 2 मिश्रित संकेत भेजेगा और मतली को ट्रिगर करेगा।

ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण (Symptoms Of Travel/Motion Sickness)-

  • ठंडा पसीना आना 
  • मतली उल्टी होना 
  • सिर दर्द करना 
  • चक्कर आना 
  • तेजी से सांस लेना व थकान 

ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे (How To Avoid Travel/Motion Sickness)- 

  • पढ़ने या मोबाइल फोन यूज करने से बचें 
  • यात्रा के दौरान आपकी बैठने की स्थिति मोशन सिकनेस से निपटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • फ्रंट सीट
  • खिड़की के पास बैठना, आगे की ओर मुंह करके (ट्रेन चलने की दिशा में) बैठना 
  • वाहन की मिडिल सीट्स को बुक करें 
  • यात्रा में अपना मन लगाये रखना 
  • यात्रा के दौरान बात कर के मन बहलाना 

तो दोस्तों उम्मीद हैं की, आज की इस आर्टिकल में बतायी गयी जानकारी जिसमे हमने जाना ट्रैवल सिकनेस क्या है?, किसे ट्रैवल/मोशन सिकनेस जल्दी होती है?, ट्रैवल/मोशन सिकनेस का क्या कारण होता है? मोसन सिकनेस से बचने के उपाय? ट्रैवल/मोशन सिकनेस के लक्षण? और ट्रैवल/मोशन सिकनेस से कैसे बचे? इन सब की जानकारी हमने आपको दी. यदि आपको यह ट्रैवल सिकनेस से जुडी जानकारी उपयोगी लगी हो तो इस जानकारी को शेयर जरूर करें. 

योग मुद्रा क्या हैं | योग मुद्रा के प्रकार (What are Yoga Mudras? types of yoga poses)

योग हस्त मुद्रा या हस्त मुद्रा (Yoga - Hand Gestures) प्राचीन काल से प्रभावकारी माना जाता आ रहा हैं, चाहे वह ध्यान के क्षेत्र में हो या योग के क्षेत्र में. आपने भी अक्सर देखा होगा की जितने भी महान तपस्वी, संत, महात्मा हुए हैं वे अपने हाथों को किसी एक विशेष स्थिति में कर के बैठे या खड़े होते हैं, और इसे ही मुद्रा (mudras) कहा जाता हैं. 

मुद्रा  क्या हैं | मुद्रा  के प्रकार व फायदे - Yogas Mudras in Hindi

मुद्रा क्या है? (What is Mudras)

मुद्रा (mudras), हिंदू धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म में एक प्रतीकात्मक या अनुष्ठानिक इशारा है। कुछ मुद्राओं में पूरा शरीर शामिल होता है, जबकि अधिकांश केवल हाथों और उंगलियों से की जाती हैं। मुद्रा भी एक आध्यात्मिक इशारा है जो, आमतौर पर योग और ध्यान में प्रयोग किया जाता है।

हमें ध्यान मुद्रा का अभ्यास क्यों करना चाहिए? 

योगाभ्यास में मुद्रा का उपयोग सेल्फ केयर और सशक्तिकरण के लिए एक शक्तिशाली माध्यम है। योग का मकसद अपने आप को पहचानना और ऊर्जावान बनाना है। 100 से अधिक ज्ञात मुद्राएं हैं जिन्हें सदियों से विकसित किया गया है।

ज्ञान मुद्रा (Gyan Mudra): - 

ज्ञान मुद्रा का उद्देश्य आपकी एकाग्रता में सुधार करना और आपकी याददाश्त को तेज करना है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए और उसके उपयोग करने के लिए यह एक महान मुद्रा है। विधि : यह मुद्रा तर्जनी को अपने अंगूठे की नोक से छूकर अपनी अन्य तीन अंगुलियों को सीधा रखते हुए की जाती है।

Gyan Mudra

ज्ञान मुद्रा के फायदे (Benifits of Gyan Mudra)-

  • ज्ञान मुद्रा शरीर में वायु तत्व को बढ़ाता है। 
  • बॉडी में जोश, साहस और रचनात्मक सोच को बढ़ाता है। 
  • ज्ञान मुद्रा हमारे अवचेतन मन की विचार क्षमता और याददाश्त को बढ़ाता है। 
  • थकान, आलस्य और मानसिक उलझनों से निपटने में बेहद कारगर है।

बुद्धि मुद्रा (Budhhi Mudra):- 

इस मुद्रा का उपयोग मानसिक स्पष्टता के लिए किया जाता है। इस मुद्रा के लाभ कम्युनिकेशन के सुधार के के रूप में पाए जा सकते हैं। विधि : इस मुद्रा को अपनी छोटी उंगली से अपने अंगूठे को छूकर अपनी अन्य तीन अंगुलियों को सीधा रखते हुए किया जाता है। 

Budhhi Mudra

बुद्धि मुद्रा के फायदे (Benifits of Buddhi Mudra)-

  • बुद्धि मुद्रा का मुख्य फायदा वार्ता के दौरान देखा जाता हैं।
  • बुद्धि मुद्रा बुद्धि को शांत और शार्प करने में सहायक होता हैं।
  • इससे मानशिक स्पस्टता में सुधार व सहायता मिलती हैं।

शुनि और शून्य मुद्रा (Shuni Aur Shuny Mudra):-

 इस मुद्रा का उपयोग अंतति, सतर्कता और संवेदी शक्तियों में सुधार के लिए किया जाता है। यह आपकी भावनाओं और विचारों को भी शुद्ध करता है। विधि : इस मुद्रा को मध्यमा अंगुली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करते हुए अन्य तीन अंगुलियों को सीधा और शिथिल रखते हुए किया जाता है।

Shuny Mudra

शुनि और शून्य मुद्रा के फायदे (Benifits of Shuni Aur Shuny Mudra)-

  • शारीर व मन को स्वस्थ रखने में सहायक।
  • शरीर में अंतरिक्ष तत्व को कम करता है।
  • कान में दर्द, सुनने में समस्या, यात्रा की थकान को कम करता है।
  • शरीर के कई अंगों जैसे, सिर और सीने में हल्के दर्द को कम करता है।
  • वात प्रकृति वाले लोगों के लिए बेहद फायदेमंद।

प्राण मुद्रा (Pran Mudra):-

प्राण मुद्रा को आपके शरीर में निष्क्रिय ऊर्जा को सक्रिय करने की क्षमता के कारण सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में से एक कहा जाता है। विधि : इस मुद्रा को अपनी अनामिका और पिंकी(कनिठिका) उंगलियों को अपने अंगूठे के सिरे से स्पर्श करते हुए अन्य दो अंगुलियों को सीधा रखते हुए करें।

Pran Mudra

प्राण मुद्रा के फायदे (Benifits of Pran mudra)-

  • प्राण मुद्रा ह्रदय से कंठ तक के रोगों से मुक्ति में सहायक।
  • भूख-प्यास व प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक।
  • तन-मन की दुर्बलता को दूर करने में।

ध्यान मुद्रा (Dhyan Mudra):-

इस मुद्रा का महत्व आपको अधिक गहन एकाग्रता में लाना है। यह इशारा आपको शांति और आंतरिक शांति लाने में भी मदद कर सकता है।" विधि : अपने हाथों को ऊपर की ओर करके बैठे, दाहिना हाथ अपनी बायीं हथेली के ऊपर टिका लें।

Dhyan Mudra

ध्यान मुद्रा के फायदे (Benifits of dhyan Mudra)-

  • ध्यान मुद्रा के नियमित अभ्यास से मन शांत होता है। 
  • ध्यान मुद्रा दिमाग को मेडिटेशन की गहरी अवस्था में ले जाती है।
  • बुद्धिमता और स्मरंशक्ति को बढाने में फायदेमंद।
  • ध्यान व मेडिटेशन करने के लिए प्रमुख माना जाता हैं।

सूर्य मुद्रा (Surya Mudra):-

सूर्य मुद्रा का उद्देश्य चयापचय और पाचन में सुधार करना है। यह शरीर में भारीपन को कम करने और सर्दी से बचाव में मदद करने में भी उपयोगी है। विधि : इस मुद्रा को अपनी अनामिका को अपने अंगूठे के आधार पर झुकाकर करें ताकि आपका अंगूठा अनामिका के पोर को स्पर्श करे। हाथ पर जोर दिए बिना अपनी अन्य तीन अंगुलियों को सीधा फैलाएं।

Surya Mudra

सूर्य मुद्रा के फायदे (Benifits of Surya Mudra)-

  • शरीर में अग्नि तत्व को बढ़ाती है जबकि पृथ्वी तत्व को कम करती है।
  • शरीर के तापमान को बढ़ाती है। 
  • ठंड से कंपकंपी होने पर राहत देती है। 
  • लो थायरॉयड की समस्या वाले लोगों के लिए बेस्ट है।
  • वेट लॉस, अपच, कब्ज या भूख न लगने की समस्या को दूर करती है।

अपान मुद्रा (Apan Mudra):-

अपान मुद्रा मानसिक या शारीरिक पाचन के लिए और शरीर से अपशिष्ट पदार्थ को खत्म करने के लिए अच्छी है। विधि : इस आसन को करने के लिए अपनी दूसरी और तीसरी अंगुलियों को अपने अंगूठे के पास (मध्यम और अनामिका को अंगूठे के सिरे तक लाएं।

Apan Mudra

अपान मुद्रा के फायदे (Benifits Apan Mudra)-

  • अपान मुद्रा पेट के सभी अंगो को सक्रीय करता हैं।
  • तमशिक पदार्थो को नष्ट करने में सहायक।
  • पाचन प्रक्रिया को मजबूत बनाने में उपयोगी।

गणेश मुद्रा (Ganes mudra):-

गणेश मुद्रा आपके जीवन में सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने के लिए बहुत अच्छी है।" । विधि : अपने बाएं हाथ को अपनी छाती के सामने रखें, आपकी हथेली बाहर की ओर और आपका बायां अंगूठा नीचे की ओर। इसके बाद, अपने दाहिने हाथ को अपनी बाई हथेली के सामने रखें और अपनी दाहिनी हथेली को अपनी ओर और अपनी बाईं हथेली की ओर रखें। अपनी उंगलियों को एक साथ बंद करें, उन्हें पंजे की तरह आधा मुड़ा हुआ स्थिति में रखें।

Ganes mudra

गणेश मुद्रा के फायदे ( Benifits Ganes mudra)-

  • गणेश मुद्रा विषेश कर आत्मविश्वास को बढाने में उपयोगी होता हैं।
  • गणेश मुद्रा फेफड़ो के विस्तार में मददगार।
  • शरिर में स्फूर्ति को बढ़ावा देता हैं।
  • चिंता व तनाव जैसे मानशिक विकारों से मुक्ति।

वायु मुद्रा (Vayu Mudra):-

वायु मुद्रा वायु असंतुलन से संबंधित रोगों के लिए अच्छा है, जैसे गैस से संबंधित दर्द, पेट फूलना, जोड़ों का दर्द, है सूजन और पेट की परेशानी। विधि : अंगूठे को तर्जनी के पोर से जोड़ दें। तर्जनी को अपने आराम के स्तर तक दबाएं; यह इशारा आराम करने के लिए है न कि जोड़ को तनाव देने के लिए।

Vayu Mudra

वायु मुद्रा के फायदे (Benifits of Vayu Mudra)- 

  • मन को शांत रखने में मददगार होती है।
  • इम्यूनिटी को बढ़ाती है।
  • गैस्ट्रिक समस्याओं जैसे गैस और एसिडिटी पर काबू पाने में मददगार होती है।
  • एंडोक्राइन ग्‍लैंड को उत्तेजित करती है।
  • क्षतिग्रस्त और डेड नर्वस सेल्‍स को पुनर्जीवित करती है।
  • वायु दोष के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द को दूर करती है।

रुद्र मुद्रा (Rudra Mudra):-

यह मुद्रा अक्सर भगवान शिव से जुड़ी होती है क्योंकि यह आपकी आंतरिक परिवर्तनकारी क्षमताओं पर लागू होती है। यह मुद्रा स्पष्टता और विचार की एकाग्रता में सुधार करने में मदद करती है। विधि : इस मुद्रा को करने के लिए अपने अंगूठे को अपनी तर्जनी और अनामिका से जोड़ लें, जबकि अपनी अन्य दो अंगुलियों को जितना हो सके सीधा रखें।

Rudra Mudra

रुद्र मुद्रा के फायदे (Benifits Rudra Mudra)- 

  • यह मुद्रा भूख और प्यास को नियंत्रित करने में मददगार है।
  • इस मुद्रा के अभ्यास से आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • इस मुद्रा से पाचन तंत्र की कार्यक्षमता बढ़ाने में काफी मदद मिलती है।
  • यह मुद्रा मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम को ऊर्जान्वित करने में सहायक है।

उम्मीद हैं की यह मुद्रा या हस्त मुद्रा से जुड़ी अनोखी जानकारी आपको पसंद आयी होगी और उपयोगी लगी होगी, यदि आपको इस  मुद्रा या हस्त मुद्रा से जुड़ी जानकरी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें.

नींद की कमी से नुकसान 

आज के समय में कई लोगों की जीवनशैली अस्त-अस्त व्यस्त है। देर से सोते हैं और देर से उठते हैं। कुछ लोग देर से सोते हैं, लेकिन सुबह जल्दी उठ भी जाते हैं. ऐसे में नीद भी सात घंटे से कम हो पाती है। आज के इस लेख में हम नींद की कमी से होने वाले नुकसान के बारे में जानेंगे. अगर आप अच्छा खाते हैं और नियमित रूप से व्यायाम करते हैं लेकिन रोज कम से कम सात घंटे की नींद नहीं लेते हैं, तो आपको स्वास्थ्य से सम्बंधित गंभीर समस्याएं हो सकती है। 

Sleep Deprivation


जरूरी है कि आप अपनी ऊर्जा को रिचार्ज करने के लिए रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नीद अवश्य लें। यदि नहीं लेंगे, तो इसका सीधा असर याददाश्त पर पड़ सकता है, गुस्सा और मूड स्विंग जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.

हम नींद की कमी व नींद की कमी से होने वाले नुकसान के बारे में आपको कुछ महत्वपूर्ण जानकारी आपको निचे दे रहें हैं- 

नींद की कमी से नुकसान- 

  • मानसिक क्षमता पर प्रभाव
  • मन को खल जाती है नींद की कमी 
  • मासिकधर्म प्रभावित होगा 
  • वज़न बढ़ने का कारण है 
  • हृदय केलिए भी हानिकारक 
  • मधुमेह का जोखिम 
  • चिडचिडापन से सामना
  • दिन में नींद व आलस की समस्या
  • पाचन तंत्र पर प्रभाव  
  • हड्डियों का कमजोर हो जाना 

01. मन को खल जाती है नींद की कमी (Lack of sleep disturbs the mind)

नींद और मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। नींद की कमी से व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए कहा जाता है कि जितनी अच्छी नींद होगी उतना ही अच्छा मानसिक स्वास्थ्य भी होगा। इसके अलावा जिन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, उनमें अनिद्रा या अन्य नींद संबंधी समस्याओं से पीड़ित होने की संभावना ज्यादा होती हैं। बेताबी (एंग्जाइटी), अवसाद, बाइपोलर डिसऑर्डर और अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर से पीड़ित मरीजों में नींद को समस्या (एडीएचडी) होने की संभावना अधिक होती है। 

02. मानसिक क्षमता पर प्रभाव (Eeffect on mental ability)

नींद की कमी मानसिक क्षमता को कम कर देती है। पर्याप्त नींद न लेने से शारीरिक स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में स्वस्थ मानसिक स्वास्थ्य के लिए आठ घंटे की नींद लेना बहुत जरूरी है। जिन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य समास्याएं हैं उन्हें डिप्रेशन और एंग्जाइटी जैसी बीमारियों से बचने के लिए सोने की आदतों में सुधार करना चाहिए और पर्याप्त आठ घंटे की नींद लेनी चाहिए। (पढ़े - भूलने की बिमारी के बारे में )

03. मासिकधर्म प्रभावित होगा (menstruation will be affected)

कम नींद लेने से मासिक धर्म की समस्याएं जैसे अनियमित पीरियड्स, स्पॉटिंग और हैवी फ्लो, ये सभी हो सकते हैं, खासतौर पर पीरियड्स के दौरान महिलाओं को कम से कम 8 घंटे की नींद जरूर लेनी चाहिए। इससे मासिक धर्म के दौरान दर्द और मूड स्विंग जैसी समस्याएं भी कम होती हैं। स्लीप एपनिया यानी नींद की कमी का रोग शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को नुकसान पहुंचता है। नींद के दौरान शरीर की लगभग हर कोशिका की मरम्मत होती रहती है। लेकिन नींद की कमी से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और किसी भी तरह के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

04. वजन बढ़ने का कारण है (Cause weight gain)

नींद पूरी न होने से दिन भर थकान और सुस्ती बनी रहती है। इस वजह से लोगों में अस्वस्थ भोजन खाने की आदत बढ़ जाती है जिससे वजन बढ़ता है। दूसरा कारण यह है कि जो लोग कम सोते हैं, उनकी शारीरिक क्रिया या व्यायाम छूटने से वजन बढ़ जाता है।

जाने - स्वास्थ्य जीवन के पाच मन्त्र 

05. हृदय के लिए भी हानिकारक (Harmful to the heart)

यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नींद की कमी के कारण अजित के लिए दिल के रोगों का खतरा बढ़ जाता है। रचा गया कि जिन लोगों को हृदय की बीमारी के लो। घंटे से भी कम सोते थे। इस वजह से उनका हृदयक कार्य प्रभावित हो रहा था। कोरोनरी हार्ट डिजीज पर रोग, कंजेस्टिव हार्ट फेलियर, स्ट्रोक और हापट का कारण नींद की कमी हो सकता है।

06. मधुमेह का जोखिम (Risk of diabetes)

पर्याप्त नींद ना लेने से मधुमेह होने की संभावना बढ़ जाती है। कम नींद लेने से शरीरे अपड शुगर (रक्त शर्करा) को नियंत्रित करने वाले होमोन इंसुलिन को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता। नींद की कमो सुलिन उत्पादन और ग्लूटेन टोलरेंस (सहनशीलता) को कम करती है। इस वजह से कोशिकाएं इंसुलिन का उपयोग करने में कम प्रभावी हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप मधुमेह हो सकता है।

07. चिड़चिड़ापन से सामना – 

नींद पूरी ना हो पाने की वजह से कई बार हमें चिड़चिड़ापन का सामना करना पड़ता हैं. जिसका सीधा असर हमारे दिनचर्या पर पड़ता हैं और हम आसन कामो को भी अच्छे से नहीं कर पाते जिसका नुकशान हमें उठाना पड़ता हैं. साथ ही चिड़चिड़ापन होने की वजह से हमारे व्यवहार पर भी असर पड़ता हैं. 

 08. दिन में नींद व आलस की समस्या (Daytime sleepiness and lethargy)

जब हमारी नींद पूरी नहीं होती तब अक्सर हमें दिन के समय में नींद या जम्हाई आती हैं और यह हमारे सेहत के लिए सही नहीं होता. और हम दिन में नींद आने की वजह से फ्रेश भी फील नही करते हैं. रात के समय में नींद पूरी नहीं होने से हम आलस फील करते हैं और इसी आलास की वजह से हमारे काम भी बिगड़ते हैं. 

09. पाचन तंत्र पर प्रभाव (Effect on the digestive system)-  

कम नींद का प्रभाव आपके पाचन तंत्र पर भी पड़ता है. पर्याप्त नींद न लेने पर पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, जिसके कारण आपको पेट साफ न होने या कब्ज की समस्या भी हो सकती है.

10. हड्डियों का कमजोर हो जाना (Weakening of bones)

ऑस्ट‍ियोपोरोसिस नामक बिमारी में अच्छी नींद नहीं लेने की वजह से हड्डियां कमजोर होना शुरू हो जाती हैं. इसके अलावा हड्डियों में मौजूद मिनरल्स का संतुलन भी बिगड़ जाता है. इसके चलते जोड़ों के दर्द की समस्या पैदा हो जाती है.

Conclusion:– 

तो दोस्तों आज के इस आर्टिकल में हमने  नींद की कमी से नुकसान या नींद की कमी से होने वाले कुछ नुकसान के बारे में जाना. यदि आपको यह जानकारी पसंद आयी हो और उपयोगी लगा हो तो इस आर्टिकल और जानकारी को शेयर जरूर करें. “धन्यवाद”